Monday, June 13, 2016

जल संरक्षण – समग्र नीति की आवश्यकता


-शुभम वर्मा
जल संरक्षण या पानी को बचाना आज दुनिया में बड़ा मुद्दा बना हुआ है, पर किस तरह की मुर्खता जल संरक्षण के नाम पर फैलाई जा रही है इसकी तरफ लोगों का ध्यान ले जाना आवश्यक है | आज कई स्थानों पर सेमिनार, व्याख्यान आदि जल संरक्षण पर होते हैं तथा कई विद्यालयों की पुस्तकों में भी जल संरक्षण का जिक्र है | यह सुनने में बहुत ही अच्छा लगता है , पर इनमे से अधिकतर के विषयवस्तु या पाठ्यक्रम को जब देखा जाए तो पता चलता है की पानी की कमी को तो यह उचित तरह से दर्शाते हैं मगर पानी बचाने के आशय को समझ पाने में या समझा पाने में कई लोग असमर्थ हैं | यह इस बात से पता चलता है की जल संरक्षण के कार्यक्रमों में यह सब कहा जाता है -  नल बंद करो, टंकी से पानी मत बहने दो , नहाने में कम पानी का उपयोग करो, शौचालय का पानी साफ़ करके रिसायकल करना आदि | इसमें सिर्फ उस जल को बचाने की बात अधिकतर हो रही है जो लोग उपयोग कर रहे हैं | यह इसी तरह का तर्क है की आपके जूते छोटे हैं , अपने पैर काट लो |


शहरों में घरों पर जल बचाना भी आवश्यक कदम है, पर असल समस्या बरसात के जल के संरक्षण की है | हमारे घरों तक जल(पानी) - नदी, तालाब या जमीन से ही आता है और यदि इनमे जल सूख गया या जल स्तर कम हो गया तो हम कितना भी जल घरों पर बचा लें पर वो समाप्त हो ही जायेगा | इन सभी स्त्रोतों में जल मुख्यतः बरसात से ही आता है और कुछ जगहों पर हिमालय के बर्फ के पहाड़ों के पिघलने से यह जल प्राप्त होता है | यह जल सबसे अधिक शुद्ध और साफ़ होता है | यदि बरसात के जल को संरक्षित किया जा सके तो देश की सभी जल सम्बंधित समस्याएं सुलझ सकती हैं |

जब बरसात होती है तो बहुत सारा जल शहर या गाँव में आ जाता है पर इसे सँभालने या संरक्षित करने की उचित व्यवस्था ना होने के कारण यह जल बहकर दूर चला जाता है या समुद्र में मिल जाता है | कई जगह पर इसी कारण से सूखा पड़ जाता है तो कुछ निचले इलाकों में पानी भरने से बाढ़ आ जाती है | दोनों ही हालातों में काफी नुकसान होता है | सूखे या बाढ़ में सिर्फ मनुष्य की नहीं बल्कि पशु, पक्षी, पेड़ पौधे इत्यादि सभी प्रभावित होते हैं |

आज मराठवाडा और विदर्भ में किसान आत्महत्या के कई किस्से अखबारों में आये दिन छपते रहते हैं | पर दोनों ही इलाकों को यदि गौर से देखा जाये तो पता चलता है के एक तरफ मराठवाडा में सूखे का कारण बरसात का कम होना है तो दूसरी तरफ विदर्भ में बहुत अच्छी बरसात होने के बाद भी सूखा पढता है | विदर्भ के गाँवों चंदरपुर तथा सेवाग्राम आदि में जाकर पता चलता है की विदर्भ में बरसात के पानी का संरक्षण ना कर पाना जल संकट का मुख्य कारण है | विदर्भ के राजगढ़ गाँव के पूर्व सरपंच एवं समाजसेवी चंदू पाटिल जी बताते हैं की – यहाँ बरसात अच्छी होती है मगर जल संरक्षण के विषय में जागरूकता ना होने के कारण कई लोग तालाब, कुए या जल शिवार नहीं बनाते , जिसके कारण वर्षा का जल तुरंत वहां से बह जाता है और साल भर किसानो को सूखे का सामना करना पढता है | कुछ गाँव जहाँ जल संरक्षण का काम हो रहा है , वहां सूखे की समस्या नहीं आती | इसी तरह मराठवाडा में औरंगाबाद के पास के किनगाँव में लोगों ने जल संरक्षण के लिए कई छोटे छोटे बांध बनाये हैं जिसके बाद बरसात कम होने के बाद भी वहां बाकी गाँव की अपेक्षा पानी अधिक रहता है | इस गाँव में जल संरक्षण के लिए बांध बनाने में मदद करने वाले सिविल इंजिनियर अतुल चव्हाण जी बताते हैं – यहाँ पानी की बहुत समस्या होती है | कई बार २ साल में एक बार बरसात होती है | इसी लिए हम लोगों ने यहाँ छोटे छोटे बांध, जन समुदाय की मदद से सरकार से भी कम लागत में बनवाए और अब ना सिर्फ इस गाँव का जल स्तर बढ़ा है बल्कि किसान भी खुश हैं| [i]

