-आर्य शुभम वर्मा
एक झूठ को १००० बार बोलो तो वो सच लगने लगता है | हिटलर की यह तरकीब लगभग सारी दुनिया में अंग्रेजों ने अपने हित के अनुसार प्रयोग में
ली | इसी वजह से अंग्रेजों की
श्रेष्ठता के झूठ का भ्रम दुनिया भर में इस तरह से फ़ैल गया की जो भी दुनिया में
अच्छा है वो अंग्रेजों ने ही दिया हो तथा बाकी सब बेकार है | अंग्रेजों ने अपनी भाषा , अपने पहनावे , अपने भोजन, अपनी शिक्षा पद्दति, अपनी न्याय पद्दति तथा अपने पंथ आदि को इस तरह
से प्रचारित किया जैसे यही चीजे सभ्यता की निशानी हैं बाकी सब जो हो रहा है वो
असभ्य लोगों के काम हैं | अंग्रेज अपनी चीजों को श्रेष्ठ बताने के झूठ को बार बार बोलते रहे जिससे बाकी
सबको अपनी संस्कृति कमतर नजर आने लगे | यही नहीं अंग्रेजों को जब यह पता चला के भारतीय सभ्यता उनसे
कई साल पुरानी तथा श्रेष्ठ है तथा संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है एवं इसमें लिखे गए
सभी वेद, पांडुलिपि एवं
दस्तावेज असीम ज्ञान से भरे पड़े हैं तो उन्हें अपनी श्रेष्ठता के झूठ के ख़त्म हो
जाने का डर सताने लगा, तब अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता को अपनी सभ्यता बताने के लिए
आर्यन थ्योरी के झूठ को रचा , जिसमे उन्होंने दुनिया को यह बताना शुरू किया के – “भारत में जो भी काम संस्कृत में हुए हैं तथा जो
भी सभ्यता विकसित हुयी है वह सब जर्मनी और यूरोप से आये हुए लोगों ने स्थापित की
है, तथा वही अंग्रेज लोग आर्य
थे |[i]
इन आर्यों ने मूल निवासी
भारतियों को जो की काले रंग के असभ्य लोग थे दक्षिण की तरफ खदेड़ दिया एवं उत्तर
में सारी विकसित सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया |” इस झूठ को अंग्रेजों ने दुनिया भर में फ़ैलाने का प्रयास किया जिसके लिए
उन्होंने मैक्स मुलर जैसे विदेशी लेखकों का सहारा लिया जिन्होंने अंग्रेजों के
प्रभुत्व की थ्योरी को गढ़ा, यह मैक्स मुलर उसी जर्मनी के निवासी थे जहाँ हिटलर ने “
एक झूठ को सौ बार बोलो तो
वो सच लगने लगता है” का सिद्धांत गढ़ा
था | इसी कड़ी में अंग्रेजों ने
संस्कृत और अंग्रेजी के कई लेख लिखवाए एवं पुस्तकें छपवाई जिसमे यह साबित करने की
कोशिश की गयी के अंग्रेजों ने ही सारा ज्ञान भारत को दिया है तथा गुलाम होने के
कारण भारत उनके इस प्रपंच को समझ न सका और नादानी में कई भारतीय जिनमे हमारे प्रथम
प्रधानमंत्री जवारलाल नेहरु भी शामिल हैं इस झूठ को सच मानने लगे जिसे अंग्रेजों
ने भारतियों को नीचा दिखाने के लिए रचा था | यही नहीं जवारलाल जी ने इस आर्य थ्योरी को अपनी
पुस्तक “भारत एक खोज”
में भी लिख दिया |
जिसे आज़ादी के बाद सारे
भारत की इतिहास की पुस्तकों में पढाया जाने लगा
तथा भारतियों को यह लगने लगा के हम सच मे अंग्रेजों से हीन हैं | यही अंग्रेज चाहते थे |
अंग्रेजों ने आर्यन थ्योरी को रचकर दोहरी चाल चली थी |
जिसमे एक तरफ तो वो अपने
आप को श्रेष्ठ सिद्ध करके हिन्दुस्तानियों को नीचा दिखा रहे थे तथा दूसरी तरफ
आर्यन और द्रविड़ के नाम पर उत्तर भारत और दक्षिण भारत में फूट डालने का भी काम कर
रहे थे | दक्षिण भारत में
उन्होंने इसी थ्योरी के आधार पर यह पढाना शुरू कर दिया के आर्यों ने तुमको लूटा है
