Monday, February 29, 2016

भारत रत्न – डॉ. राजेंद्र प्रसाद [ भारत के संविधान के जनक ]


-आर्य शुभम वर्मा

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद , अधिकतर लोग इस नाम को सिर्फ भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में जानते हैं , पर कई लोगों को यह शायद पता भी नहीं होगा के आज जो हम भारत में आजादी की सांस ले रहे हैं तथा दुनिया की सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं इसके पीछे बहुत बड़ा हाथ इस स्वतंत्रता सेनानी का है | आइये जानते हैं इस साधारण सा जीवन जीने वाले इस असाधारण व्यक्तित्व के बारे में –



डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म ३ दिसम्बर १८८४ को  बिहार के सिवान जिले में कायस्थ परिवार में हुआ था | कायस्थ परिवार में पैदा होने के कारण बचपन से ही परिवार में पढाई लिखाई का माहौल था | इनके पिता महादेव सहाय जी संस्कृत और फारसी के बहुत बड़े विद्वान् थे | इनकी माता श्रीमती कमलेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थी, इन्होने बचपन से ही राजेंद्र जी को रामायण की चौपाइया सुनाना तथा अन्य धार्मिक कथाएं सुनाना शुरू कर दिया था जिसका प्रभाव राजेंद्र प्रसाद जी के बाल मन पर पढ़ा तथा वे हमेशा धार्मिक और न्याय प्रिय रहे |

बचपन में स्कुल की शिक्षा इन्होने छपरा सरकारी विद्यालय से पूरी की , इसके बाद इन्होने कड़ी मेहनत से अच्छे अंकों के साथ परीक्षा उत्तीर्ण करके, कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया | कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनकी कड़ी मेहनत और लगन को देखकर उन्हें ३० रूपये प्रति माह की छात्रवृत्ति प्रदान भी की गयी | इस विश्वविद्यालय में विज्ञान की शिक्षा लेकर, १९०५ में राजेंद्र बाबु इस कॉलेज से बाहर आये, इनके छात्र जीवन के समय यह कितने मेधावी छात्र थे , इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की – एक बार इनके अध्यापक ने इनकी कॉपी जांचने के बाद रिमार्क लिखा था की  “उत्तर देने वाला छात्र , जांचने वाले से बेहतर है” | इसके बाद १९०७ में  इन्होने कलकत्ता विश्वविध्यालय से एम्.ए. इकोनॉमिक्स की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की |

इसके बाद इन्होने कई कॉलेजों में शिक्षक के रूप में कार्य किया |  बिहार के मुज्जफरपुर में लंगत सिंह कॉलेज में इन्होने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया फिर इसी कॉलेज में प्रिसिपल भी बने , इसके बाद इन्होने कानून की पढ़ाई करने के लिए यह नौकरी छोड़ दी तथा १९०९ में कलकत्ता में लॉ की पढाई करते हुए इन्होने इकोनॉमिक्स पढाना शुरू कर दिया | इसके बाद इन्होने ‘मास्टर्स इन लॉ’ को ना सिर्फ पूरा किया बल्कि इसमें गोल्ड मैडल हासिल किया | इसके बाद १९३७ में इन्होने  लॉ में डोक्टरेट की डिग्री, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से प्राप्त की | १९१६ में इन्होने बिहार और ओड़िसा हाईकोर्ट में वकालत का कार्य प्रारंभ किया | १९१७ में इन्हें पटना यूनिवर्सिटी में इन्हें सीनेट और सिंडिकेट का मेम्बर चुना गया |

१९१६ में यह पहली बार महात्मा गांधी से मिले | गांधीजी ने इन्हें चंपारण आन्दोलन में साथ देने के लिए कहा | इसमें गरीबों के हक़ की लड़ाई लड़ते हुए तथा देश का काम करते हुए यह इतने प्रभावित हुए के १९२० में इन्होने अपनी नौकरी तक छोड़ दी तथा पूरी तरह देश की आज़ादी की लड़ाई में कूद पढ़े | सिर्फ यही नहीं, महात्मा गाँधी ने जब विदेशी कॉलेजों के बहिष्कार की बात की, तब इन्होने इनके पुत्र को उसकी पढाई छुडवाकर बिहार विद्यापीठ में भर्ती करवा दिया जिसे कुछ भारतियों ने ही भारतीय संस्कृति के आधार पर बनाया था |

आजादी के लिए कार्य करते हुए राजेंद्र बाबु ने कई अख़बारों के लिए लेख लिखे | १९१४ में आई हुई बाड के कारण बिहार और बंगाल में काफी बर्बादी हुई थी | इसके लिए राजेंद्र प्रसाद जी ने बहुत सेवा कार्य किये | 15 जनवरी १९३४ को जब बिहार में भूकंप आया उस समय देश के लिए आन्दोलन करने के कारण इन्हें जेल में डाल दिया गया था तब इन्होने राहत कार्य करने की जिम्मेदारी इनके सहयोगी अनुराग narayanनारायण सिन्हा को सौंपी , २ दिन बाद जब वे जेल से छूटकर आये तब इन्होने १७ जनवरी १९३४ को बिहार सेंट्रल रिलीफ समिति की स्थापना की और खुद जगह जगह जाकर लोगों की मदद के लिए फण्ड इक्कठा किया | इसी तरह जब ३१ मई १९३५ को क्वेटा में भूकंप आया तब इन्होने सिंध और पंजाब के लिए क्वेटा सेंट्रल रिलीफ कमिटी का गठन किया |

अक्टूबर १९३४ में मुंबई अधिवेशन के दौरान इन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था | १९३९ में भी यह दूसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे | 8 अगस्त १९४२ को देश में गाँधी जी ने जब अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया तथा आन्दोलन शुरू किया , उस समय राजेंद्र प्रसाद जी ने उसमे सक्रिय भूमिका निभाई जिसके कारण उन्हें सदाकत आश्रम पटना से गिरफ्तार कर लिया गया तथा बिहार की बांकीपुर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया | इन्हें यहाँ पुरे ३ साल तक बंद रखा गया तथा 15 जून १९४५ को रिहा किया गया |