इस तरह के कई उदाहरण देश भर में हैं जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है जैसे अन्ना हजारे जी का गाँव रालेगन सिद्धि आदि | देश में सबसे अच्छे उदाहरण यदि जल संरक्षण के देखे जाएँ तो उस जगह से आते हैं जहाँ सबसे सूखा प्रदेश है | राजस्थान में सदियों पहले से मरुस्थल होने के कारण जल संरक्षण पर बहुत ध्यान दिया गया है | यहाँ ना सिर्फ सरकारी योजनाओं में बल्कि लोगों के संस्कारों में जल संरक्षण आ चुका है | प्राचीन काल में राजस्थान में शहर के बीच जो महल बनाया जाता था उसकी छत तथा दीवारों के ऊपर से नालियाँ बनायीं जाती थी जो किलोमीटर तक लम्बी रहती थी और अंत में जाकर महल के नीचे एक बड़े कुंड में मिलती थी | जब बरसात होती थी तो इन नालियों के माध्यम से किले या महल की छतों पर मौजूद जल बहता हुआ कुंड तक आता था तथा इसमें इतना जल एकत्रित कर लिया जाता था जो की साल भर तक नगरवासियों के काम आ सके | इसी तरह सभी घरो की छतों को भी घरों के नीचे बने कुंड से जोड़ा जाता था जिसमे सारा पानी इकठ्ठा होता था |[ii] आज भी राजस्थान में जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में हर घर में एक टांका ( पानी का कुंड) बनाया जाता है, जिसमे बरसात के जल को संरक्षित किया जाता है तथा उस जल का प्रयोग साल भर तक उस घर के लोग करते हैं | इस तरह के प्रयोगों को सूखाग्रस्त इलाकों तक पंहुचाया जाना चाहिए |

महाराष्ट्र सरकार ने इसी आधार पर जल युक्त शिवार योजना प्रारंभ की है| इसमें महाराष्ट्र सरकार 252.२१ करोड़ रुपया खर्चा करने जा रही है| इस योजना के तहत महाराष्ट्र के हर गाँव में जल युक्त शिवार (छोटे तालाब) बनाए जायेंगे जिससे जलस्तर में सुधार हो तथा वर्षा के जल को संरक्षित किया जा सके |[iii] इसी के साथ महाराष्ट्र सरकार ने "मागेल त्याला शेततळे" योजना प्रारंभ की है जिसमे हर किसान अपने निजी खेत में भी तालाब खुदवा सकता है |[iv] यह योजनाएं जलसंरक्षण के क्षेत्र में बेहतरीन पहल हैं|

केंद्र सरकार ने भी पुरानी चली आ रही मनरेगा योजना में बदलाव करते हुए अब इसमें तालाब भी  खोदने की इजाजत दे दी है |[v] इसके तहत राजस्थान, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश , महाराष्ट्र आदि में टाँके, तालाब आदि खुदना प्रारंभ हो गए हैं | बरसात के बाद इन इलाकों में जब यह सभी तालाब भर जायेंगे तो निश्चित तौर पर देश के जलस्तर में सुधार होगा जिसका फायदा देश के किसानो को मिलेगा |