, यह सब गोरे उत्तर भारतीय
विदेशी हैं तथा तुम दक्षिण भारतीय लोग मूल-निवासी हो और इस आधार पर दक्षिण
भारतीयों के मन में उत्तर भारत के प्रति नफरत का भाव अंग्रेजों ने पैदा किया जिसकी
झलक आज भी कुछ प्रान्तों में देखी जा सकती है |
अंग्रेजों जब स्वयं को दूसरों से बेहतर सिद्ध कर रहे थे उसी
क्रम में दूसरों को नीचा दिखाने का भी पूरा इंतजाम उन्होंने कर रखा था जिसमे भारत
को बदनाम करने के यह झूठ शामिल थे जैसे- पुरे भारत में औरतों पर अत्याचार होते हैं,
आर्य द्रविड़ आपस में लड़ते
हैं , हिन्दू मुस्लिम
आपस में एक दुसरे के खून के प्यासे हैं तथा हिन्दू समाज में जानवरों को मारा जाता
है एवं जादू टोना किया जाता है | इन सबमे सबसे बड़ा जो दुष्प्रचार अंग्रेजों ने भारत के खिलाफ किया वो था जाती
प्रथा पर हमला | इसमें कहा गया के
भारत में कई हजार सालों से जाती के आधार पर शोषण हो रहा है तथा जाती को समाप्त
होना चाहिए | इस झूठ को भी
इतनी बार बोला गया के विदेशी तो विदेशी, स्वयं भारतीय इस विषय में आत्मग्लानी महसूस करने लगे |
यह झूठ आज तक भारत के
विषय में दुनिया भर में फैलाया जा रहा है एवं कुछ तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवी भी
इसे दुनिया में फ़ैलाने में लगे हैं |
जाती से अंग्रेजों की दुश्मनी क्या थी? तथा उन्होंने क्यों
इसे मुद्दा बनाया? इसे ठीक से समझने के लिए भारत के इतिहास में जाना पड़ेगा |
मशहूर गांधीवादी चिन्तक प्रो.
धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तकों में लिखा है तथा दादा भाई नैरोजी[ii] एवं अन्य
अभिलेखों से भी यह ज्ञात होता है की भारत 1600 सालों तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में अव्वल
रहा था, तथा 1600 इ. तक भारत का दुनिया की अर्थव्यवस्था में 24.3
% हिस्सा था | यहाँ तक के मुग़ल काल में भी भारत दुनिया में
सबसे ज्यादा उत्पादन एवं आयात करने वाला देश था | उस समय भारत और चीन हमेशा स्पर्धा में रहते थे |
इस समय भारत के व्यापार
का मूल कारण था जातियां | हर गाँव में १६ से ज्यादा प्रकार की जातियां होती थीं तथा हर जाती का एक अपना
हुनर होता था जैसे की लोहार, सुतार, बढ़ई, कुम्हार, चमार , ताम्रकार, स्वर्णकार आदि | यह सभी जातियां
अपने अपने काम में माहिर थी | असल में इनका असली नाम ज्ञाति था अधिकतर शब्द संस्कृत के इसे होते हैं जिनमे
लोग भूल कर जाते हैं जैसे ‘ज’ और ‘ज्ञ’ में | अतः ज्ञाति जिसका अर्थ किसी भी एक ज्ञान में
महारथ रखने वाले , से जाती शब्द
निकला | हर जाती एक विशेष
ज्ञान में माहिर थी अतः हर गाँव में उत्पादन जरुरत से कई गुना ज्यादा होता था तथा
बचा हुआ सारा सामान हम सारे भारत से इकठ्ठा करके दुनिया भर के देशों में भेज दिया
करते थे और बदले में हमें सोना ही सोना मिलता था | इसी सोने के आधार पर भारत आत्मनिर्भर बना था
एवं सोने की चिड़िया कहलाता था | सभी जातियां बराबर होती थी एवं किसी में कोई भेदभाव नहीं था | जैसे आज यदि कोई एडिडास , रीबोक या एक्शन की कंपनी के मालिक को नीच जाती
का कहे तो सब हँसेंगे , वैसे ही उस ज़माने में चमार (चम्र यानी चमड़ा, जो चमड़े का कार्य करे वो चमार) जूते का उत्पादन करते थे एवं