२ सितम्बर १९४६ को जब अंतरिम सरकार की घोषणा हुई, तब १२ महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक कृषि और खाद्य मंत्रालय राजेंद्र बाबु को मिला | ११ दिसम्बर १९४६ को इन्हें सर्वसम्मति से संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया | संविधान सभा का पूरा कार्यभार इनके कन्धों पर था | इन्होने कड़ी मेहनत करके संविधान सभा के सभी सदस्यों के मतों की रक्षा की तथा किसी के साथ भी भेदभाव नहीं होने दिया चाहे वो दलित हों, महिला हों या अल्पसंख्यक | सभी तरह के विचारों को इन्होने संविधान सभा में आने दिया तथा सभी का निष्पक्ष रहते हुए सम्मान किया | पहले डॉ भीमराव अम्बेडकर संविधान सभा के लिए नहीं चुने गए थे फिर महात्मा गाँधी के आग्रह पर राजेंद्र बाबु ने उन्हें भी इस सभा में उनके पक्ष को रखने तथा भारत का महान संविधान बनने का मौका दिया | यही नहीं राजेंद्र बाबु ने संविधान बनने के लिए जो समितियां बनायीं थी उसमे से मसौदा समिति का अध्यक्ष भी भीमराव जी को नियुक्त किया | इसके साथ साथ राजकुमारी कौर की बात को मानते हुए महिलाओं के सम्मान और समानता के अधिकार को भी इसमें डाला गया | यही नहीं संविधान सभा के अध्यक्ष होने के साथ साथ इसमें जितनी भी समितियां बनी थी उनमे से सबसे अधिक 4 समितियों को खुद  राजेंद्र बाबु संभाल रहे थे जिनके नाम हैं :-

·         Committee on the Rules of Procedure: Rajendra Prasad
·         Steering Committee: Rajendra Prasad
·         Finance and Staff Committee: Rajendra Prasad
·         Ad Hoc Committee on National Flag: Rajendra Prasad
[सोर्स – विकिपीडिया ]

इस तरह स्वतंत्र भारत के संविधान को बनने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राजेंद्र प्रसाद जी ने निभाई थी | यह बात और है के दलगत वोट बैंक की राजनीति के कारण , इस महान प्रतिभा के काम को अधिक सराहा नहीं गया क्योंकि इन्होने किसी ख़ास मजहब या जाती के लिए कार्य करने की जगह राष्ट्र के लिए कार्य किया था | लेकिन इतिहास पढने वालों को इनके योगदान की जानकारी अवश्य रहती है |

 १७ नवम्बर १९४७ में कृपलानी जी के इस्तीफे के बाद इन्हें तीसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था | आज़ादी के २.५ साल बाद २६ जनवरी १९५० को जब भारत का संविधान लागू हुआ , उस समय राजेंद्र प्रसाद जी को सर्वसम्मति से देश का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया | पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर इन्होजे निष्पक्ष होकर राष्ट्रपति के दायित्व को निभाया तथा यह 12 साल तक भारत के राष्ट्रपति रहे और १९६२ में इन्होने स्वयं राष्ट्रपति पद त्याग दिया तथा पटना में १४ मई १९६२ को बिहार विद्यापीठ के कैंपस में जाकर बस गए और साधारण जीवन जीने लगे | राजेंद्र प्रसाद जी को भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया है | २८ फ़रवरी १९६३ को यह परम आत्मा भारत की मिटटी में विलीन हो गयी |



भारत रत्न राजेंद्र प्रसाद जी भारत के उन महान सपूतों में से एक थे जिन्होंने अपना सारा जीवन देश के कल्याण में लगा दिया तथा भारत के भविष्य के लिए एक ऐंसा संविधान बनाया जिसके कारण आज भी हमें दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है | ऐसी महान प्रतिभा को सभी भारतियों का शत शत नमन |


Wednesday, February 10, 2016

हिवरे बाजार – एक आदर्श ग्राम की कहानी


-शुभम वर्मा

1988 तक जिन सरकारी लोगों से सरकार खुश नहीं रहती थी , उन्हें परेशान करने के लिए उनका तबादला इस गाँव में कर दिया जाता था | यहाँ आये दिन मार-पीट और झगडे हुआ करते थे तथा आधे से ज्यादा युवा शराब और जुएँ की लत में फंसे हुए थे | हर तरफ गंदगी फैली रहती तथा अशिक्षा और बेरोजगारी अपने चरम पर थी – पोपट राव पवार (सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व सरपंच , हिवरे बाजार)

यह कहानी है महाराष्ट्र के अहमदनगर में बसे हिवरे बाजार गाँव की – यहाँ 1988 तक हालात इतने बुरे हो चुके थे के कोई यहाँ रहना नहीं चाहता था | पानी ना होने के कारण , खेती भी बर्बाद हो गयी थी | उसी समय वहां के एक पढ़े लिखे युवा पोपट राव, जिनकी रूचि क्रिकेट खेलने में थी तथा जो राष्ट्रीय स्तर तक कई क्रिकेट टूर्नामेंट खेल चुके थे , इन्होने अपने दोस्तों के साथ गाँव के हालात पर चर्चा की | सभी युवाओं का मानना था गाँव के लिए कुछ करना चाहिए , पर सवाल वही के बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा | बातों बातों में ही सभी ने तय कर लिया के पोपट राव पढ़े लिखे हैं , इन्ही को सरपंच बनाया जाय और सारे गाँव ने मिलकर पोपट राव को अपना सरपंच चुन लिया | अब पोपट राव जो क्रिकेट में रूचि रखते थे तथा पुणे से पढ़े थे , उन्हें समझ नहीं आ रहा था के क्या किया जाय ?


