Saturday, July 23, 2016

वामपंथी तथा पश्चिमी शिक्षा-व्यवस्था : अलगाववादी राजनीती की मूल जड़


-आर्य शुभम वर्मा

भारत में आज दलित अत्याचार का मुद्दा गरमाया हुआ है | इसी तरह कभी भारत को महिला विरोधी देश तो कभी अल्पसंख्यक विरोधी देश का जामा पहना दिया जाता है | पर क्या यह देश सचमुच दलित विरोधी, अल्पसंख्यक विरोधी या महिला विरोधी है , यह बात गौर करने वाली है| यहाँ सदियों से नारियों की पूजा होती आई है तथा भारत को भी पिता नहीं भारत माता  कहा जाता है | इसी तरह यह वह देश है जहाँ एक ब्राह्मण चाणक्य ने एक शुद्र चन्द्रगुप्त मौर्या को राजा बना दिया था तथा राम ने शबरी के झूठे बैर  खाए थे | यहाँ वेद–व्यास, वाल्मीकि, कबीर, रविदास आदि जैसे कई महान संत हुए हैं जो शुद्र जाती से थे परन्तु उनका सम्मान सारे देश ने किया | यहाँ दारा शिकोह, अशफाकुल्लाह खान, बहादुर शाह ज़फर से लेकर अब्दुल कलाम तक इस मुल्क के हिन्दुओं ने सभी मुसलमानों के साथ मिलकर जीवन जिया | पर अचानक अंग्रेजों के आने के बाद और कुछ पश्चिमी ताकतों के शिक्षा पर हावी होने के बाद देश को खंड-खंड में बांटने की राजनीति शुरू हो गयी | इसका मूल कारण है वामपंथी तथा पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था |

उदाहरण के तौर पर भारत की शिक्षा व्यवस्था में अधिकतर बड़े विश्विद्यालयों में कला क्षेत्र के सामाजिक विज्ञान में बच्चों को शुरू से यह पढाया जाता है के- भारत एक ऐसा देश है जहाँ हमेशा से दलितों पर अत्याचार होते आये हैं | इन अत्याचारों को साबित करने के लिए अक्सर शम्भूक (रामायण), एकलव्य और कर्ण (महाभारत), अम्बेडकर आदि के उदाहरण दिए जाते हैं | इसके बाद मनुस्मृति तथा वर्ण व्यवस्था को गाली देते हुए वामपंथी दलित चिन्तक बात को घुमा फिरा  कर हिन्दू धर्म और ऋग वेद से जोड़ देते हैं | अंत में निष्कर्ष यह निकाला जाता है की हिन्दू धर्म में आधारित जाती व्यवस्था ही दलित शोषण की जड़ है, तथा जब तक हिन्दू धर्म रहेगा तब तक जाती प्रथा रहेगी और तब तक दलितों पर अत्याचार होता रहेगा , अतः यदि शोषण समाप्त करना है तो हिन्दू धर्म को समाप्त कर दिया जाए क्योंकि यह पूरी तरह ब्राह्मणों के कब्जे में हैं और वो सबको गुलाम बना कर रखना चाहते हैं |


यह पूरी बात जो मैंने कुछ शब्दों में ऊपर लिखी है, यह समझाने के लिए कई सामाजिक विज्ञान, समाज कार्य तथा समाजशास्त्र पढ़ाने वाले बड़े विश्वविध्यालय २-३ साल का समय लेकर या कई बार पीएचडी करने तक युवाओं के मन में भरते चले जाते हैं | इससे ना सिर्फ हिन्दुओ के प्रति नफरत बच्चों के मन में पैदा होती है बल्कि भारत की हर प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति भी इनके मन में नफरत का भाव पैदा होता है | क्योंकि यह शिक्षक बहुत खूबसूरती से हर प्राचीन भारतीय संस्कृति को हिन्दुओं से जोड़ चुके होते हैं ( जैसे वेद, उपनिषद, संस्कृत, पुराण, नालंदा आदि )| इस तरह की पढाई का नतीजा दो तरह के छात्रों के रूप में बाहर आता है –
पहले वो छात्र जिन्होंने हिन्दू धर्म या भारतीय संस्कृति के बारे में घर में कभी ज्यादा पढ़ा या जाना नहीं होता | यह छात्र पूर्ण रूप से हिन्दू विरोधी तथा भारतीय संस्कृति के विरोधी हो जाते हैं और ऊंची जातियों को गालियाँ देने लगते हैं तथा हिन्दू धर्म को नष्ट करना ही उनके अकादमिक पेशे का लक्ष्य बन जाता है | यह जिस भी एनजीओ, संस्था , अख़बार , मीडिया आदि में काम करते हैं , यह हमेशा इसी फ़िराक में रहते हैं के किसी तरह से दलितों के शोषण का सहारा लेकर ब्राह्मणों और ऊँची जाती और हिन्दुओं के खिलाफ बोला या लिखा जाय | इस तरह के छात्रों से वामपंथी बहुत खुश रहते हैं तथा कई बार उन्हें अपने साथ या तो छात्रवृत्ति दे देते हैं या फिर उन्हें सहायक-प्राध्यापक बना लेते हैं | इन छात्रों को चीन, पाकिस्तान, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका भी कई तरह की नौकरी और छात्रवृत्ति प्रदान करते हैं ताकि यह उनकी छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वार) रणनीतियों में भारत को तोड़ने के काम आ सकें | उदाहरण के तौर पर फोर्ड फाउंडेशन, एमनेस्टी इंटरनेशनल, ग्रीन पीस, कश्मीर के अलगाववादी एनजीओ आदि इन लोगों को बहुत सी छात्रवृत्ति या नौकरियाँ प्रदान करते हैं  |