उनपर भी उतना ही स्वर्ण या पैसा हुआ करता था जितना बाकी जातियों पर तथा धन की
समानता होने के कारण कोई नीचा या ऊँचा नहीं हुआ करता था | सभी एक दुसरे की इज्जत किया करते थे | सभी जातियों में चार वर्ण हुआ करते थे जिनमे
प्रथम वर्ण क्षत्रिय जो उस जाती की रक्षा के लिए लड़ते थे और उनका समाज का प्रबंधन
करते थे , दुसरे ब्राह्मण
जो शिक्षक , वैज्ञानिक या पढ़े
लिखे होते थे जो लिखा पढ़ी एवं ज्ञान को बढाने का कार्य करते थे , तीसरे वैश्य , जो उनकी जाती द्वारा उत्पादन किये हुए सामान की
बिक्री करते थे एवं व्यापार तथा अर्थव्यवस्था का काम देखते थे तथा चौथे एवं सबसे
महत्वपूर्ण शुद्र जो सभी वस्तुओं का उत्पादन करते थे तथा मेहनत करते थे | यह पूरी एक साइकिल थी जैसे आज वाल्ल्मार्ट या
बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ करती हैं और इसी के आधार पर भारत टिका हुआ था |
अंग्रेज इसे समझ गए तथा
उन्होंने इसे नष्ट करने का मन बनाया क्योंकि इस जाती प्रथा के कारण उनकी कम्पनियाँ
भारत में मुनाफा नहीं कमा पा रही थी एवं भारत की एकता जातियों में थी | यदि जाती टूटती तो भारत आर्थिक रूप से कमजोर
होता और अर्थ से धर्म भी कमजोर होता क्योंकि “धर्मस्य मुलं अर्थम्” | इससे अंग्रेजो के दो फायदे होते एक भारत में
उनका व्यापार फैला ,भारत को गुलाम
बनाना आसान होता तथा दूसरा भारत में जाती के नाम पर फूट डाल कर धर्म को कमजोर करना
जिससे वो उनका मजहब यहाँ फैला सकें | मजहब के साथ उनकी भाषा , कपडे , खाना , रहन – सहन सभी आ जाता
और भारतीय मानसिक रूप से भी उनके गुलाम हो जाते तथा उन्ही को अपना सर्वे सर्वा
मानने लगते , जो की बाद में
हुआ भी और आज तक इसका असर अंग्रेजी इलीट क्लास पर देखा जा सकता है |
अंग्रेजों ने सभी हुनरमंद जातियों को नियम बनाकर समाप्त
करना शुरू किया | बंगाल में कई
कालीन बनाने वाले तथा बुनकरों के हाथ कटवा दिए तथा इसी तरह कही बच्चो पर शोषण के
नाम पर तो कही महिलाओं पर शोषण के नाम पर कई सारी जातियों के पुश्तैनी काम को बंद
करवा दिया | गुरुकुल जिनमे इन
सबकी शिक्षा दी जाती थी उन्हें मेकाले ने बंद करवा दिया तथा अमान्य घोषित कर दिया
और बोल दिया जो इनमे पढेंगे उनकी डिग्री मान्य नहीं होगी और उन्हें कोई नौकरी नहीं
मिलेगी | अब चूँकि व्यापार
अंग्रेजो ने छीन लिया था तो नौकरी ही एकमात्र साधन थी | वह भी गुरुकुल शिक्षा से मिलनी बंद हो गयी तो
लोगों ने गुरुकुल में पढना छोड़ दिया इससे भारत का असली इतिहास , कला तथा संस्कृति एवं संस्कार इन सभी चीजों से
बच्चो का नाता टूटता चला गया और उन्हें मजबूरन अंग्रेजी कान्वेंट स्कुल को अपनाना
पड़ा जिसका पूरा पाठ्यक्रम अंग्रेजों ने भारत विरोधी बनाया था | इन स्कुलो में अंग्रेजों को आर्य द्रविड़ थ्योरी
, महिलाओं पर अत्याचार,
हिन्दू मुसलमान , जातियों पर अत्याचार यह सब बाते बच्चो के मन
में बैठाने का माध्यम मिल गया तथा बचपन से जो पढाया गया उसके बाद बच्चा जिंदगी भर
उसी को सच मानने लगा तथा एक ऐसी पीड़ी तैयार हो गयी जो उनकी पढाई बातो को सच मानती
थी और बूढ़े लोगों या संतो या उनके माँ बाप को मुर्ख समझती थी क्योंकि वो अंग्रेजी
शिक्षा में नहीं पढ़े लिखे थे | इसी कारण भारत के लोग स्वयं के ऊपर गर्व करना , अभिमान करना भूलते चले गए एवं अंग्रेजों के