फोटो : हिवरे बाजार ग्राम सांसद , पोपट राव पवार ( दांये से दुसरे )

एक तरफ अपना पुराना पूरा कैरियर तथा दूसरी तरफ गाँव के लोगों का भरोसा और गाँव के लोगों का भरोसा , कैरियर पर भारी पढ़ा तथा पोपट राव ने गाँव को बदलने का मन बना लिया | पोपट राव ने देखा के गाँव में गंदगी, अशिक्षा , बेरोजगारी , पानी की कमी , शराब आदि समस्याए हैं | इन्हें बदलने के लिए यदि वो अकेले कार्य करेंगे तो लोग बात नहीं सुनेगे अतः उन्होंने महात्मा गाँधी का ग्राम स्वराज्य का रास्ता अपनाया तथा गाँव के सभी लोगों को बैठाकर ग्राम सभा बुलाई एवं गाँव की सारी  शक्ति ग्राम सभा को सौंप दी गयी | अब यदि कोई भी शिक्षक या ग्राम सेवक गाँव में देर से आता या छुट्टी मारता तो ग्राम सभा फैसला लेकर उसकी तनख्वाह कटवा देती अतः सभी सरकारी कर्मचारी ठीक समय पर काम करने लगे | गाँव के लिए आ रहे पूरे फण्ड का ब्यौरा गाँव की ग्राम पंचायत की दीवार पर लिखा जाने लगा जिसमे रोज कितना खर्चा हुआ और कहाँ गया यह सब लिखा जाने लगा | इससे गाँव वालों के मन में गाँव के प्रति अपनेपन की भावना का विकास हुआ तथा लोगों ने भी जनभागीदारी से गाँव के कामो में सहयोग देना शुरू कर दिया | अब समस्याए थी गंदगी, शराब , खेती, बेरोजगारी आदि |

चूँकि बूढ़े लोगों की आदतों को बदलना बहुत मुश्किल था अतः शुरुआत स्कुल के बच्चों के साथ की गयी | सबसे पहले जिस मुद्दे को चुना गया वह था ग्रामीण स्वच्छता | इस समय सारा गाँव खुले में शौच करने जाता था जिससे सारे गाँव में गंदगी होती थी तब स्कुल में शौचालय बनाके बच्चों को बंद कमरे में शौच करने की प्रेरणा दी गयी | जिन बच्चो को डर लगता था उनके लिए दरवाजे को आधा काट कर , नए तरह के दरवाजे विकसित किये गए जिनमे नीचे से बंद एवं ऊपर जाली लगी होती थी , जिससे छोटे बच्चों को अँधेरे कमरे में बैठने से डर नहीं लगता था | यह आदत बच्चों में पढने के बाद , गाँव को भी इस विषय पर जाग्रत किया गया तथा इसमें बच्चों के निगरानी दल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | यह दल सभी को खुले में शौच करने पर रोकता था तथा समझाता था | धीरे धीरे करके सारा गाँव खुले में शौच से मुक्त हो गया | पंचायत ने सरकार और लोगों की मदद से सभी घरों का शौचालय बनाने का इकठ्ठा सामान माँगा लिया एवं उससे सभी के घरों के शौचालय बनाने का काम शुरू हो गया तथा उसकी निगरानी का काम भी सारा गाँव करता था अतः कोई ठेकेदार पैसे खाना और मिलावट करने जैसे काम नहीं कर पाता था वर्ना ग्राम सभा में उसे सजा भुगतनी पढ़ती थी |


पोपट राव जी बताते हैं –गाँव में सारे शौचालय बनने के बाद भी एक बार गाँव के एक बुजुर्ग खुले में शौच के लिए चले गए | उनको शौच जाते देख उनका पोता उनके पीछे गया तथा उनके शौच करने के बाद उन्ही के सामने उस बच्चे ने उनके मल को स्वयं अपने हाथों से उठाकर पन्नी में भरा तथा मिटटी डालकर उसे कूड़ेदान में फेक कर आ गया | उसके इस काम को देखकर दादा को इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई के उन्होंने फिर कभी खुले में शौच नहीं की | इसी तरह के कई उदाहरण बच्चों ने पेश किये जिससे ग्राम सभा में फैसला ले लिया गया के कोई खुले में शौच नहीं जाएगा तथा पुरे गाँव में कूड़ेदान लगा दिये गए एवं कही भी कचड़ा फेकने पर जुर्माना लगा दिया गया | यही नहीं बाद में गाँव में प्लास्टिक पर भी पाबन्दी लगा दी गयी | देखते ही देखते गाँव गन्दगी से मुक्त हो गया |

इसी तरह ग्राम पंचायत ने निर्णय लिया के शराब की दुकान भी गाँव में नहीं रहेगी | इस पर गाँव में बहुत चर्चा हुयी तथा अधिकतर लोगों, महिलाओं और बच्चों ने शराब बंदी के पक्ष में वोट किया और सभी लोगों को ग्राम पंचायत का निर्णय मानना पड़ा जिससे शराब बंदी और उसके कारण हो रही सट्टेबाजी भी गाँव से ख़त्म हो गयी | इसके बाद खेती की समस्या को दूर करने के लिए गाँव में जलसंचय का कार्य व्यापक स्तर पर किया गया | जिस गाँव में लोग पानी के लिए तरसते थे वहां सभी गाँव वालों ने मिलकर कई छोटे छोटे तालाब खोद दिये एवं पहाड़ पर भी पानी रोकने के लिए गड्ढे किये गए , जिससे जल का स्तर गाँव में बढ़ता चला गया | इसके अलावा गाँव के बच्चों ने गाँव के आस पास कई फलों के बीज बोये तथा उपयोगी पेड़ पौधों का रोपण किया इसके परिणाम स्वरुप, गाँव का जल स्तर काफी बढ़ गया तथा खेती में किसानो को फायदा होने लगा | अब इस गाँव में गौ पालन तथा दूध के उद्योग भी पनपने लगे तथा बेरोजगारी की समस्या भी हल हो गयी | आज इस गाँव में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है , ना ही यहाँ गंदगी है बल्कि यहाँ प्रति व्यक्ति साल में लाख रूपये तक कमाता है और समप्रदायिक सद्भावना इतनी है की- हिन्दुओं ने एकमात्र मुस्लिम परिवार के लिए एक मज्जिद बनाकर दी है | अब यहाँ पहले की तरह कोई लड़ाई झगडे भी नहीं होते | यह गाँव अपने सारे निर्णय ग्राम सभा करके लेता है तथा इसे आदर्श ग्राम के हजारों परुस्कार भारत सरकार से तथा दुनिया भर से मिले हैं |