दुसरे वो छात्र होते हैं जो या तो थोडा बहुत भारत और भारतीय संस्कृति तथा धर्म के विषय में पढ़े होते हैं या फिर घर में इन्हें कुछ धार्मिक संस्कार मिले होते हैं| जिसके कारण इन्हें हिन्दू धर्म तथा भारत की थोड़ी बहुत समझ होती है | इन छात्रों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में मेकाले समर्थक तथा वामपंथी समर्थक शिक्षको द्वारा रोज अपमानित किया जाता है | जब भी यह इनके धर्म या संस्कृति का पक्ष लेने का प्रयास करते हैं तब इन्हें तुरंत चुप कराकर बैठा दिया जाता है या अन्य छात्रों के सामने बेईज्ज़त किया जाता है | इसका नतीजा यह होता है के ३ साल या ५ साल में नम्बर प्राप्त करने तथा कैंपस में बैठने के लालच में यह विरोध करना बंद कर देते हैं | पर मन ही मन देश तथा धर्म के अपमान का घूंट रोज पीकर हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं तथा खुद को सेक्युलर कहने लगते हैं | यह छात्र बोलते हैं हम नास्तिक है हमें हिन्दू धर्म से लेना देना नहीं है | इनके मन में हीन भावना इस हद तक बैठ जाती है के इन्हें सच में लगने लगता है के इनकी जाती , इनका धर्म और इनकी संस्कृति ही भारत की समस्याओं की मूल जड़ है तथा ये इस विषय में किसी से चर्चा करने में भी डरने लगते हैं | इन्हें डर लगने लगता है की जैसे ही यह भारत की सभ्यता या संस्कृति की बात करेंगे, तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवी लोग इन्हें संघी गुंडा, तालिबानी या अराजक तत्व कहकर बुद्धिजीवी वर्ग से जात-बाहर कर देंगे | इनमे से कुछ छात्रों को कॉलेज से निकलने के बाद लगने लगता है के यह सब कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था दलितों ने या अन्य संप्रदाय के लोगों ने बनायीं है अतः वह बाहर निकलकर दलित या मुस्लिम विरोधी हो जाते हैं |

दुःख की बात यह है की इन दोनों ही तरह के छात्रों के मानसपटल पर भारत की संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति इज्जत बहुत कम रह जाती है तथा समाज को आपस में बांटने की प्रवृति अधिक बढ़ जाती है | अपने धर्म के प्रति इनके मन में सम्मान की भावना ना के बराबर शेष रह जाती है | इसका मूल कारण वह शिक्षा होती है जो इन्हें कालेजो में दी जाती है | इन्ही में से कई छात्र अनजाने में ही कई ऐसे कई पक्षपात पूर्ण शोध कर बैठते हैं जो दुसरे देशों में भारत की छवि को धूमिल कर देते हैं | यही कारण है के दुनिया में भारत की छवि कभी सपेरों का देश, कभी जादू टोना करने वालों का देश, कभी महिला विरोधी तथा बलात्कारी देश तो कभी दलित वर्ग का शोषण करने वाले देश की बना दी जाती है | इससे ना सिर्फ भारत की छवि दुनिया में धूमिल होती है बल्कि भारत में आ रहे विदेशी निवेश पर भी इसका गहरा असर होता है तथा इसमें भारी कमी होती है | यह भी एक कारण है के हमारे दुश्मन देश कई बार ऐसे शोधकर्ताओं को पैसा एवं पुरूस्कार देते हैं, जिससे भारत विश्व की बड़ी शक्ति ना बन सके  |

मेकाले के समय से इस तरह की शिक्षा की शुरुआत हुई है | उस समय अंग्रेजो ने भारत के आत्मसम्मान को गिराने तथा अंग्रेजों के प्रति सम्मान को बढाने के नजरिये से इस शिक्षा की शुरुआत की थी | पर अफ़सोस की बात है के भारत की आजाद होने तक कई सारे लोग इसी शिक्षा में पढ़ लिखकर हमारे सारे विश्वविद्यालयों में शिक्षक तथा प्राध्यापक बन गए और बाद में इन्होने अंग्रेजों के ही द्वारा कराई गयी रिसर्चों को आगे बढाया जैसे सती-प्रथा, दलित शोषण, मनुस्मृति में कमियां आदि| बाद में वामपंथियों ने इसे ही आगे बढाया क्योंकि इसमें उनका राजनैतिक हित भी था | पर आज इसी कारण देश कई समुदायों में बंट गया है कहीं दलित-ब्राह्मण लड़ रहे हैं, कही द्रविड़-आर्य, कही उत्तर पूर्वी राज्यों में विरोध चल रहा है , कहीं मूलनिवासी के नाम पर आदिवासियों में नफरत का जहर भर कर उन्हें नक्सलवाद उया उग्रवाद में धकेला जा रहा है | आज जरुरत है भारत की शिक्षा नीति में बदलाव की, आज जरुरत है देश की सोच में बदलाव की |

आज भारत में जितने भी देश विरोधी आन्दोलन चल रहे हैं असल में इनमे से कई युवा देशद्रोही नहीं हैं बल्कि इनके दिमागों में अलगाववादी शिक्षा के द्वारा जहर भरा गया है चाहे यह कश्मीरी अलगाववादी हों, नक्सलवादी हों या फिर तमिलनाडु में ‘आर्य या हिंदी’ विरोधी संगठन , इसी तरह कई आन्दोलन जो दलित पुनरुत्थान या महिला सशक्तिकरण के नाम से चल रहे हैं इनमे से कई विदेशी चंदे से तथा विदेशियों के इशारे पर, या तो भारत को आपस में बांटने, या फिर आपस में लड़ाने के लिए चल रहे हैं | इनमे काम करने वाले अधिकतर भोले भाले लोगों को पता ही नहीं है के अनजाने में वो भारत तोड़ने की बड़ी साजिश का हिस्सा बनते जा रहे हैं | अतः सरकार को इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इस शिक्षा को नयी शिक्षा नीति में सख्ती से बदलने के विषय में सोचना चाहिए ताकि भारत का भविष्य अंधकार में जाने की जगह सही दिशा में जाए | हमारे युवा ही हमारी शक्ति हैं तथा इन्ही के दम पर भारत विश्वगुरु बनेगा पर यदि इन्हें ही ऐसी शिक्षा दी गयी के यह- भारत तेरे टुकड़े होंगे ...., हमें चाहिए भारत से आजादी ......, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी .... आदि नारे लगाने लगे, तो भारत की अस्मिता तथा अखंडता को अन्दर से ही खतरा हो जायेगा, तथा सोवियत यूनियन की तरह हमारे देश के टुकड़े होने से भी कोई नहीं रोक पायेगा | अतः सभी भारतियों को इस विषय में सोच कर सही और गलत का फैसला लेना चाहिए तथा जहाँ भी इस तरह की जहरीली शिक्षा मिल रही हो उन संस्थानों का बहिष्कार करना चाहिए , तथा सरकार को चाहिए के नयी शिक्षा नीति में भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्रीयता पर  आधारित शिक्षा का प्रचार प्रसार देश में करें, जिससे देश के गौरवमयी इतिहास का पुनर्जागरण करके , देश को पुनः सोने की चिड़िया बनाया जा सके |