२०१९ तक भारत सरकार ने भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प भी लिया है, जिसके तहत करोड़ों शौचालय सरकार ने बनवा दिये हैं मगर झारखण्ड, उड़ीसा आदि के कुछ ग्रामीण इलाकों में लोग शौचालय बनने के बाद भी खुले में शौच करते हैं | कई समाजसेवी संस्थाएं इनकी मानसिकता बदलने का कार्यक्रम चला चुकी हैं मगर मूल समस्या पानी की है | झारखण्ड के सरायकेला (खरसावाँ) में खुले में शौचालय मुक्त ग्राम बनाने के लिए काम करने वाली एक समाज सेवी संस्था के सुजोय बताते हैं की -" हमने लोगों की मानसिकता बदलने के लिए 6 महीने काम किया तथा सभी लोग इस बात के लिए राजी हैं के खुले में शौच नहीं जाना चाहिए तथा सरकार ने शौचालय भी बनवा दिये हैं | मगर कुछ आदिवासी इलाकों में लोगों को पीने के पानी के लिए भी ३ किमी दूर तालाब तक जाना पढता है | इतनी दूर से शौचालय के लिए पानी लाने की अपेक्षा यह लोग तालाब के आस पास ही शौच जाते हैं | इनकी समस्या पानी की पाइपलाइन बिछाने से हल हो सकती है | मगर कई ग्रामीणों को डर है उसका बिल आएगा जो यह अत्यंत गरीबी के कारण चुका नहीं पायेंगे | इस समस्या का हल भी हमें सोचना चाहिए |"

भारत एक विशाल देश है तथा विविधताओं से भरा हुआ है अतः योजनाएं सारे देश में एक जैसी बनाने की जगह, हर जगह के हिसाब से उनके वातावरण तथा जलवायु के अनुरूप बननी चाहिए | झारखण्ड में इसी तरह से जल संरक्षण हेतु  हर ग्राम पंचायत में एक जल संरक्षण समिति बनायीं गयी है जिसमे "जल सहिया" नाम का एक पद बनाया गया | जल सहिया का अर्थ होता है "जल की मित्र" | जल सहिया गांव में पेयजल व स्वच्छता के लिए जिम्मेवार महिला होती है | यह आवश्यक है कि जल सहिया कोई महिला ही होगी, जो गांव की कोई भी विधवा या विवाहित महिला हो सकती है | उसे मैट्रिक पास होना चाहिए, उसकी उम्र 25-45 वर्ष के बीच होनी चाहिए| गांव में मैट्रिक पास महिला के नहीं होने की स्थिति में आठवीं पास महिला भी जल सहिया बन सकती है | जल सहिया को उसके कार्य के परिणाम व प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है| जल सहिया समुदाय के बीच पेयजल व स्वच्छता के लिए जिम्मेवार होती है | वह गांव के लोगों को शौचालय के उपयोग के बारे में जानकारी देने का कार्य करती है | खुले में शौच करने से लोगों को होनेवाली हानि से अवगत करना जल सहिया का कार्य है | विद्यालय और आंगनबड़ी में संपर्क कर बच्चों को साबुन से हाथ धोना, डंडी वाले लोटे का उपयोग करना, शौचालय का उपायोग करना आदि को लेकर जागरूकता लाना उसका काम है. उसे गांव के लोगों से संपर्क के दौरान जल जनित बीमारियों, कूड़ा-कचरा के निबटान, पेयजल का रख-रखाव, जलस्नेतों के संरक्षण और उसकी सुरक्षा की जानकारी देनी होती है, साथ ही वह बेकार पानी के निबटान के लिए योजना भी बनाती है | जल सहिया के चुनाव में जलभरवा या पनभरवा को या उनके पारिवारिक सदस्य को वरीयता दी जा सकती है| जल सहिया ग्राम जल व स्वच्छता समिति की कार्यकारी सदस्य व पदेन कोषाध्यक्ष का कार्य देखती है |, यह पद हर गाँव में एक महिला को दिया जाता है, जो घर घर जाकर जल की उपयोगिता ग्रामीणों को समझाती है तथा जल संरक्षण हेतु सभी को जागरूक करती है | [vi]झारखण्ड में कई जल सहिया इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रही हैं | इसी तरह के मॉडल हर प्रदेश सरकार अपनी अपनी जरूरतों के आधार पर बना सकती है |