हिवरे बाजार के अन्य रोचक निर्णय जो ग्राम सभा ने लिए हैं इस प्रकार हैं :-
  • गाँव की लड़की से जो भी बाहर वाला शादी करेगा उसका एच.आई.वी. टेस्ट होता है |
  • गाँव की जमीन कोई बाहर वाला बिना ग्राम सभा की इजाजत के नहीं खरीद सकता |
  • गाँव में सभी सरकारी कर्मचारियों , शिक्षकों आदि को ग्राम सभा को रिपोर्ट करना होता है |
  • गाँव में कोई शराब की दूकान नहीं खुल सकती |
  • छप्पर मुक्त अभियान से गाँव के हर घर में पक्की छत वाले मकान बना दिये गए |
  • फुकनी मुक्त अभियान के तहत बायो गैस तथा एलपीजी का प्रयोग गाँव में शुरू कर दिया गया |




अब गाँव वाले औषधिक पौधे लगाने का कार्य तेजी से कर रहे हैं | इनका लक्ष्य है २०२५ तक गाँव में एक भी मरीज नहीं होना चाहिए | पोपट राव जी के अनुसार अब तक गाँव में ३००० औषधिक पौधे रोपे जा चुके हैं |

गाँव के पूर्व सरपंच पोपट राव पवार कहते हैं – आज समग्र विकास की आवश्यकता है | किसी भी एक चीज को सुधारने से हल नहीं होगा | हमने जल संचय किया , उससे खेती में फायदा मिला , इससे पैसा आया जिससे लोगों ने अन्य व्यवसाय शुरू किये | ऐसे ही सफाई से एकजुटता आई | अतः सब कुछ एक दुसरे से जुड़ा हुआ है | हमें हर पहलू पर साथ में काम करना चाहिए जिससे गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य का सपना सच हो सके |

सचमुच , यह गाँव एक जनभागीदारी के द्वारा काम करने का एक अदभुत नमूना है तथा गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य के सपने को साकार करने वाला एक अदभुत उदाहरण है | इस गाँव के उदाहरण से देश भर के गाँव बहुत कुछ सीख सकते हैं |
शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता)
theshubhamhindi@gmail.com



Tuesday, February 9, 2016

अंगुल मॉडल : ओड़िसा में खुले में शौच मुक्त ग्राम बनाने की अनूठी पहल |

-आर्य शुभम वर्मा 

खुले में शौच मुक्त भारत बनाने की स्वच्छ भारत अभियान की मुहीम देश भर में चल रही है और देशभर में कई अनूठे प्रयोग इस दिशा में हो रहे हैं | इसी कड़ी में ओड़िसा के अंगुल जिले की अंगुल तालुका में कुशल नेतृत्व तथा जनभागीदारी का एक अनूठा उदाहरण सामने आया, जिसमे सदियों से चल रही खुले में शौच करने की परंपरा को बदल कर रख दिया तथा कई गावों को खुले में शौच से मुक्त कर दिया गया | इसमें तथा अफसर , सरकार, गैर सरकारी संगठन तथा ग्रामीण जनता, इन सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया | यह सब कुछ संभव हुआ एक कुशल नेतृत्व के कारण और समाज के लिए कुछ कर दिखाने की सोच के कारण | आखिर कौन था इस सोच के पीछे ?



फोटो : कुमुर्सिंघा , ओड़िसा की प्रथम, ‘खुले में शौच’ मुक्त ग्राम पंचायत |

सचिन जाधव , यह नाम है उस व्यक्ति का जिसने नामुनकिन से दिखने वाले इस कार्य को कर दिखाया | जब सचिन जाधव कलेक्टर के रूप में कोरापुट जिले से स्थानांतरित होकर अंगूल जिले में पहुंचे तब वहां के हालात बहुत खराब थे |  चारों तरफ से औद्योगिक क्षेत्र से घिरे होने के बाद भी अंगुल में बहुत गरीबी थी तथा गाँव में लोग खुले में शौच कर रहे थे | कलेक्टर होने के बाद भी सचिन जाधव ने जिनके पास पहले से जिले के कई काम थे , इस दिशा में सोचना प्रारंभ किया | इनका मानना था के यदि गाँव में शौचालय बन जाएँ तो गरीबों के मन में भी एक सम्मान का भाव जागेगा तथा खुले में शौच ख़त्म होने के साथ साथ गाँव वालों में, गाँव को साफ़ रखने की भावना भी जाग्रत होगी तथा इस कार्य के बहाने गाँव वालों को यदि एकजुट किया जा सके तो इसके बाद उन सबको कुपोषण, स्वरोजगार आदि मुहिमो से भी जोड़ा जा सकता है | यह सोचकर इन्होने इस कार्य को करना प्रारंभ किया |

शुरू में सरकारी विभाग के कई अफसरों ने इस काम को करने में ज्यादा रूचि नहीं दिखाई तथा गाँव वाले भी सदियों पुरानी खुले में शौच की प्रथा को त्यागने को तैयार नहीं थे | कई सारे विभाग आपस में समन्वय नहीं बैठा पा रहे थे , तथा कलेक्टर के मन में भी यह था के इसे कैसे किया जाय | तब उन्होंने निर्णय किया के यह शौचालय मुक्त ग्राम की परिकल्पना तभी सच हो सकती है जब इससे जुड़े सभी लोग एक साथ मिलकर काम करें | इसके लिए इन्होने जिला प्रशासन , पंचायती राज प्रशासन , जिला जल एवं स्वच्छता मिशन , फीडबैक फाउंडेशन एवं स्थानीय समुदाय की एक बैठक बुलाई |

इस बैठक में तय किया गया इन सभी को मिलकर एक टीम का गठन किया जायेगा, जिसकी अध्यक्षता स्वयं कलेक्टर करेंगे तथा फीडबैक फाउंडेशन समुदाय के लोगों के बीच जाकर उनकी सोच को बदलने का कार्य करेगी जिसमे कई तरह के उपायों के द्वारा लोगों की खुले में शौच जाने की आदत को बदला जाएगा | पंचायती राज विभाग तथा जिला जल एवं स्वच्छता मिशन, एकसाथ मिलकर अपने विभाग का काम करेंगे जिसमे पैसा मुहैया कराना तथा शौचालय निर्माण के तकनीकी पक्ष को देखना शामिल था | इसके आलावा सबसे अच्छा काम यह किया गया के स्थानीय समुदाय को भी इसमें जोड़ा गया | इनकी कई समितियां हर ग्राम पंचायत में बनायीं गयी जिनमें निगरानी समिति, सामान खरीदी समिति, जन जागरूकता समिति आदि समितियां शामिल थी |