लेखक
आर्य शुभम वर्मा
theshubhamhindi@gmail.com


Friday, July 22, 2016

मध्यप्रदेश के विदिशा के युवाओं ने उठाया स्वच्छता का बीड़ा |


-शुभम वर्मा

यह कहानी है मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की, जहाँ पर २ साल पहले तक सड़कों पर काफी गंदगी पड़ी रहती थी तथा मोहल्ले की गलियों में कोई न कोई एक ऐसा स्थान होता था जहाँ सारा मोहल्ला अपना कचड़ा डालता था तथा उसमे कीड़े, मच्छर इत्यादि भिनभिनाते रहते थे | यही नहीं शहर की दीवारों पर भी या तो गुटखे के थूकने के निशान या फिर छोटे मोटे नेताओं के पोस्टर या अश्लील फिल्मो के पोस्टर चिपके पड़े रहते थे | इन चीजों से सारा शहर परेशान था, लोग जागरूक भी थे पर नौकरी और अन्य पेशों में व्यस्त रहने के कारण लोग इस ओर कम ही ध्यान दे पा रहे थे तथा पूरी जिम्मेदारी नगरपालिका पर छोड़ दी थी | नगरपालिका ने सड़के साफ़ भी करी मगर दीवारों और मोहल्ले की गलियों में जो जनता गंदगी करती थी उसका हल नगरपालिका के पास भी न था |


इन्ही सब को देखते हुए एक बार शहर के स्कूल तथा कॉलेज के कुछ बच्चे एकत्रित हुए | यह मौका था मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान का , इसी समय इन बच्चों ने मोहल्ले की कुछ गालियाँ साफ़ की तथा सफाई पर नुक्कड़ नाटक किया | पर इसके बाद जब एक दिन यह सब मिले तो देखा लोगों ने फिर शहर गन्दा कर दिया, तब इन सभी बच्चों ने यह ठान लिया के अब तो इस शहर को साफ़ करके ही रहेंगे | शुरुआत इन्होने मोहल्ले की एक दीवार से की जिसके आस पास का कचड़ा साफ़ करके इन्होने उस दीवार को सुन्दर कलाकृतियों से रंग दिया | इसके बाद इन्होने शहर का रेलवे स्टेशन पूरा साफ़ किया तथा उसकी दीवारों को खूबसूरत रंगों में रंग दिया और गमले और पेड़ पौधे लगाकर रेलवे स्टेशन को सजा दिया | यही नहीं इनकी इस पहल को देखकर शहर के लोग भी इनकी मदद के लिए उमड़ पड़े तथा इनका छोटा सा समूह कई युवाओं से भर गया | इसके बाद इन्होने शहर के हर कोने को हर गली और दीवाल को स्वच्छ बनाने का बीड़ा उठा लिया | यह सभी बच्चे सप्ताह में ६ दिन अपनी पढाई नौकरी आदि करते हैं तथा सन्डे और अन्य छुट्टी वाले दिनों में दिन भर शहर की गंदगी को साफ़ करते हैं तथा दीवारों को खुबसूरत कलाकृतियों से रंग देते हैं |



बच्चों के इस काम में शहर के प्रशासन का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है तथा प्रशासन इन्हें रंग तथा मशीने आदि मुहैया करवा रहा है और कोल्लेक्ट्र से लेकर नगर पालिका के अधिकारी तक इनके साथ आकर दीवारों को रंगते देखे जा सकते हैं | अब तक यह बच्चे विदिशा शहर के 86 स्थानों को परिवर्तित कर चुके हैं | तथा इन्होने अपनी समिति का नाम ‘समर्पित सेवा समिति’ रखा है| इनसे आस पास के गाँव के लोग भी प्रेरणा ले रहे हैं तथा स्वच्छ भारत अभियान के तहत भारत को स्वच्छ बनाने में लगे हुए हैं | समर्पित के सभी बच्चों के समर्पण को कोटि कोटि नमन तथा और शहर के बच्चे और युवा भी यदि इनसे प्रेरणा लें तो सारा देश स्वच्छ हो जायेगा |

-शुभम वर्मा
theshubhamhindi@gmail.com

Wednesday, July 6, 2016

बांगलादेशी हिन्दू और इस्लामिक स्टेट


-शुभम वर्मा

१९४७ में भारत के दो महत्वपूर्ण टुकड़े भारत से अलग कर दिये गए, तथा दोनों को पाकिस्तान बना दिया गया | इनमे से एक टुकड़ा जो की बंगाल के निकट था, इसमें पाकिस्तान ने जबरन इस्लामिक कट्टरता और उर्दू को थोपना शुरू कर दिया | इसके विरोध में सारे इलाके से विरोध के स्वर उठने लगे | इन्हें दबाने के लिए सबसे पहले वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याएं हुई तथा बाद में कई बंगालियों की भी हत्या पाकिस्तान की सेना द्वारा करवाई गयी | इसके विरोध में सारे पूर्वी पाकिस्तान में विरोध के स्वर उठने लगे, जिन्हें दबाने के लिए कई करोड़ लोगों की हत्या पाकिस्तानी सेना ने करवा दी तथा सारे इलाके में जनता पर अत्याचार, बलात्कार आदि होने लगे तथा लोग मुल्क छोड़ कर भागने पर मजबूर होने लगे | पड़ोसी मुल्क की इस समस्या को देखते हुए भारत ने मानवता दिखाते हुए अपने पड़ोसी मुल्क की मदद की तथा सेना भेजकर उन्हें पाकिस्तान के आतंक से मुक्त करवाया |

