Tuesday, February 9, 2016

अंगुल मॉडल : ओड़िसा में खुले में शौच मुक्त ग्राम बनाने की अनूठी पहल |

-आर्य शुभम वर्मा 

खुले में शौच मुक्त भारत बनाने की स्वच्छ भारत अभियान की मुहीम देश भर में चल रही है और देशभर में कई अनूठे प्रयोग इस दिशा में हो रहे हैं | इसी कड़ी में ओड़िसा के अंगुल जिले की अंगुल तालुका में कुशल नेतृत्व तथा जनभागीदारी का एक अनूठा उदाहरण सामने आया, जिसमे सदियों से चल रही खुले में शौच करने की परंपरा को बदल कर रख दिया तथा कई गावों को खुले में शौच से मुक्त कर दिया गया | इसमें तथा अफसर , सरकार, गैर सरकारी संगठन तथा ग्रामीण जनता, इन सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया | यह सब कुछ संभव हुआ एक कुशल नेतृत्व के कारण और समाज के लिए कुछ कर दिखाने की सोच के कारण | आखिर कौन था इस सोच के पीछे ?



फोटो : कुमुर्सिंघा , ओड़िसा की प्रथम, ‘खुले में शौच’ मुक्त ग्राम पंचायत |

सचिन जाधव , यह नाम है उस व्यक्ति का जिसने नामुनकिन से दिखने वाले इस कार्य को कर दिखाया | जब सचिन जाधव कलेक्टर के रूप में कोरापुट जिले से स्थानांतरित होकर अंगूल जिले में पहुंचे तब वहां के हालात बहुत खराब थे |  चारों तरफ से औद्योगिक क्षेत्र से घिरे होने के बाद भी अंगुल में बहुत गरीबी थी तथा गाँव में लोग खुले में शौच कर रहे थे | कलेक्टर होने के बाद भी सचिन जाधव ने जिनके पास पहले से जिले के कई काम थे , इस दिशा में सोचना प्रारंभ किया | इनका मानना था के यदि गाँव में शौचालय बन जाएँ तो गरीबों के मन में भी एक सम्मान का भाव जागेगा तथा खुले में शौच ख़त्म होने के साथ साथ गाँव वालों में, गाँव को साफ़ रखने की भावना भी जाग्रत होगी तथा इस कार्य के बहाने गाँव वालों को यदि एकजुट किया जा सके तो इसके बाद उन सबको कुपोषण, स्वरोजगार आदि मुहिमो से भी जोड़ा जा सकता है | यह सोचकर इन्होने इस कार्य को करना प्रारंभ किया |

शुरू में सरकारी विभाग के कई अफसरों ने इस काम को करने में ज्यादा रूचि नहीं दिखाई तथा गाँव वाले भी सदियों पुरानी खुले में शौच की प्रथा को त्यागने को तैयार नहीं थे | कई सारे विभाग आपस में समन्वय नहीं बैठा पा रहे थे , तथा कलेक्टर के मन में भी यह था के इसे कैसे किया जाय | तब उन्होंने निर्णय किया के यह शौचालय मुक्त ग्राम की परिकल्पना तभी सच हो सकती है जब इससे जुड़े सभी लोग एक साथ मिलकर काम करें | इसके लिए इन्होने जिला प्रशासन , पंचायती राज प्रशासन , जिला जल एवं स्वच्छता मिशन , फीडबैक फाउंडेशन एवं स्थानीय समुदाय की एक बैठक बुलाई |

इस बैठक में तय किया गया इन सभी को मिलकर एक टीम का गठन किया जायेगा, जिसकी अध्यक्षता स्वयं कलेक्टर करेंगे तथा फीडबैक फाउंडेशन समुदाय के लोगों के बीच जाकर उनकी सोच को बदलने का कार्य करेगी जिसमे कई तरह के उपायों के द्वारा लोगों की खुले में शौच जाने की आदत को बदला जाएगा | पंचायती राज विभाग तथा जिला जल एवं स्वच्छता मिशन, एकसाथ मिलकर अपने विभाग का काम करेंगे जिसमे पैसा मुहैया कराना तथा शौचालय निर्माण के तकनीकी पक्ष को देखना शामिल था | इसके आलावा सबसे अच्छा काम यह किया गया के स्थानीय समुदाय को भी इसमें जोड़ा गया | इनकी कई समितियां हर ग्राम पंचायत में बनायीं गयी जिनमें निगरानी समिति, सामान खरीदी समिति, जन जागरूकता समिति आदि समितियां शामिल थी |