इंजिनियर, पंचायत ऑफिसर तथा सरपंचो के क्षमता विकास के प्रशिक्षण करवाए गए | इसके बाद सभी युद्ध स्तर पर एकसाथ काम में जुट गए तथा जिन गाँव ने सदियों से शौचालय नहीं देखे थे, वहां शौचालय बनाने का कार्य शुरू हो गया और अक्टूबर २०१४ को स्वच्छ भारत मिशन की मोदी जी के पहल के साथ ही इन सभी ने भी अपना काम शुरू कर दिया और जून २०१५ तक , 9 महीने के अन्दर ही इन्होने अंगुल ब्लाक के ११० गाँव को खुले में शौच मुक्त कर दिखाया |

इस काम के प्रति इन लोगों के जूनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की कलेक्टर, पंचायत ऑफिसर तथा फीडबैक फाउंडेशन के प्रतिनिधि खुद सुबह 4 बजे से उठकर गाँव में निगरानी के लिए जाते थे तथा खुले में शौच करने वालों से राख डालने की अपील करते थे तथा बाद में सभी को शौचालय बनवाने की अपील करते थे | निगरानी समिति सुबह से लोगों को खुले में शौच ना जाने के लिए समझाती थी तथा दिन में फीडबैक फाउंडेशन द्वारा गाँव वालों को विलेज मैपिंग तकनीक द्वारा एकजुट करके समझाया जाता था के खुले में शौच से क्या क्या बीमारियाँ फैलती हैं एवं महिलाओं के लिए खुले में जाना एक अपमानजनक प्रक्रिया है जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुचती है , इसी में यह भी बताया जाता था के किस तरह खुले में जाने से सांप, बिच्छु आदि के काटने का खतरा रहता है |

इस तरह धीरे धीरे गाँव वालों की सोच बदलती चली गयी तथा गाँव के लोग खुद शौचालय बनवाने की मांग करने लगे | अब बारी आई सामान खरीदने वाली समिति की जिसने सारे गाँव का सामान इकठ्ठा खरीदना शुरू किया जिससे जितने पैसे लगने थे उससे भी कम पैसों में सामान आ गया | गाँव के कुछ लोगों ने खुद मेसन का प्रशिक्षण किया तथा स्वयं शौचालय बनाने में सहयोग भी दिया | यही नहीं बचे हुए पैसे से इन्होने उन लोगों के घर के शौचालय भी बना दिये जो किसी कारण वश योजना में नहीं आ पाए थे | इस तरह सभी की एकजुटता के कारण अंगुल ब्लाक में ११० गाँव खुले में शौच से मुक्त हो पाए |

कलेक्टर सचिन जाधव इन सबको याद करते हुए कहते हैं के – जरुरत है लोगों की सोच बदलने की और एकजुट होकर देश के लिए तथा समाज के लिए काम करने की , यदि यह दो चीजे हो जाएँ तो देश बदल जाएगा | आज हमारी बनायीं हुई समितियां शौचालय बनने के बाद गाँव में कुपोषण तथा महिला शिक्षा में सुधार के लिए कार्य कर रही हैं | जरुरत थी उनमे कुछ करने की ललक जगाना जो हमने जगा दी , बाकी का काम समुदाय खुद कर लेता है |



इस तरह अंगुल मॉडल में सरकार , गैर सरकारी संगठन तथा स्थानीय समुदाय ने मिलकर एक अनूठा प्रयोग किया और सदियों पुराने अभिशाप खुले में शौच से मुक्ति पायी | इस मॉडल की कहानी साझा करने का मकसद यही है के इससे भारत में बाकी जगहों पर भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है | इसी तरह यदि हर जगह एकजुटता से कार्य किया जाय तो वह दिन दूर नहीं जब सारा भारत खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा  |  

आर्य शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता) 
                        theshubhamhindi@gmail.com

Wednesday, February 3, 2016

दलित राजनीति - क्या यह भारत को विभाजित करने की अंग्रेजी साजिश है ?

 -आर्य शुभम वर्मा 

क झूठ को १००० बार बोलो तो वो सच लगने लगता है | हिटलर की यह तरकीब लगभग सारी दुनिया  में अंग्रेजों ने अपने हित के अनुसार प्रयोग में ली | इसी वजह से अंग्रेजों की श्रेष्ठता के झूठ का भ्रम दुनिया भर में इस तरह से फ़ैल गया की जो भी दुनिया में अच्छा है वो अंग्रेजों ने ही दिया हो तथा बाकी सब बेकार है | अंग्रेजों ने अपनी भाषा , अपने पहनावे , अपने भोजन, अपनी शिक्षा पद्दति, अपनी न्याय पद्दति तथा अपने पंथ आदि को इस तरह से प्रचारित किया जैसे यही चीजे सभ्यता की निशानी हैं बाकी सब जो हो रहा है वो असभ्य लोगों के काम हैं | अंग्रेज अपनी चीजों को श्रेष्ठ बताने के झूठ को बार बार बोलते रहे जिससे बाकी सबको अपनी संस्कृति कमतर नजर आने लगे | यही नहीं अंग्रेजों को जब यह पता चला के भारतीय सभ्यता उनसे कई साल पुरानी तथा श्रेष्ठ है तथा संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है एवं इसमें लिखे गए सभी वेद, पांडुलिपि एवं दस्तावेज असीम ज्ञान से भरे पड़े हैं तो उन्हें अपनी श्रेष्ठता के झूठ के ख़त्म हो जाने का डर सताने लगा, तब अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता को अपनी सभ्यता बताने के लिए आर्यन थ्योरी के झूठ को रचा , जिसमे उन्होंने दुनिया को यह बताना शुरू किया के – “भारत में जो भी काम संस्कृत में हुए हैं तथा जो भी सभ्यता विकसित हुयी है वह सब जर्मनी और यूरोप से आये हुए लोगों ने स्थापित की है, तथा वही अंग्रेज लोग आर्य थे |[i] इन आर्यों ने मूल निवासी भारतियों को जो की काले रंग के असभ्य लोग थे दक्षिण की तरफ खदेड़ दिया एवं उत्तर में सारी विकसित सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया |”  इस झूठ को अंग्रेजों ने दुनिया भर में फ़ैलाने का प्रयास किया जिसके लिए उन्होंने मैक्स मुलर जैसे विदेशी लेखकों का सहारा लिया जिन्होंने अंग्रेजों के प्रभुत्व की थ्योरी को गढ़ा, यह मैक्स मुलर उसी जर्मनी के निवासी थे जहाँ हिटलर ने एक झूठ को सौ बार बोलो तो वो सच लगने लगता हैका सिद्धांत गढ़ा था | इसी कड़ी में अंग्रेजों ने संस्कृत और अंग्रेजी के कई लेख लिखवाए एवं पुस्तकें छपवाई जिसमे यह साबित करने की कोशिश की गयी के अंग्रेजों ने ही सारा ज्ञान भारत को दिया है तथा गुलाम होने के कारण भारत उनके इस प्रपंच को समझ न सका और नादानी में कई भारतीय जिनमे हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवारलाल नेहरु भी शामिल हैं इस झूठ को सच मानने लगे जिसे अंग्रेजों ने भारतियों को नीचा दिखाने के लिए रचा था | यही नहीं जवारलाल जी ने इस आर्य थ्योरी को अपनी पुस्तक भारत एक खोजमें भी लिख दिया | जिसे आज़ादी के बाद सारे भारत की इतिहास की पुस्तकों में पढाया जाने लगा  तथा भारतियों को यह लगने लगा के हम सच मे अंग्रेजों से हीन हैं | यही अंग्रेज चाहते थे |