4 नवम्बर १९७२ में बांग्लादेश के संविधान का गठन लोकतान्त्रिक मूल्यों के आधार पर हुआ तथा ‘राष्ट्रवाद’, ‘समाजवाद’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों को बंगलादेशी संविधान की प्रस्तावना के दूसरे पैराग्राफ में समाहित किया गया |[i] मगर बहुमत के दबाव में आकर ७ जून १९८८ को बांग्लादेश के संविधान में परिवर्तन करके दूसरे पैराग्राफ के क्लोज-ए के तहत इस्लाम को बांग्लादेश का राष्ट्रीय मजहब घोषित कर दिया गया तथा दुसरे मजहबों के साथ शांति से रहने की बात लिखी गयी | पर यह सिर्फ बात तक ही सीमित यह गयी तथा इसके बाद बहुमत की राजनीती के तहत हिन्दू अल्पसंख्यकों की हत्या का सिलसिला बांग्लादेश में शुरू हो गया | यह इस हद तक बड़ता चला गया के हत्या, बलात्कार आदि आम होते चले गए तथा इसका नतीजा यह निकला के जिन हिन्दुओं की जनसँख्या १९७४ में १३. ५% थी वही जनसँख्या २०११ में घट कर ८.५% रह गयी | इसी बांग्लादेश में यह जनसँख्या १९६१ में १८.५% थी जो की १९७४ तक पाकिस्तान की हत्याओं के कुचक्र के कारण घटकर १३.५% प्रतिशत रह गयी थी | पर बांग्लादेश बनने के बाद भी इसमें इजाफा होने की जगह कमी ही देखी गयी तथा यह कमी निरंतर बढती ही जा रही है | १९०१ से बांग्लादेश के क्षेत्र में रहने वाली हिन्दू जनसँख्या के आंकड़े यदि देखे जाए तो यह चौका देने वाले हैं :

एक सदी के अन्दर जहाँ एक तबके की जनसँख्या लगभग २३% तक बढ़ी है उसी क्षेत्र में हिन्दुओं की जनसँख्या लगभग २५% घट गयी है | इसके क्या कारण हैं इनकी जांच करने पर कई हत्या, बलात्कार तथा अन्य अत्याचारों के मामले सामने आते हैं |

९ मार्च २०१३ की बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार – “कुछ हिन्दुओ का कहना है के उनपर हमले तथा अत्याचार सुनियोजित ढंग से हो रहे हैं जिसका मुख्य उद्देश्य उनकी संपत्ति तथा जमीन हड़पना है | इन सबके डर से कई बंगलादेशी हिन्दू भारत की ओर भाग रहे हैं |”

इसी रिपोर्ट के मुताबिक- बांग्लादेश की आज़ादी के समय पाकिस्तानी सेना ने लगभग ३० लाख से ज्यादा लोगों की हत्या की थी तथा १० हजार से ज्यादा औरतों के साथ बलात्कार किये थे | इनमे अधिकतर हिन्दू ही थे क्योंकि पाकिस्तान को लगता था इनके कारण बांग्लादेश अलग हुआ | आज तक यह सिलसिला जारी है जिसमे कई मंदिर तोड़े जा रहे हैं तथा हिन्दुओं की हत्याएं हो रही हैं |[iii]

यदि यह सिर्फ कट्टर इस्लामी संगठनो का काम होता तो समझा भी जा सकता था के वो आतंकवादी हैं पर सबसे खतरनाक बात यह है के बांग्लादेश की राजनैतिक पार्टियाँ भी इन सब को खुला समर्थन दे रही हैं जिनमे सबसे पहले है आवामी लीग जो की मुख्य दलों में से एक है तथा अन्य मजहबी संगठन भी हिन्दुओं की हत्या का खुला समर्थन करते नजर आ रहे हैं  |

हाल ही में बांग्लादेश के सथखीरा जिले में ४८ साल के श्री श्री राधा गोविंदा मंदिर के पुजारी भाबसिंधू रॉय पर रात को सोते समय धारदार हथियारों से हमला किया गया | जिसमे उनके सीने तथा पीठ पर वार किये गए | पिछले ही महीने इसी जिले में एक और पंडित 70 साल के आनंद गोपाल गांगुली की हत्या कर दी गयी थी | [iv]

हाल ही में हुए हमले में कई लोगों के साथ एक भारतीय लड़की तारिशी की हत्या कर दी गयी |[v] इसकी जिम्मेदारी आतंकी संगठनो ने ली है जो सारी दुनिया को इस्लामिक स्टेट में बदलना चाहते हैं | बांग्लादेश में इस्लामिक स्टेट अपने पैर जमा रहा है तथा ताकतवर होता जा रहा है | धीरे धीरे बांग्लादेश अलकायदा तथा इस्लामिक स्टेट के लिए जमीन बनता जा रहा है जहाँ आतंकवाद के पनपने की असीम संभावनाएं जन्म ले रही हैं |[vi] अंसार अल सीलम तथा जमात उल मुहहिद्दीन जैसे संगठन बांग्लादेश के अन्दर इन आतंकी संगठनो को पनपने में मदद कर रहे हैं |[vii]

भारत के लिए यह यह खतरे की घंटी है क्योंकि एक तरफ हम पाकिस्तान और चीन जैसे देशो के साथ सीमा पर मुश्किलों का सामना कर रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ जहाँ चीन ने नेपाल पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरु कर दिया है वहीँ दूसरी तरफ पाकिस्तान ने इस्लामिक कट्टरता का सहारा लेते हुते बांग्लादेश में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया है तथा इसी घोड़े पर सवार होकर इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन भी हमारे पड़ोस में आकर बैठ गए हैं | खतरा सिर्फ वहीँ से नहीं है | यह संगठन अब भारत के मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करके इन्हें इनके साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं | अभी हाल ही में NIA ने कुछ इस्लामिक स्टेट के सदस्य हथियार तथा नकली नोटों के साथ पकडे हैं |[viii] यदि इसी तरह पडोसी मुल्क में हिन्दुओं की हत्याएं होती रही तथा आतंकी वहाँ काम करते रहे तो निश्चित तौर पर यह आंच भारत तक भी जल्द ही पहुचेंगी | ऐसा हाल ही में उत्तर प्रदेश के कैराना तथा बंगाल के मालदा में देखा जा चुका है | भारत सरकार को चाहिए के जल्दी ही इस विषय में उचित कदम उठाये, तथा पडोसी मुल्कों में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों तथा आतंकी संगठनो के बढ़ते स्तर को संज्ञान में लेते हुए उचित विदेश नीति बनाये अन्यथा जिस तरह १९४७ में भारत के तीन टुकड़े हुए थे उसी तरह कुछ और टुकड़े करने के प्रयास विदेशी मुल्को द्वारा किये जा रहे हैं जो की भविष्य में खतरे की घंटी हैं |

-शुभम वर्मा
(09713760660)
theshubhamhindi@gmail.com





[i] Source: http://www.southasianrights.org/wp-content/uploads/2009/10/USE-OF-RELIGION-BY-MAJORITY-Final-for-web.pdf
[ii] Source: BBS Population Report, 1991, Ct from, Shishir Moral, Rights of Religious Minorities, in Hameeda Hossain (ed). Human Rights Bangladesh, 2000, Dhaka, Ain ‘O Salish Kendro, 2001, pp. 160. and Banladesh Bureau of Statistics (BBS) Literacy Assessment Survey 2011, May 2013, Stastistics and Informatics Division (SID) Ministry of Planning.