इंजिनियर, पंचायत ऑफिसर तथा सरपंचो के क्षमता विकास के प्रशिक्षण करवाए गए | इसके बाद सभी युद्ध स्तर पर एकसाथ काम में जुट गए तथा जिन गाँव ने सदियों से शौचालय नहीं देखे थे, वहां शौचालय बनाने का कार्य शुरू हो गया और अक्टूबर २०१४ को स्वच्छ भारत मिशन की मोदी जी के पहल के साथ ही इन सभी ने भी अपना काम शुरू कर दिया और जून २०१५ तक , 9 महीने के अन्दर ही इन्होने अंगुल ब्लाक के ११० गाँव को खुले में शौच मुक्त कर दिखाया |

इस काम के प्रति इन लोगों के जूनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की कलेक्टर, पंचायत ऑफिसर तथा फीडबैक फाउंडेशन के प्रतिनिधि खुद सुबह 4 बजे से उठकर गाँव में निगरानी के लिए जाते थे तथा खुले में शौच करने वालों से राख डालने की अपील करते थे तथा बाद में सभी को शौचालय बनवाने की अपील करते थे | निगरानी समिति सुबह से लोगों को खुले में शौच ना जाने के लिए समझाती थी तथा दिन में फीडबैक फाउंडेशन द्वारा गाँव वालों को विलेज मैपिंग तकनीक द्वारा एकजुट करके समझाया जाता था के खुले में शौच से क्या क्या बीमारियाँ फैलती हैं एवं महिलाओं के लिए खुले में जाना एक अपमानजनक प्रक्रिया है जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुचती है , इसी में यह भी बताया जाता था के किस तरह खुले में जाने से सांप, बिच्छु आदि के काटने का खतरा रहता है |

इस तरह धीरे धीरे गाँव वालों की सोच बदलती चली गयी तथा गाँव के लोग खुद शौचालय बनवाने की मांग करने लगे | अब बारी आई सामान खरीदने वाली समिति की जिसने सारे गाँव का सामान इकठ्ठा खरीदना शुरू किया जिससे जितने पैसे लगने थे उससे भी कम पैसों में सामान आ गया | गाँव के कुछ लोगों ने खुद मेसन का प्रशिक्षण किया तथा स्वयं शौचालय बनाने में सहयोग भी दिया | यही नहीं बचे हुए पैसे से इन्होने उन लोगों के घर के शौचालय भी बना दिये जो किसी कारण वश योजना में नहीं आ पाए थे | इस तरह सभी की एकजुटता के कारण अंगुल ब्लाक में ११० गाँव खुले में शौच से मुक्त हो पाए |

कलेक्टर सचिन जाधव इन सबको याद करते हुए कहते हैं के – जरुरत है लोगों की सोच बदलने की और एकजुट होकर देश के लिए तथा समाज के लिए काम करने की , यदि यह दो चीजे हो जाएँ तो देश बदल जाएगा | आज हमारी बनायीं हुई समितियां शौचालय बनने के बाद गाँव में कुपोषण तथा महिला शिक्षा में सुधार के लिए कार्य कर रही हैं | जरुरत थी उनमे कुछ करने की ललक जगाना जो हमने जगा दी , बाकी का काम समुदाय खुद कर लेता है |



इस तरह अंगुल मॉडल में सरकार , गैर सरकारी संगठन तथा स्थानीय समुदाय ने मिलकर एक अनूठा प्रयोग किया और सदियों पुराने अभिशाप खुले में शौच से मुक्ति पायी | इस मॉडल की कहानी साझा करने का मकसद यही है के इससे भारत में बाकी जगहों पर भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है | इसी तरह यदि हर जगह एकजुटता से कार्य किया जाय तो वह दिन दूर नहीं जब सारा भारत खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा  |  

आर्य शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता) 
                        theshubhamhindi@gmail.com

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