अंग्रेजों ने आर्यन थ्योरी को रचकर दोहरी चाल चली थी | जिसमे एक तरफ तो वो अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करके हिन्दुस्तानियों को नीचा दिखा रहे थे तथा दूसरी तरफ आर्यन और द्रविड़ के नाम पर उत्तर भारत और दक्षिण भारत में फूट डालने का भी काम कर रहे थे | दक्षिण भारत में उन्होंने इसी थ्योरी के आधार पर यह पढाना शुरू कर दिया के आर्यों ने तुमको लूटा है , यह सब गोरे उत्तर भारतीय विदेशी हैं तथा तुम दक्षिण भारतीय लोग मूल-निवासी हो और इस आधार पर दक्षिण भारतीयों के मन में उत्तर भारत के प्रति नफरत का भाव अंग्रेजों ने पैदा किया जिसकी झलक आज भी कुछ प्रान्तों में देखी जा सकती है |

अंग्रेजों जब स्वयं को दूसरों से बेहतर सिद्ध कर रहे थे उसी क्रम में दूसरों को नीचा दिखाने का भी पूरा इंतजाम उन्होंने कर रखा था जिसमे भारत को बदनाम करने के यह झूठ शामिल थे जैसे- पुरे भारत में औरतों पर अत्याचार होते हैं, आर्य द्रविड़ आपस में लड़ते हैं , हिन्दू मुस्लिम आपस में एक दुसरे के खून के प्यासे हैं तथा हिन्दू समाज में जानवरों को मारा जाता है एवं जादू टोना किया जाता है | इन सबमे सबसे बड़ा जो दुष्प्रचार अंग्रेजों ने भारत के खिलाफ किया वो था जाती प्रथा पर हमला | इसमें कहा गया के भारत में कई हजार सालों से जाती के आधार पर शोषण हो रहा है तथा जाती को समाप्त होना चाहिए | इस झूठ को भी इतनी बार बोला गया के विदेशी तो विदेशी, स्वयं भारतीय इस विषय में आत्मग्लानी महसूस करने लगे | यह झूठ आज तक भारत के विषय में दुनिया भर में फैलाया जा रहा है एवं कुछ तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवी भी इसे दुनिया में फ़ैलाने में लगे हैं |

जाती से अंग्रेजों की दुश्मनी क्या थी? तथा उन्होंने क्यों इसे मुद्दा बनाया? इसे ठीक से समझने के लिए भारत के इतिहास में जाना पड़ेगा | मशहूर गांधीवादी चिन्तक प्रो. धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तकों में लिखा है तथा दादा भाई नैरोजी[ii] एवं अन्य अभिलेखों से भी यह ज्ञात होता है की भारत 1600 सालों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में अव्वल रहा था, तथा 1600 इ. तक भारत का दुनिया की अर्थव्यवस्था में 24.3 % हिस्सा था | यहाँ तक के मुग़ल काल में भी भारत दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन एवं आयात करने वाला देश था | उस समय भारत और चीन हमेशा स्पर्धा में रहते थे | इस समय भारत के व्यापार का मूल कारण था जातियां | हर गाँव में १६ से ज्यादा प्रकार की जातियां होती थीं तथा हर जाती का एक अपना हुनर होता था जैसे की लोहार, सुतार, बढ़ई, कुम्हार, चमार , ताम्रकार, स्वर्णकार आदि | यह सभी जातियां अपने अपने काम में माहिर थी | असल में इनका असली नाम ज्ञाति था अधिकतर शब्द संस्कृत के इसे होते हैं जिनमे लोग भूल कर जाते हैं जैसे  और ज्ञमें | अतः ज्ञाति जिसका अर्थ किसी भी एक ज्ञान में महारथ रखने वाले , से जाती शब्द निकला | हर जाती एक विशेष ज्ञान में माहिर थी अतः हर गाँव में उत्पादन जरुरत से कई गुना ज्यादा होता था तथा बचा हुआ सारा सामान हम सारे भारत से इकठ्ठा करके दुनिया भर के देशों में भेज दिया करते थे और बदले में हमें सोना ही सोना मिलता था | इसी सोने के आधार पर भारत आत्मनिर्भर बना था एवं सोने की चिड़िया कहलाता था | सभी जातियां बराबर होती थी एवं किसी में कोई भेदभाव नहीं था | जैसे आज यदि कोई एडिडास , रीबोक या एक्शन की कंपनी के मालिक को नीच जाती का कहे तो सब हँसेंगे , वैसे ही उस ज़माने में चमार (चम्र यानी चमड़ा, जो चमड़े का कार्य करे वो चमार) जूते का उत्पादन करते थे एवं उनपर भी उतना ही स्वर्ण या पैसा हुआ करता था जितना बाकी जातियों पर तथा धन की समानता होने के कारण कोई नीचा या ऊँचा नहीं हुआ करता था | सभी एक दुसरे की इज्जत किया करते थे | सभी जातियों में चार वर्ण हुआ करते थे जिनमे प्रथम वर्ण क्षत्रिय जो उस जाती की रक्षा के लिए लड़ते थे और उनका समाज का प्रबंधन करते थे , दुसरे ब्राह्मण जो शिक्षक , वैज्ञानिक या पढ़े लिखे होते थे जो लिखा पढ़ी एवं ज्ञान को बढाने का कार्य करते थे , तीसरे वैश्य , जो उनकी जाती द्वारा उत्पादन किये हुए सामान की बिक्री करते थे एवं व्यापार तथा अर्थव्यवस्था का काम देखते थे तथा चौथे एवं सबसे महत्वपूर्ण शुद्र जो सभी वस्तुओं का उत्पादन करते थे तथा मेहनत करते थे | यह पूरी एक साइकिल थी जैसे आज वाल्ल्मार्ट या बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ करती हैं और इसी के आधार पर भारत टिका हुआ था | अंग्रेज इसे समझ गए तथा उन्होंने इसे नष्ट करने का मन बनाया क्योंकि इस जाती प्रथा के कारण उनकी कम्पनियाँ भारत में मुनाफा नहीं कमा पा रही थी एवं भारत की एकता जातियों में थी | यदि जाती टूटती तो भारत आर्थिक रूप से कमजोर होता और अर्थ से धर्म भी कमजोर होता क्योंकि धर्मस्य मुलं अर्थम्” | इससे अंग्रेजो के दो फायदे होते एक भारत में उनका व्यापार फैला ,भारत को गुलाम बनाना आसान होता तथा दूसरा भारत में जाती के नाम पर फूट डाल कर धर्म को कमजोर करना जिससे वो उनका मजहब यहाँ फैला सकें | मजहब के साथ उनकी भाषा , कपडे , खाना , रहन सहन सभी आ जाता और भारतीय मानसिक रूप से भी उनके गुलाम हो जाते तथा उन्ही को अपना सर्वे सर्वा मानने लगते , जो की बाद में हुआ भी और आज तक इसका असर अंग्रेजी इलीट क्लास पर देखा जा सकता है |