[iii] Source:  http://www.bbc.com/news/world-asia-21712655
[iv] http://www.ndtv.com/world-news/another-hindu-priest-stabbed-critically-wounded-in-bangladesh-1427108
[v] http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/dhaka-attack-tarishi-killed-with-friends-signs-of-torture-2890536/
[vi] http://www.publicdiplomacycouncil.org/commentaries/06-06-16/quotable-aminesh-roul-influence-islamist-social-media-bangladesh
[vii] http://www.livemint.com/Politics/IR34Zh0GhIqUXEdt9R1ggN/Bangladesh-killings-Homegrown-militants-exmajor-behind-a.html
[viii] http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/islamic-state-terror-module-busted-in-hyderabad-nia-raid/

Monday, June 13, 2016

जल संरक्षण – समग्र नीति की आवश्यकता


-शुभम वर्मा
जल संरक्षण या पानी को बचाना आज दुनिया में बड़ा मुद्दा बना हुआ है, पर किस तरह की मुर्खता जल संरक्षण के नाम पर फैलाई जा रही है इसकी तरफ लोगों का ध्यान ले जाना आवश्यक है | आज कई स्थानों पर सेमिनार, व्याख्यान आदि जल संरक्षण पर होते हैं तथा कई विद्यालयों की पुस्तकों में भी जल संरक्षण का जिक्र है | यह सुनने में बहुत ही अच्छा लगता है , पर इनमे से अधिकतर के विषयवस्तु या पाठ्यक्रम को जब देखा जाए तो पता चलता है की पानी की कमी को तो यह उचित तरह से दर्शाते हैं मगर पानी बचाने के आशय को समझ पाने में या समझा पाने में कई लोग असमर्थ हैं | यह इस बात से पता चलता है की जल संरक्षण के कार्यक्रमों में यह सब कहा जाता है -  नल बंद करो, टंकी से पानी मत बहने दो , नहाने में कम पानी का उपयोग करो, शौचालय का पानी साफ़ करके रिसायकल करना आदि | इसमें सिर्फ उस जल को बचाने की बात अधिकतर हो रही है जो लोग उपयोग कर रहे हैं | यह इसी तरह का तर्क है की आपके जूते छोटे हैं , अपने पैर काट लो |


शहरों में घरों पर जल बचाना भी आवश्यक कदम है, पर असल समस्या बरसात के जल के संरक्षण की है | हमारे घरों तक जल(पानी) - नदी, तालाब या जमीन से ही आता है और यदि इनमे जल सूख गया या जल स्तर कम हो गया तो हम कितना भी जल घरों पर बचा लें पर वो समाप्त हो ही जायेगा | इन सभी स्त्रोतों में जल मुख्यतः बरसात से ही आता है और कुछ जगहों पर हिमालय के बर्फ के पहाड़ों के पिघलने से यह जल प्राप्त होता है | यह जल सबसे अधिक शुद्ध और साफ़ होता है | यदि बरसात के जल को संरक्षित किया जा सके तो देश की सभी जल सम्बंधित समस्याएं सुलझ सकती हैं |

जब बरसात होती है तो बहुत सारा जल शहर या गाँव में आ जाता है पर इसे सँभालने या संरक्षित करने की उचित व्यवस्था ना होने के कारण यह जल बहकर दूर चला जाता है या समुद्र में मिल जाता है | कई जगह पर इसी कारण से सूखा पड़ जाता है तो कुछ निचले इलाकों में पानी भरने से बाढ़ आ जाती है | दोनों ही हालातों में काफी नुकसान होता है | सूखे या बाढ़ में सिर्फ मनुष्य की नहीं बल्कि पशु, पक्षी, पेड़ पौधे इत्यादि सभी प्रभावित होते हैं |

आज मराठवाडा और विदर्भ में किसान आत्महत्या के कई किस्से अखबारों में आये दिन छपते रहते हैं | पर दोनों ही इलाकों को यदि गौर से देखा जाये तो पता चलता है के एक तरफ मराठवाडा में सूखे का कारण बरसात का कम होना है तो दूसरी तरफ विदर्भ में बहुत अच्छी बरसात होने के बाद भी सूखा पढता है | विदर्भ के गाँवों चंदरपुर तथा सेवाग्राम आदि में जाकर पता चलता है की विदर्भ में बरसात के पानी का संरक्षण ना कर पाना जल संकट का मुख्य कारण है | विदर्भ के राजगढ़ गाँव के पूर्व सरपंच एवं समाजसेवी चंदू पाटिल जी बताते हैं की – यहाँ बरसात अच्छी होती है मगर जल संरक्षण के विषय में जागरूकता ना होने के कारण कई लोग तालाब, कुए या जल शिवार नहीं बनाते , जिसके कारण वर्षा का जल तुरंत वहां से बह जाता है और साल भर किसानो को सूखे का सामना करना पढता है | कुछ गाँव जहाँ जल संरक्षण का काम हो रहा है , वहां सूखे की समस्या नहीं आती | इसी तरह मराठवाडा में औरंगाबाद के पास के किनगाँव में लोगों ने जल संरक्षण के लिए कई छोटे छोटे बांध बनाये हैं जिसके बाद बरसात कम होने के बाद भी वहां बाकी गाँव की अपेक्षा पानी अधिक रहता है | इस गाँव में जल संरक्षण के लिए बांध बनाने में मदद करने वाले सिविल इंजिनियर अतुल चव्हाण जी बताते हैं – यहाँ पानी की बहुत समस्या होती है | कई बार २ साल में एक बार बरसात होती है | इसी लिए हम लोगों ने यहाँ छोटे छोटे बांध, जन समुदाय की मदद से सरकार से भी कम लागत में बनवाए और अब ना सिर्फ इस गाँव का जल स्तर बढ़ा है बल्कि किसान भी खुश हैं| [i]