महाराष्ट्र में कई बार आदर्श ग्राम के अवार्ड जीत चुके ग्राम हिवरे बाज़ार के पूर्व सरपंच पोपटराव पवार बताते हैं की - "हमारे गाँव में सभी समस्याएं जल संरक्षण के कारण ही हल हुई हैं | पहले हमने जल संरक्षण की दिशा में काम किये तालाब खोदे , वृक्षारोपण किया , ज्यादा पानी सोखने वाली गन्ने की फसल पर रोक लगायी | यह सब होने से गाँव का जल स्तर बढ़ा तथा जल स्तर बढ़ने से खेती में फायदा होने लगा | खेती में फायदा होने से गाँव में समृद्धि आई तथा लोगों के पास पैसा आने से उन्होंने शौचालय बनवाए एवं स्कूल और अस्पताल के हालात भी सुधरे | यह सब कुछ सिर्फ एक जल संरक्षण के कार्य से संभव हो सका |" इससे यह सिद्ध होता है के हर विकास का हर पहलू एक दुसरे से जुडा हुआ है , एक पहलू को नज़रअंदाज़ करके हम दुसरे पहलू में पुर्णतः सुधार नहीं कर सकते | अतः सर्वांगीण विकास या समग्र विकास हेतु एक समग्र नीति की आवश्यकता है, जिसमे मनुष्य, पशु , पक्षी, पर्यावरण सभी पहलुओं पर एक साथ काम किया जाए |   

शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता)
theshubhamhindi@gmail.com


सन्दर्भ सूचि :



[i]   पी.पी.आर.सी., नयी-दिल्ली की खुले में शौच मुक्त गाँवरिपोर्ट पर आधारित 
[ii]   आज भी खरे हैं तालाब अनुपम मिश्रा (१९९३)
[iii]   http://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/Jal-Yukta-Shivar-boosts- groundwater/articleshow/51654272.cms
[iv]   https://egs.mahaonline.gov.in/
[v] http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-1863790-2916492.html
[vi] http://www.jharkhand-panchayat.org/

Friday, June 10, 2016

मोसाद - इसराइल की ख़ुफ़िया संस्था

आज भारत में कई आतंकवादी हमले होते हैं तथा कई आतंकवादियों के नाम भारत ने लिख कर दुनिया भर को दिये हैं पर आज तक उनके खिलाफ पकिस्तान ने कोई कार्यवाही नहीं की | इसलिए अब दुसरे तरीकों के विषय में सोचना आवश्यक हो गया है | आइये जानते हैं इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के बारे में :

पिक्चर सोर्स : aajtak.intoday.in 

जब फिलिस्तीनी आतंकवादियो ने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक गेम्स विलेज में घुसकर 12 इस्राइली खिलाडियों की हत्या कर दी थी । तब तत्कालीन इस्राइली प्रधानमंत्री श्रीमती गोल्डा मायर ने कोई भी बयान नहीं दिया | उन्होंने सरे मृत खिलाडियो के घरवालो को खुद फोन करके कहा की हम बदला लेकर रहेंगे | उन्होंने अपनी गुप्तचर एजेंसी मोसाद को पूरी छुट दे दी, और कहा इस घटना में जितने लोग भी शामिल है, वो चाहे दुनिया के किसी भी देश में हो उनको जिन्दा नहीं रहने देना है |

इसके बाद मोसाद ने पता लगा लिया की इस हत्याकांड में 14 आतंकवादी शामिल थे तथा उनके साथ क्या किया पढ़िए :


