Monday, February 29, 2016

भारत रत्न – डॉ. राजेंद्र प्रसाद [ भारत के संविधान के जनक ]


-आर्य शुभम वर्मा

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद , अधिकतर लोग इस नाम को सिर्फ भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में जानते हैं , पर कई लोगों को यह शायद पता भी नहीं होगा के आज जो हम भारत में आजादी की सांस ले रहे हैं तथा दुनिया की सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं इसके पीछे बहुत बड़ा हाथ इस स्वतंत्रता सेनानी का है | आइये जानते हैं इस साधारण सा जीवन जीने वाले इस असाधारण व्यक्तित्व के बारे में –



डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म ३ दिसम्बर १८८४ को  बिहार के सिवान जिले में कायस्थ परिवार में हुआ था | कायस्थ परिवार में पैदा होने के कारण बचपन से ही परिवार में पढाई लिखाई का माहौल था | इनके पिता महादेव सहाय जी संस्कृत और फारसी के बहुत बड़े विद्वान् थे | इनकी माता श्रीमती कमलेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थी, इन्होने बचपन से ही राजेंद्र जी को रामायण की चौपाइया सुनाना तथा अन्य धार्मिक कथाएं सुनाना शुरू कर दिया था जिसका प्रभाव राजेंद्र प्रसाद जी के बाल मन पर पढ़ा तथा वे हमेशा धार्मिक और न्याय प्रिय रहे |

बचपन में स्कुल की शिक्षा इन्होने छपरा सरकारी विद्यालय से पूरी की , इसके बाद इन्होने कड़ी मेहनत से अच्छे अंकों के साथ परीक्षा उत्तीर्ण करके, कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया | कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनकी कड़ी मेहनत और लगन को देखकर उन्हें ३० रूपये प्रति माह की छात्रवृत्ति प्रदान भी की गयी | इस विश्वविद्यालय में विज्ञान की शिक्षा लेकर, १९०५ में राजेंद्र बाबु इस कॉलेज से बाहर आये, इनके छात्र जीवन के समय यह कितने मेधावी छात्र थे , इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की – एक बार इनके अध्यापक ने इनकी कॉपी जांचने के बाद रिमार्क लिखा था की  “उत्तर देने वाला छात्र , जांचने वाले से बेहतर है” | इसके बाद १९०७ में  इन्होने कलकत्ता विश्वविध्यालय से एम्.ए. इकोनॉमिक्स की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की |

इसके बाद इन्होने कई कॉलेजों में शिक्षक के रूप में कार्य किया |  बिहार के मुज्जफरपुर में लंगत सिंह कॉलेज में इन्होने अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया फिर इसी कॉलेज में प्रिसिपल भी बने , इसके बाद इन्होने कानून की पढ़ाई करने के लिए यह नौकरी छोड़ दी तथा १९०९ में कलकत्ता में लॉ की पढाई करते हुए इन्होने इकोनॉमिक्स पढाना शुरू कर दिया | इसके बाद इन्होने ‘मास्टर्स इन लॉ’ को ना सिर्फ पूरा किया बल्कि इसमें गोल्ड मैडल हासिल किया | इसके बाद १९३७ में इन्होने  लॉ में डोक्टरेट की डिग्री, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से प्राप्त की | १९१६ में इन्होने बिहार और ओड़िसा हाईकोर्ट में वकालत का कार्य प्रारंभ किया | १९१७ में इन्हें पटना यूनिवर्सिटी में इन्हें सीनेट और सिंडिकेट का मेम्बर चुना गया |

१९१६ में यह पहली बार महात्मा गांधी से मिले | गांधीजी ने इन्हें चंपारण आन्दोलन में साथ देने के लिए कहा | इसमें गरीबों के हक़ की लड़ाई लड़ते हुए तथा देश का काम करते हुए यह इतने प्रभावित हुए के १९२० में इन्होने अपनी नौकरी तक छोड़ दी तथा पूरी तरह देश की आज़ादी की लड़ाई में कूद पढ़े | सिर्फ यही नहीं, महात्मा गाँधी ने जब विदेशी कॉलेजों के बहिष्कार की बात की, तब इन्होने इनके पुत्र को उसकी पढाई छुडवाकर बिहार विद्यापीठ में भर्ती करवा दिया जिसे कुछ भारतियों ने ही भारतीय संस्कृति के आधार पर बनाया था |

आजादी के लिए कार्य करते हुए राजेंद्र बाबु ने कई अख़बारों के लिए लेख लिखे | १९१४ में आई हुई बाड के कारण बिहार और बंगाल में काफी बर्बादी हुई थी | इसके लिए राजेंद्र प्रसाद जी ने बहुत सेवा कार्य किये | 15 जनवरी १९३४ को जब बिहार में भूकंप आया उस समय देश के लिए आन्दोलन करने के कारण इन्हें जेल में डाल दिया गया था तब इन्होने राहत कार्य करने की जिम्मेदारी इनके सहयोगी अनुराग narayanनारायण सिन्हा को सौंपी , २ दिन बाद जब वे जेल से छूटकर आये तब इन्होने १७ जनवरी १९३४ को बिहार सेंट्रल रिलीफ समिति की स्थापना की और खुद जगह जगह जाकर लोगों की मदद के लिए फण्ड इक्कठा किया | इसी तरह जब ३१ मई १९३५ को क्वेटा में भूकंप आया तब इन्होने सिंध और पंजाब के लिए क्वेटा सेंट्रल रिलीफ कमिटी का गठन किया |