इस तरह के कई उदाहरण देश भर में हैं जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है जैसे अन्ना हजारे जी का गाँव रालेगन सिद्धि आदि | देश में सबसे अच्छे उदाहरण यदि जल संरक्षण के देखे जाएँ तो उस जगह से आते हैं जहाँ सबसे सूखा प्रदेश है | राजस्थान में सदियों पहले से मरुस्थल होने के कारण जल संरक्षण पर बहुत ध्यान दिया गया है | यहाँ ना सिर्फ सरकारी योजनाओं में बल्कि लोगों के संस्कारों में जल संरक्षण आ चुका है | प्राचीन काल में राजस्थान में शहर के बीच जो महल बनाया जाता था उसकी छत तथा दीवारों के ऊपर से नालियाँ बनायीं जाती थी जो किलोमीटर तक लम्बी रहती थी और अंत में जाकर महल के नीचे एक बड़े कुंड में मिलती थी | जब बरसात होती थी तो इन नालियों के माध्यम से किले या महल की छतों पर मौजूद जल बहता हुआ कुंड तक आता था तथा इसमें इतना जल एकत्रित कर लिया जाता था जो की साल भर तक नगरवासियों के काम आ सके | इसी तरह सभी घरो की छतों को भी घरों के नीचे बने कुंड से जोड़ा जाता था जिसमे सारा पानी इकठ्ठा होता था |[ii] आज भी राजस्थान में जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में हर घर में एक टांका ( पानी का कुंड) बनाया जाता है, जिसमे बरसात के जल को संरक्षित किया जाता है तथा उस जल का प्रयोग साल भर तक उस घर के लोग करते हैं | इस तरह के प्रयोगों को सूखाग्रस्त इलाकों तक पंहुचाया जाना चाहिए |

महाराष्ट्र सरकार ने इसी आधार पर जल युक्त शिवार योजना प्रारंभ की है| इसमें महाराष्ट्र सरकार 252.२१ करोड़ रुपया खर्चा करने जा रही है| इस योजना के तहत महाराष्ट्र के हर गाँव में जल युक्त शिवार (छोटे तालाब) बनाए जायेंगे जिससे जलस्तर में सुधार हो तथा वर्षा के जल को संरक्षित किया जा सके |[iii] इसी के साथ महाराष्ट्र सरकार ने "मागेल त्याला शेततळे" योजना प्रारंभ की है जिसमे हर किसान अपने निजी खेत में भी तालाब खुदवा सकता है |[iv] यह योजनाएं जलसंरक्षण के क्षेत्र में बेहतरीन पहल हैं|

केंद्र सरकार ने भी पुरानी चली आ रही मनरेगा योजना में बदलाव करते हुए अब इसमें तालाब भी  खोदने की इजाजत दे दी है |[v] इसके तहत राजस्थान, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश , महाराष्ट्र आदि में टाँके, तालाब आदि खुदना प्रारंभ हो गए हैं | बरसात के बाद इन इलाकों में जब यह सभी तालाब भर जायेंगे तो निश्चित तौर पर देश के जलस्तर में सुधार होगा जिसका फायदा देश के किसानो को मिलेगा |

२०१९ तक भारत सरकार ने भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प भी लिया है, जिसके तहत करोड़ों शौचालय सरकार ने बनवा दिये हैं मगर झारखण्ड, उड़ीसा आदि के कुछ ग्रामीण इलाकों में लोग शौचालय बनने के बाद भी खुले में शौच करते हैं | कई समाजसेवी संस्थाएं इनकी मानसिकता बदलने का कार्यक्रम चला चुकी हैं मगर मूल समस्या पानी की है | झारखण्ड के सरायकेला (खरसावाँ) में खुले में शौचालय मुक्त ग्राम बनाने के लिए काम करने वाली एक समाज सेवी संस्था के सुजोय बताते हैं की -" हमने लोगों की मानसिकता बदलने के लिए 6 महीने काम किया तथा सभी लोग इस बात के लिए राजी हैं के खुले में शौच नहीं जाना चाहिए तथा सरकार ने शौचालय भी बनवा दिये हैं | मगर कुछ आदिवासी इलाकों में लोगों को पीने के पानी के लिए भी ३ किमी दूर तालाब तक जाना पढता है | इतनी दूर से शौचालय के लिए पानी लाने की अपेक्षा यह लोग तालाब के आस पास ही शौच जाते हैं | इनकी समस्या पानी की पाइपलाइन बिछाने से हल हो सकती है | मगर कई ग्रामीणों को डर है उसका बिल आएगा जो यह अत्यंत गरीबी के कारण चुका नहीं पायेंगे | इस समस्या का हल भी हमें सोचना चाहिए |"

भारत एक विशाल देश है तथा विविधताओं से भरा हुआ है अतः योजनाएं सारे देश में एक जैसी बनाने की जगह, हर जगह के हिसाब से उनके वातावरण तथा जलवायु के अनुरूप बननी चाहिए | झारखण्ड में इसी तरह से जल संरक्षण हेतु  हर ग्राम पंचायत में एक जल संरक्षण समिति बनायीं गयी है जिसमे "जल सहिया" नाम का एक पद बनाया गया | जल सहिया का अर्थ होता है "जल की मित्र" | जल सहिया गांव में पेयजल व स्वच्छता के लिए जिम्मेवार महिला होती है | यह आवश्यक है कि जल सहिया कोई महिला ही होगी, जो गांव की कोई भी विधवा या विवाहित महिला हो सकती है | उसे मैट्रिक पास होना चाहिए, उसकी उम्र 25-45 वर्ष के बीच होनी चाहिए| गांव में मैट्रिक पास महिला के नहीं होने की स्थिति में आठवीं पास महिला भी जल सहिया बन सकती है | जल सहिया को उसके कार्य के परिणाम व प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है| जल सहिया समुदाय के बीच पेयजल व स्वच्छता के लिए जिम्मेवार होती है | वह गांव के लोगों को शौचालय के उपयोग के बारे में जानकारी देने का कार्य करती है | खुले में शौच करने से लोगों को होनेवाली हानि से अवगत करना जल सहिया का कार्य है | विद्यालय और आंगनबड़ी में संपर्क कर बच्चों को साबुन से हाथ धोना, डंडी वाले लोटे का उपयोग करना, शौचालय का उपायोग करना आदि को लेकर जागरूकता लाना उसका काम है. उसे गांव के लोगों से संपर्क के दौरान जल जनित बीमारियों, कूड़ा-कचरा के निबटान, पेयजल का रख-रखाव, जलस्नेतों के संरक्षण और उसकी सुरक्षा की जानकारी देनी होती है, साथ ही वह बेकार पानी के निबटान के लिए योजना भी बनाती है | जल सहिया के चुनाव में जलभरवा या पनभरवा को या उनके पारिवारिक सदस्य को वरीयता दी जा सकती है| जल सहिया ग्राम जल व स्वच्छता समिति की कार्यकारी सदस्य व पदेन कोषाध्यक्ष का कार्य देखती है |, यह पद हर गाँव में एक महिला को दिया जाता है, जो घर घर जाकर जल की उपयोगिता ग्रामीणों को समझाती है तथा जल संरक्षण हेतु सभी को जागरूक करती है | [vi]झारखण्ड में कई जल सहिया इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रही हैं | इसी तरह के मॉडल हर प्रदेश सरकार अपनी अपनी जरूरतों के आधार पर बना सकती है |