१ - एक आतंकवादी सलाह खलिफ जेदाह में अपने परिवार के साथ रहता था । मोसाद ने उसके घर में रखे टेबल जिस पर फ़ोन रखा था, ठीक वैसा ही टेबल रख दिया और टेबल के अन्दर बम फिट करके उसका कनेक्शन फोन से जोड़ दिया, फिर उसके फोन की घंटी बजी उसने जैसे ही फोन उठाया उसके चीथड़े उड़ गए 2 - एक आतंकवादी अबू दयुद बेरुत में छुपा था .. मोसाद ने उसकी पूरी दिनचर्या पर नज़र रखी । वो एक क्लब में रोज जाता था । इजराइल ने अपने खतरनाक कमांडो को बेरुत भेजा, जिसमे सिर्फ 3 लोग थे, एक कमांडो बेंजामिन नेतान्याहू [जो बाद में इसराइल के राष्ट्रपति बने ] एक ख़ूबसूरत लड़की का भेष रखकर उस क्लब में नाच रहे थे जैसे ही वो आतंकवादी उनके करीब नाचने के लिए आया, बेंजामिन ने अपनी फुल्ली औटोमटिक गन से गोलियों की बौछार कर दी 15 लोग मरे गए, और बेंजामिन और उनका साथी जो उनको कवर कर रहा था लेबनानी पुलिस के नकली गाड़ी में फरार हो गए।
3 - एक आतंकवादी अमिन अल हिंदी को मोसाद ने अम्मान में उसके बिल्डिंग के नीचे गोलियों से भून दिया |
4 - अब बाक़ी बचे आतंकवादियो ने डरकर आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव भेजा। लेकिन गोल्डा मायर ने कुछ नहीं बोला चौथे आतंकवादी अबू फयाज, जो छुप कर हेलसिंकी में रहता था, उसे कार से कुचल कर मार दिया गया ।
5 -पाचवे आतंकवादी अली हसन सलामेह जो पेरिस में छुपा था, वही उसको साइनाइड जहर देकर मार दिया गया ।
6 - महमूद हम्शारी को दमिस्क में गोली मारी गयी ।
इस तरह गोल्डा मायर ने एक एक को चुन चुन कर पूरी दुनिया में मारा ।


यह तो सिर्फ एक उदाहरण है | ऐसे कई ख़ुफ़िया ओपरेशन मोसाद द्वारा किये जा चुके हैं |

भारत को भी अब बड़ते हुए खतरे को देखते हुए | नए तरीके अपनाना चाहिए जिससे भारत के नागरिक सुरक्षित रह सकें | तथा दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके की भारत भी कड़ा जवाब दे सकता है |

Thursday, June 2, 2016

R.O. water का लगातार सेवन भी बन सकता है मौत का कारण : जानिए कैसे ?


चिलचिलाती गर्मी में कुछ मिले  या ना मिले पर शरीर को पानी जरूर मिलना चाहिए।  अगर पानी RO का हो तो, क्या बात है !  परंतु *क्या वास्तव में हम आर. ओ.  के पानी को शुद्ध पानी मान सकते हैं* ?
*जवाब आता है बिल्कुल नहीं। और यह जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) की तरफ से दिया गया है।*
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि इसके लगातार सेवन से हृदय संबंधी विकार, थकान, कमजोरी, मांसपेशियों में ऐंठन, सर दर्द आदि दुष्प्रभाव पाए गए हैं। यह कई शोधों के बाद पता चला है कि इसकी वजह से *कैल्शियम और  मैग्नीशियम पानी से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं* जो कि शारीरिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
RO के पानी के लगातार इस्तेमाल से शरीर मे विटामीन *B-12* की कमी भी होने लगती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर 500 टीडीएस तक सहन करने की छमता रखता है परंतु RO में 18 से 25 टीडीएस तक पानी की शुद्धता होती है जो कि नुकसानदायक है। इसके *विकल्प में क्लोरीन या अल्ट्रा फिल्ट्रेशन मेम्ब्रेन को रखा जा सकता है जिसमें लागत भी कम होती है एवं पानी के आवश्यक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं*। जिससे मानव का शारीरिक विकास अवरूद्ध नहीं होता।
जहां एक तरफ एशिया और यूरोप के कई देश RO पर प्रतिबंध लगा चुके हैं वहीं भारत में RO की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। और कई विदेशी कंपनियों ने यहां पर अपना बड़ा बाजार बना लिया है। स्वास्थय के प्रति जागरूक रहना और जागरूक करना ज़रूरी हैं। अब शुद्ध पानी के लिए नए अविष्कारों की जरूरत है। 
अगर आपके घर 500 टीडीएस तक का पानी आ राहा हो तो आपके RO कि जरूरत नही.

याद रखें की लम्बे समय तक RO  का पानी, लगातार पीने से, शरीर कमजोर और बिमारीयों का घर बन जाता है। अत: प्राकृतिक (खनीज युक्त) पानी परंपरागत तरीकों से साफ कर के पीना, हितकर है।

सोर्स :http://www.waterfyi.com/featured/w-h-o-ya-gonna-believe/