प्रति हीन भावना से ग्रसित हो गए | उन्हें विदेश से आई हार बात तथा वस्तु सही लगने लगी एवं देश की चीजे पिछड़ी तथा
असभ्य और अंग्रेजों का मकसद पूरा हो गया , जो की मानसिक रूप से गुलाम काले अंग्रेजों की इस पीड़ी ने
आज़ादी के बाद तक जारी रखा |
अब आते हैं जातिवाद की बात पर तो जैसा की हम ऊपर जान चुके
हैं के जाति और वर्ण क्या थे तो अब अंग्रेजों ने किस तरह लोगों को जातियों में
तोडा यह समझते हैं | अंग्रेजों ने
सबसे पहले तो जातियों के व्यापार को नष्ट किया जैसा की ऊपर वर्णित है | उसके बाद कई जातियां भुखमरी की हालत में आ गयी |
इसका एक कारण अंग्रेजों
का अनाज और किसानो पर अतिरिक्त कर लगा देना भी था, जिसे वसूलने भी किसी भारतीय को रखा जाता था
जिन्हें जमीदार कहते थे ताकि भारतीय गरीब इनसे नफरत करने लगें जबकि सारा धन जाता
अंग्रेजों पर था | कई बार अंग्रेजों
ने अनाज को छुपाकर मानव निर्मित अकाल भी भारत में फैलाये जिससे करोडो लोगों की जान
गयी तथा द्वितीय एवं प्रथम विश्व युद्ध में भारत का सारा अनाज इन्होने अपनी सेना
को खाने तथा अंग्रेजों के खाने के लिए भेज दिया जिससे भारत में अकाल से करोडो
लोगों की मृत्यु हो गयी |[iii]
इस अकाल में मरे हुए
लोगों की संख्या हिटलर के द्वारा मारे गए यहूदियों से भी ज्यादा थी पर इसका जिक्र
इतिहास में कम ही होता है | कारण वही अंग्रेजो के प्रति इतिहासकारों की स्वामिभक्ति | इन कारणों से फैली गरीबी में कई जातियां बहुत
गरीब हो गयी तथा कुछ तब भी अपनी मेहनत या अंग्रेजों की अनदेखी के कारण बचे रह गए |
अब इन सभी ने मिलकर
अंग्रेजों के प्रति विरोध शुरू कर दिया एवं आज़ादी की लड़ाई छेड़ दी | इससे डरकर अंग्रेजों ने इन्हें बांटने के लिए फूट डालो नीति का सहारा लेते हुए
यह प्रचारित करना शुरू किया के जो जातियां अमीर हैं वो ऊँची जाती के लोग हैं तथा
जो गरीब हैं वो नीची जाती के लोग हैं | इसके बाद अंग्रेजों ने लोगों को बताया के जो ऊँची जाती के
लोग हैं इन्होने नीची जाती के लोगों को दबाया तथा इनका शोषण किया जिसके कारण यह
गरीब हैं | उसी वक़्त
अंग्रेजों ने जनगणना करवाकर गरीबों को एस.सी., एस.टी. एवं अमीर जातियों को जनरल केटेगरी का
बना दिया और तब से इन दोनों तबको में जो आग लगी है वो आज तक नहीं बुझ पायी |
ब्राह्मणों की किताबों
जैसे मनुस्मृति आदि में मैक्स मुलर से बदलाव करवाकर शूद्रों के प्रति नफरत भर दी
जिसकी तयारी पहले से ही कर ली गयी थी | इसी तरह शुद्रों के कई नेता ब्रिटेन और अमरीका में पढ़ाकर
तैयार कर दिए गए जिनके मन में जमीदारों और ब्राह्मणों के प्रति नफरत भर दी गयी |
इसके बाद हर जाती में चार
वर्ण होने की जगह जातियां ही चार मानी जाने लगी तथा वर्ण पैदा होने के हिसाब से तय
होने लगा | भारतियों ने भी
अंग्रेजी स्कुल में जो पढाया उसी को सच मान कर कभी असलियत जानने का प्रयास नहीं
किया जिन्होंने किया उनकी बाते मानी नहीं गयी और इस तरह अंग्रेजों ने शुद्र जाती बनाकर पैदा होते से ही किसी को
अशुद्ध घोषित कर दिया , तो किसी को पैदा होते से ही ब्रह्म ज्ञानी | जबकि पहले वाल्मीकि, कबीर , चन्द्रगुप्त मौर्या, गौतम बुद्ध आदि कई ऐसे लोग थे जिन्होंने जन्म