महाराष्ट्र में कई बार आदर्श ग्राम के अवार्ड जीत चुके ग्राम हिवरे बाज़ार के पूर्व सरपंच पोपटराव पवार बताते हैं की - "हमारे गाँव में सभी समस्याएं जल संरक्षण के कारण ही हल हुई हैं | पहले हमने जल संरक्षण की दिशा में काम किये तालाब खोदे , वृक्षारोपण किया , ज्यादा पानी सोखने वाली गन्ने की फसल पर रोक लगायी | यह सब होने से गाँव का जल स्तर बढ़ा तथा जल स्तर बढ़ने से खेती में फायदा होने लगा | खेती में फायदा होने से गाँव में समृद्धि आई तथा लोगों के पास पैसा आने से उन्होंने शौचालय बनवाए एवं स्कूल और अस्पताल के हालात भी सुधरे | यह सब कुछ सिर्फ एक जल संरक्षण के कार्य से संभव हो सका |" इससे यह सिद्ध होता है के हर विकास का हर पहलू एक दुसरे से जुडा हुआ है , एक पहलू को नज़रअंदाज़ करके हम दुसरे पहलू में पुर्णतः सुधार नहीं कर सकते | अतः सर्वांगीण विकास या समग्र विकास हेतु एक समग्र नीति की आवश्यकता है, जिसमे मनुष्य, पशु , पक्षी, पर्यावरण सभी पहलुओं पर एक साथ काम किया जाए |   

शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता)
theshubhamhindi@gmail.com


सन्दर्भ सूचि :



[i]   पी.पी.आर.सी., नयी-दिल्ली की खुले में शौच मुक्त गाँवरिपोर्ट पर आधारित 
[ii]   आज भी खरे हैं तालाब अनुपम मिश्रा (१९९३)
[iii]   http://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/Jal-Yukta-Shivar-boosts- groundwater/articleshow/51654272.cms
[iv]   https://egs.mahaonline.gov.in/
[v] http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-1863790-2916492.html
[vi] http://www.jharkhand-panchayat.org/

Friday, June 10, 2016

मोसाद - इसराइल की ख़ुफ़िया संस्था

आज भारत में कई आतंकवादी हमले होते हैं तथा कई आतंकवादियों के नाम भारत ने लिख कर दुनिया भर को दिये हैं पर आज तक उनके खिलाफ पकिस्तान ने कोई कार्यवाही नहीं की | इसलिए अब दुसरे तरीकों के विषय में सोचना आवश्यक हो गया है | आइये जानते हैं इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के बारे में :

पिक्चर सोर्स : aajtak.intoday.in 

जब फिलिस्तीनी आतंकवादियो ने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक गेम्स विलेज में घुसकर 12 इस्राइली खिलाडियों की हत्या कर दी थी । तब तत्कालीन इस्राइली प्रधानमंत्री श्रीमती गोल्डा मायर ने कोई भी बयान नहीं दिया | उन्होंने सरे मृत खिलाडियो के घरवालो को खुद फोन करके कहा की हम बदला लेकर रहेंगे | उन्होंने अपनी गुप्तचर एजेंसी मोसाद को पूरी छुट दे दी, और कहा इस घटना में जितने लोग भी शामिल है, वो चाहे दुनिया के किसी भी देश में हो उनको जिन्दा नहीं रहने देना है |

इसके बाद मोसाद ने पता लगा लिया की इस हत्याकांड में 14 आतंकवादी शामिल थे तथा उनके साथ क्या किया पढ़िए :


१ - एक आतंकवादी सलाह खलिफ जेदाह में अपने परिवार के साथ रहता था । मोसाद ने उसके घर में रखे टेबल जिस पर फ़ोन रखा था, ठीक वैसा ही टेबल रख दिया और टेबल के अन्दर बम फिट करके उसका कनेक्शन फोन से जोड़ दिया, फिर उसके फोन की घंटी बजी उसने जैसे ही फोन उठाया उसके चीथड़े उड़ गए 2 - एक आतंकवादी अबू दयुद बेरुत में छुपा था .. मोसाद ने उसकी पूरी दिनचर्या पर नज़र रखी । वो एक क्लब में रोज जाता था । इजराइल ने अपने खतरनाक कमांडो को बेरुत भेजा, जिसमे सिर्फ 3 लोग थे, एक कमांडो बेंजामिन नेतान्याहू [जो बाद में इसराइल के राष्ट्रपति बने ] एक ख़ूबसूरत लड़की का भेष रखकर उस क्लब में नाच रहे थे जैसे ही वो आतंकवादी उनके करीब नाचने के लिए आया, बेंजामिन ने अपनी फुल्ली औटोमटिक गन से गोलियों की बौछार कर दी 15 लोग मरे गए, और बेंजामिन और उनका साथी जो उनको कवर कर रहा था लेबनानी पुलिस के नकली गाड़ी में फरार हो गए।
3 - एक आतंकवादी अमिन अल हिंदी को मोसाद ने अम्मान में उसके बिल्डिंग के नीचे गोलियों से भून दिया |
4 - अब बाक़ी बचे आतंकवादियो ने डरकर आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव भेजा। लेकिन गोल्डा मायर ने कुछ नहीं बोला चौथे आतंकवादी अबू फयाज, जो छुप कर हेलसिंकी में रहता था, उसे कार से कुचल कर मार दिया गया ।
5 -पाचवे आतंकवादी अली हसन सलामेह जो पेरिस में छुपा था, वही उसको साइनाइड जहर देकर मार दिया गया ।
6 - महमूद हम्शारी को दमिस्क में गोली मारी गयी ।
इस तरह गोल्डा मायर ने एक एक को चुन चुन कर पूरी दुनिया में मारा ।


यह तो सिर्फ एक उदाहरण है | ऐसे कई ख़ुफ़िया ओपरेशन मोसाद द्वारा किये जा चुके हैं |

भारत को भी अब बड़ते हुए खतरे को देखते हुए | नए तरीके अपनाना चाहिए जिससे भारत के नागरिक सुरक्षित रह सकें | तथा दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके की भारत भी कड़ा जवाब दे सकता है |

Thursday, June 2, 2016

R.O. water का लगातार सेवन भी बन सकता है मौत का कारण : जानिए कैसे ?