अंग्रेजों ने सभी हुनरमंद जातियों को नियम बनाकर समाप्त करना शुरू किया | बंगाल में कई कालीन बनाने वाले तथा बुनकरों के हाथ कटवा दिए तथा इसी तरह कही बच्चो पर शोषण के नाम पर तो कही महिलाओं पर शोषण के नाम पर कई सारी जातियों के पुश्तैनी काम को बंद करवा दिया | गुरुकुल जिनमे इन सबकी शिक्षा दी जाती थी उन्हें मेकाले ने बंद करवा दिया तथा अमान्य घोषित कर दिया और बोल दिया जो इनमे पढेंगे उनकी डिग्री मान्य नहीं होगी और उन्हें कोई नौकरी नहीं मिलेगी | अब चूँकि व्यापार अंग्रेजो ने छीन लिया था तो नौकरी ही एकमात्र साधन थी | वह भी गुरुकुल शिक्षा से मिलनी बंद हो गयी तो लोगों ने गुरुकुल में पढना छोड़ दिया इससे भारत का असली इतिहास , कला तथा संस्कृति एवं संस्कार इन सभी चीजों से बच्चो का नाता टूटता चला गया और उन्हें मजबूरन अंग्रेजी कान्वेंट स्कुल को अपनाना पड़ा जिसका पूरा पाठ्यक्रम अंग्रेजों ने भारत विरोधी बनाया था | इन स्कुलो में अंग्रेजों को आर्य द्रविड़ थ्योरी , महिलाओं पर अत्याचार, हिन्दू मुसलमान , जातियों पर अत्याचार यह सब बाते बच्चो के मन में बैठाने का माध्यम मिल गया तथा बचपन से जो पढाया गया उसके बाद बच्चा जिंदगी भर उसी को सच मानने लगा तथा एक ऐसी पीड़ी तैयार हो गयी जो उनकी पढाई बातो को सच मानती थी और बूढ़े लोगों या संतो या उनके माँ बाप को मुर्ख समझती थी क्योंकि वो अंग्रेजी शिक्षा में नहीं पढ़े लिखे थे | इसी कारण भारत के लोग स्वयं के ऊपर गर्व करना , अभिमान करना भूलते चले गए एवं अंग्रेजों के प्रति हीन भावना से ग्रसित हो गए | उन्हें विदेश से आई हार बात तथा वस्तु सही लगने लगी एवं देश की चीजे पिछड़ी तथा असभ्य और अंग्रेजों का मकसद पूरा हो गया , जो की मानसिक रूप से गुलाम काले अंग्रेजों की इस पीड़ी ने आज़ादी के बाद तक जारी रखा |