किसी और रूप में लिया बाद में कर्म से कुछ और बन गए थे | पर लोगों ने इसका अध्ययन करने की जगह अंग्रेजों
के झूठ को ही सच मान लिया तथा ब्राह्मण श्रेष्ठ और शुद्र नीचे माने जाने लगे |
बाद में महात्मा गाँधी ने
जो की इस सत्य को समझ चुके थे के अंग्रेज क्या कर रहे हैं शुद्रों के नेता को एवं
ऊँची जाती के हिन्दुओं को समझाने का प्रयास किया मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी,
उन्होंने शूद्रों को नया
नाम हरिजन भी दिया पर उसका कोई फायदा नहीं हुआ बाद में वही शुद्र , हरिजन हुए फिर दलित और आज भी भारत में ऊँची और
नीची जाती का संघर्ष जारी है | जबकि सभी अपने पुराने हुनर को भूलते जा रहे हैं और अंग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ
मान कर अपने ही धर्म को गालियाँ दे रहे हैं जिसके विषय में वो कुछ भी नहीं जानते |
असल में धर्म और कुछ नहीं
उस स्थान पर रहने वालों के रहने का तरीका होता है जिसे उस स्थान के लोगों ने
सदियों में विकसित किया होता है | पर लोग उसे जातिप्रथा आदि से जोड़कर छोड़ रहे हैं | तथा आज मेरे जैसे कुछ लोग जाती प्रथा का समर्थन
करदें तो तलवारें खिच जाती हैं एवं सभी बुद्धिजीवी इसका एकसुर में विरोध करने लगते
हैं तथा जाती प्रथा को नष्ट करने की बात होने लगती है |
जबकि है इसका बिलकुल विपरीत , पूरा भारत जातियों पर टिका है | आज भी कई जातियां ही हैं जो भारत का व्यापार
संभाल रही हैं तथा इन्ही जातियों से परिवार भी जुड़े हुए हैं और परिवार से समाज तथा
समाज से धर्म एवं राष्ट्र | यदि जातियां नष्ट होंगी तो भारत की एकता नष्ट हो जायेगी तथा समस्त व्यापार का
ढांचा चरमरा जायेगा | अतः जरुरत
जातिप्रथा को नष्ट करने की नहीं है बल्कि इसे इसके असली स्वरुप में लाने की है |
आज भारत की हालत वैसी ही है जैसी की रामायण में हनुमान जी
की श्राप मिलने के बाद हो गयी थी | सूरज निगलने वाले हनुमान जी को श्राप मिला था के वो अपनी सारी शक्तियों को भूल
जायेंगे तथा उन्हें पता ही नहीं रहेगा वो क्या हैं | इसके बाद हनुमान जी शक्तिहीन होकर कई साल वनों
में भटकते रहे | जब श्री राम ने
आकर उन्हें पुनः शक्तियों का आभास करवाया तब उसी हनुमान ने समुद्र लाँघ कर सोने की
लंका जला दी थी | भारत को भी आज
ऐसे ही अपने खोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की आवश्यकता है |
यदि भारत यह कर सका तो हम विश्व गुरु का सपना जरुर साकार कर
लेंगे अन्यथा दलित ब्राह्मण की लड़ाई अनंतकाल तक चलेगी | फैसला भारत को करना है आपको करना है |
आर्य शुभम वर्मा
(सामाजिक कार्यकर्ता)
09713760660
theshubhamhindi@gmail.com

शुभमजी क्या आप गौ एवं गौ आधारीत अर्थव्यवस्था का भारत में पतन कैंसे हुआ इस पर थोडा प्रकाश डालेंगे क्या जो सिद्धांत आपने उपर लिखीत ब्लॉग मी दिया उसका संदर्भ ही गौ आधारीत अर्थव्यवस्था के पतन का कारण मानाजाय
ReplyDeleteशुभमजी क्या आप गौ एवं गौ आधारीत अर्थव्यवस्था का भारत में पतन कैंसे हुआ इस पर थोडा प्रकाश डालेंगे क्या जो सिद्धांत आपने उपर लिखीत ब्लॉग मी दिया उसका संदर्भ ही गौ आधारीत अर्थव्यवस्था के पतन का कारण मानाजाय
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