चिलचिलाती गर्मी में कुछ मिले  या ना मिले पर शरीर को पानी जरूर मिलना चाहिए।  अगर पानी RO का हो तो, क्या बात है !  परंतु *क्या वास्तव में हम आर. ओ.  के पानी को शुद्ध पानी मान सकते हैं* ?
*जवाब आता है बिल्कुल नहीं। और यह जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) की तरफ से दिया गया है।*
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि इसके लगातार सेवन से हृदय संबंधी विकार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में ऐंठन, सर दर्द आदि दुष्प्रभाव पाए गए हैं। यह कई शोधों के बाद पता चला है कि इसकी वजह से *कैल्शियम और  मैग्नीशियम पानी से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं* जो कि शारीरिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
RO के पानी के लगातार इस्तेमाल से शरीर मे विटामीन *B-12* की कमी भी होने लगती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर 500 टीडीएस तक सहन करने की छमता रखता है परंतु RO में 18 से 25 टीडीएस तक पानी की शुद्धता होती है जो कि नुकसानदायक है। इसके *विकल्प में क्लोरीन या अल्ट्रा फिल्ट्रेशन मेम्ब्रेन को रखा जा सकता है जिसमें लागत भी कम होती है एवं पानी के आवश्यक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं*। जिससे मानव का शारीरिक विकास अवरूद्ध नहीं होता।
जहां एक तरफ एशिया और यूरोप के कई देश RO पर प्रतिबंध लगा चुके हैं वहीं भारत में RO की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। और कई विदेशी कंपनियों ने यहां पर अपना बड़ा बाजार बना लिया है। स्वास्थय के प्रति जागरूक रहना और जागरूक करना ज़रूरी हैं। अब शुद्ध पानी के लिए नए अविष्कारों की जरूरत है। 
अगर आपके घर 500 टीडीएस तक का पानी आ राहा हो तो आपके RO कि जरूरत नही.

याद रखें की लम्बे समय तक RO  का पानी, लगातार पीने से, शरीर कमजोर और बिमारीयों का घर बन जाता है। अत: प्राकृतिक (खनीज युक्त) पानी परंपरागत तरीकों से साफ कर के पीना, हितकर है।

सोर्स :http://www.waterfyi.com/featured/w-h-o-ya-gonna-believe/

Thursday, March 17, 2016

"यदि कोई तुम्हे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो" - यह गाँधी ने नहीं कहा था | जानिए किसने कहा था ?

"यदि कोई तुम्हे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो"
यह बात महात्मा गाँधी ने नही कही थी | यह बात बाइबिल में लिखी है और यह शब्द जीसस क्राइस्ट के हैं |
जब महात्मा गाँधी ने आन्दोलनों में कदम रखा और पाया के अंग्रेज, गुलाम बनाये हुए देशों की जनता पर बहुत अत्याचार कर रहे हैं | तब उन्होंने अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण शासन से लड़ने का फैसला किया | पर जब गांधीजी ने इस विषय के अध्ययन शुरू किया तो उन्होंने पाया के जब भी अंग्रेजों के विरुद्ध कोई हथियारबंद क्रांति या हिंसक लड़ाई की जाती है, तो , अंग्रेज उसे बुरी तरह से कुचल देते हैं क्योंकि वो सेना और हथियार की तकत में बहुत आगे हैं | इसी के साथ गांधीजी ने यह भी देखा के १८५७ की क्रांति से लेकर १९१५ तक अंग्रेजों ने कई क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया या गोली मार दी तथा अपने प्रचारतंत्र द्वारा दुनिया के सामने उन्ही लोगों को गलत साबित कर दिया के ये हिंसा करते थे |
इसलिए गाँधी जी ने उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब देने की रणनीति अपनाई तथा अहिंसात्मक युद्ध शुरू कर दिया | वो अंग्रेजों के बनाये सारे कानून तोड़ते थे तथा अंग्रेजों के खिलाफ बोलते भी थे पर हिंसा नहीं करते थे और यदि अंग्रेज अहिंसक लोगों पर हमला करें या मारें तो मीडिया और दुनिया भर में अंग्रेजों की बहुत किरकिरी होती थी | इस तरह गाँधी जी ने अंग्रेजों को बहुत परेशान किया तथा देश भर में सारा माहौल अंग्रेजो के खिलाफ खड़ा कर दिया | इसके लिए उन्होंने चंपारण आन्दोलन , नील किसानो की लड़ाई, बारडोली आन्दोलन , सविनय अवज्ञा , असहयोग आन्दोलन , नमक कानून तोडना , भारत छोड़ो आन्दोलन आदि कई बड़े आन्दोलनों का सहारा लिया और अंग्रेजों को उन्ही के हथियार से मारा |
जब अंग्रेजों ने अहिंसा आन्दोलन को भी रोकने का प्रयास किया तब गाँधी जी ने उन्ही के धर्म की किताब से जीसस का यह वाक्य उन्ही के मुह पर मार दिया जिसमे लिखा था - "यदि कोई तुम्हे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो" और कहा ये अहिंसा तो जीसस कहते थे और अंग्रेज हमारे भारत में जीसस के विरुद्ध काम कर रहे हैं | इस बात से कई देशों के इसाई अंग्रेजों से गुस्सा हो गए तथा गाँधी के और भारत की आज़ादी के समर्थन में खड़े हो गए |
ऐसे थे हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गाँधी अतः हमें किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को गलत नहीं समझना चाहिए भले ही उन्होंने देश को आज़ादी दिलाने के लिए जो भी रास्ता अख्तियार किया हो | कोई भी छोटा या बड़ा नहीं था | जिन भी लोगों ने देश की आज़ादी में अपना योगदान दिया उन सभी महानुभावों को हम नमन करते हैं |

-आर्य शुभम वर्मा
theshubhamhindi@gmail.com