अक्टूबर १९३४ में मुंबई अधिवेशन के दौरान इन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था | १९३९ में भी यह दूसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे | 8 अगस्त १९४२ को देश में गाँधी जी ने जब अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया तथा आन्दोलन शुरू किया , उस समय राजेंद्र प्रसाद जी ने उसमे सक्रिय भूमिका निभाई जिसके कारण उन्हें सदाकत आश्रम पटना से गिरफ्तार कर लिया गया तथा बिहार की बांकीपुर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया | इन्हें यहाँ पुरे ३ साल तक बंद रखा गया तथा 15 जून १९४५ को रिहा किया गया |

२ सितम्बर १९४६ को जब अंतरिम सरकार की घोषणा हुई, तब १२ महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक कृषि और खाद्य मंत्रालय राजेंद्र बाबु को मिला | ११ दिसम्बर १९४६ को इन्हें सर्वसम्मति से संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया | संविधान सभा का पूरा कार्यभार इनके कन्धों पर था | इन्होने कड़ी मेहनत करके संविधान सभा के सभी सदस्यों के मतों की रक्षा की तथा किसी के साथ भी भेदभाव नहीं होने दिया चाहे वो दलित हों, महिला हों या अल्पसंख्यक | सभी तरह के विचारों को इन्होने संविधान सभा में आने दिया तथा सभी का निष्पक्ष रहते हुए सम्मान किया | पहले डॉ भीमराव अम्बेडकर संविधान सभा के लिए नहीं चुने गए थे फिर महात्मा गाँधी के आग्रह पर राजेंद्र बाबु ने उन्हें भी इस सभा में उनके पक्ष को रखने तथा भारत का महान संविधान बनने का मौका दिया | यही नहीं राजेंद्र बाबु ने संविधान बनने के लिए जो समितियां बनायीं थी उसमे से मसौदा समिति का अध्यक्ष भी भीमराव जी को नियुक्त किया | इसके साथ साथ राजकुमारी कौर की बात को मानते हुए महिलाओं के सम्मान और समानता के अधिकार को भी इसमें डाला गया | यही नहीं संविधान सभा के अध्यक्ष होने के साथ साथ इसमें जितनी भी समितियां बनी थी उनमे से सबसे अधिक 4 समितियों को खुद  राजेंद्र बाबु संभाल रहे थे जिनके नाम हैं :-

·         Committee on the Rules of Procedure: Rajendra Prasad
·         Steering Committee: Rajendra Prasad
·         Finance and Staff Committee: Rajendra Prasad
·         Ad Hoc Committee on National Flag: Rajendra Prasad
[सोर्स – विकिपीडिया ]

इस तरह स्वतंत्र भारत के संविधान को बनने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका राजेंद्र प्रसाद जी ने निभाई थी | यह बात और है के दलगत वोट बैंक की राजनीति के कारण , इस महान प्रतिभा के काम को अधिक सराहा नहीं गया क्योंकि इन्होने किसी ख़ास मजहब या जाती के लिए कार्य करने की जगह राष्ट्र के लिए कार्य किया था | लेकिन इतिहास पढने वालों को इनके योगदान की जानकारी अवश्य रहती है |

 १७ नवम्बर १९४७ में कृपलानी जी के इस्तीफे के बाद इन्हें तीसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था | आज़ादी के २.५ साल बाद २६ जनवरी १९५० को जब भारत का संविधान लागू हुआ , उस समय राजेंद्र प्रसाद जी को सर्वसम्मति से देश का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया | पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर इन्होजे निष्पक्ष होकर राष्ट्रपति के दायित्व को निभाया तथा यह 12 साल तक भारत के राष्ट्रपति रहे और १९६२ में इन्होने स्वयं राष्ट्रपति पद त्याग दिया तथा पटना में १४ मई १९६२ को बिहार विद्यापीठ के कैंपस में जाकर बस गए और साधारण जीवन जीने लगे | राजेंद्र प्रसाद जी को भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया है | २८ फ़रवरी १९६३ को यह परम आत्मा भारत की मिटटी में विलीन हो गयी |



भारत रत्न राजेंद्र प्रसाद जी भारत के उन महान सपूतों में से एक थे जिन्होंने अपना सारा जीवन देश के कल्याण में लगा दिया तथा भारत के भविष्य के लिए एक ऐंसा संविधान बनाया जिसके कारण आज भी हमें दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है | ऐसी महान प्रतिभा को सभी भारतियों का शत शत नमन |