अब आते हैं जातिवाद की बात पर तो जैसा की हम ऊपर जान चुके हैं के जाति और वर्ण क्या थे तो अब अंग्रेजों ने किस तरह लोगों को जातियों में तोडा यह समझते हैं | अंग्रेजों ने सबसे पहले तो जातियों के व्यापार को नष्ट किया जैसा की ऊपर वर्णित है | उसके बाद कई जातियां भुखमरी की हालत में आ गयी | इसका एक कारण अंग्रेजों का अनाज और किसानो पर अतिरिक्त कर लगा देना भी था, जिसे वसूलने भी किसी भारतीय को रखा जाता था जिन्हें जमीदार कहते थे ताकि भारतीय गरीब इनसे नफरत करने लगें जबकि सारा धन जाता अंग्रेजों पर था | कई बार अंग्रेजों ने अनाज को छुपाकर मानव निर्मित अकाल भी भारत में फैलाये जिससे करोडो लोगों की जान गयी तथा द्वितीय एवं प्रथम विश्व युद्ध में भारत का सारा अनाज इन्होने अपनी सेना को खाने तथा अंग्रेजों के खाने के लिए भेज दिया जिससे भारत में अकाल से करोडो लोगों की मृत्यु हो गयी |[iii] इस अकाल में मरे हुए लोगों की संख्या हिटलर के द्वारा मारे गए यहूदियों से भी ज्यादा थी पर इसका जिक्र इतिहास में कम ही होता है | कारण वही अंग्रेजो के प्रति इतिहासकारों की स्वामिभक्ति | इन कारणों से फैली गरीबी में कई जातियां बहुत गरीब हो गयी तथा कुछ तब भी अपनी मेहनत या अंग्रेजों की अनदेखी के कारण बचे रह गए | अब इन सभी ने मिलकर अंग्रेजों के प्रति विरोध शुरू कर दिया एवं आज़ादी की लड़ाई छेड़ दी इससे डरकर अंग्रेजों ने इन्हें बांटने के लिए फूट डालो नीति का सहारा लेते हुए यह प्रचारित करना शुरू किया के जो जातियां अमीर हैं वो ऊँची जाती के लोग हैं तथा जो गरीब हैं वो नीची जाती के लोग हैं | इसके बाद अंग्रेजों ने लोगों को बताया के जो ऊँची जाती के लोग हैं इन्होने नीची जाती के लोगों को दबाया तथा इनका शोषण किया जिसके कारण यह गरीब हैं | उसी वक़्त अंग्रेजों ने जनगणना करवाकर गरीबों को एस.सी., एस.टी. एवं अमीर जातियों को जनरल केटेगरी का बना दिया और तब से इन दोनों तबको में जो आग लगी है वो आज तक नहीं बुझ पायी | ब्राह्मणों की किताबों जैसे मनुस्मृति आदि में मैक्स मुलर से बदलाव करवाकर शूद्रों के प्रति नफरत भर दी जिसकी तयारी पहले से ही कर ली गयी थी | इसी तरह शुद्रों के कई नेता ब्रिटेन और अमरीका में पढ़ाकर तैयार कर दिए गए जिनके मन में जमीदारों और ब्राह्मणों के प्रति नफरत भर दी गयी | इसके बाद हर जाती में चार वर्ण होने की जगह जातियां ही चार मानी जाने लगी तथा वर्ण पैदा होने के हिसाब से तय होने लगा | भारतियों ने भी अंग्रेजी स्कुल में जो पढाया उसी को सच मान कर कभी असलियत जानने का प्रयास नहीं किया जिन्होंने किया उनकी बाते मानी नहीं गयी और इस तरह अंग्रेजों  ने शुद्र जाती बनाकर पैदा होते से ही किसी को अशुद्ध घोषित कर दिया , तो किसी को पैदा होते से ही ब्रह्म ज्ञानी | जबकि पहले वाल्मीकि, कबीर , चन्द्रगुप्त मौर्या, गौतम बुद्ध आदि कई ऐसे लोग थे जिन्होंने जन्म किसी और रूप में लिया बाद में कर्म से कुछ और बन गए थे | पर लोगों ने इसका अध्ययन करने की जगह अंग्रेजों के झूठ को ही सच मान लिया तथा ब्राह्मण श्रेष्ठ और शुद्र नीचे माने जाने लगे | बाद में महात्मा गाँधी ने जो की इस सत्य को समझ चुके थे के अंग्रेज क्या कर रहे हैं शुद्रों के नेता को एवं ऊँची जाती के हिन्दुओं को समझाने का प्रयास किया मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी, उन्होंने शूद्रों को नया नाम हरिजन भी दिया पर उसका कोई फायदा नहीं हुआ बाद में वही शुद्र , हरिजन हुए फिर दलित और आज भी भारत में ऊँची और नीची जाती का संघर्ष जारी है | जबकि सभी अपने पुराने हुनर को भूलते जा रहे हैं और अंग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ मान कर अपने ही धर्म को गालियाँ दे रहे हैं जिसके विषय में वो कुछ भी नहीं जानते | असल में धर्म और कुछ नहीं उस स्थान पर रहने वालों के रहने का तरीका होता है जिसे उस स्थान के लोगों ने सदियों में विकसित किया होता है | पर लोग उसे जातिप्रथा आदि से जोड़कर छोड़ रहे हैं | तथा आज मेरे जैसे कुछ लोग जाती प्रथा का समर्थन करदें तो तलवारें खिच जाती हैं एवं सभी बुद्धिजीवी इसका एकसुर में विरोध करने लगते हैं तथा जाती प्रथा को नष्ट करने की बात होने लगती है |

जबकि है इसका बिलकुल विपरीत , पूरा भारत जातियों पर टिका है | आज भी कई जातियां ही हैं जो भारत का व्यापार संभाल रही हैं तथा इन्ही जातियों से परिवार भी जुड़े हुए हैं और परिवार से समाज तथा समाज से धर्म एवं राष्ट्र | यदि जातियां नष्ट होंगी तो भारत की एकता नष्ट हो जायेगी तथा समस्त व्यापार का ढांचा चरमरा जायेगा | अतः जरुरत जातिप्रथा को नष्ट करने की नहीं है बल्कि इसे इसके असली स्वरुप में लाने की है |

आज भारत की हालत वैसी ही है जैसी की रामायण में हनुमान जी की श्राप मिलने के बाद हो गयी थी | सूरज निगलने वाले हनुमान जी को श्राप मिला था के वो अपनी सारी शक्तियों को भूल जायेंगे तथा उन्हें पता ही नहीं रहेगा वो क्या हैं | इसके बाद हनुमान जी शक्तिहीन होकर कई साल वनों में भटकते रहे | जब श्री राम ने आकर उन्हें पुनः शक्तियों का आभास करवाया तब उसी हनुमान ने समुद्र लाँघ कर सोने की लंका जला दी थी | भारत को भी आज ऐसे ही अपने खोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की आवश्यकता है |

यदि भारत यह कर सका तो हम विश्व गुरु का सपना जरुर साकार कर लेंगे अन्यथा दलित ब्राह्मण की लड़ाई अनंतकाल तक चलेगी | फैसला भारत को करना है आपको करना है |

आर्य शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता)
09713760660
theshubhamhindi@gmail.com




[i]  http://www.stephen-knapp.com/solid_evidence_debunking_aryan_invasion.htm
[ii] Drain of wealth- Book by dada Bhai Nairoji
[iii] http://www.ibtimes.com/bengal-famine-1943-man-made-holocaust-1100525