Friday, November 23, 2018

बौद्ध और वैदिक परंपरा का पारस्परिक संबंध |

प्रस्तावना तथा भूमिका :

भारतवर्ष एक ऐसी भूमि रही है जिसने सदियों से कई महान विचारों तथा महान परम्पराओं को जन्म दिया है | इस भूमि पर महावीर, बुद्ध, गुरुनानक, तथा गांधी जैसे कई महान विचारकों ने जन्म लिया है जिनके विचारों के कई अनुयायी आज भी दुनिया भर में फैले हुए हैं | भारत सदियों से ज्ञान का भंडार रहा है तथा यहाँ हर प्रकार की विचारधारा, परंपरा तथा ज्ञान का स्वागत किया गया है | यहाँ कई भाषाएँ , लिपियाँ, ज्ञान की पुस्तकें तथा कई मतों के लोग एक साथ सदियों से शांतिपूर्ण ढंग से रहते हुए आये हैं | चूँकि समाज व्यक्तियों द्वारा ही बना होता है तो कई बार कुछ बदलाव समाज में स्वतः ही होते रहे हैं | इसी तरह का एक सामाजिक जागरण का कार्य बुद्ध ने किया था | बुद्ध जो एक क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे, उन्होंने जब पहली बार दुःख देखा तो सुख की तलाश शुरू कर दी | तथा उनके गुरु के द्वारा दिए गए ज्ञान तथा भारत के प्राचीन वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को आधार बनाते हुए उन्होंने सुख का रास्ता अहिंसा , प्रेम और अध्यात्म द्वारा प्राप्त किया तथा वही अपने अनुयायियों और शिष्यों को भी सिखाने का प्रयास किया | कई लोगों को यह रास्ता अच्छा लगा तथा उन्होंने भी इस रास्ते से सुख को प्राप्त करने के कई प्रयास किये | दुसरे कई लोगों को दूसरे रास्ते अच्छे लगे , उन्होंने वह अपनाये तथा कुछ लोगों ने बुद्ध का रास्ता तथा बाकी दुनिया का रास्ता दोनों को अपनाया | इन सभी में कहीं भी कोई मतभेद या मनभेद नहीं था तथा बुद्ध और उनके अनुयायी, तथा जो उनके अनुयायी नहीं थे, यह सभी एक दुसरे के साथ मिलकर रहते थे तथा एक दुसरे का सम्मान करते थे | जीवनयापन का तरीका सभी का उपनिषद और वैदिक मूल्यों पर आधारित था तथा सभी भारतीय संस्कृति जो सदियों से चली आ रही थी उसी का पालन करते थे | स्वयं बुद्ध भी अपने अनुयायियों को उपनिषदों से मिले हुए ज्ञान की भी शिक्षा दिया करते थे | तथा मलय पुस्तक “हिकायत सेरी रामा” और जातक कथाओं में यह उल्लेख है की गौतम बुद्ध ने स्वयं यह कहा था के वो श्री राम के ही अवतार हैं | अतः पूरा समाज एक साथ मिलजुल कर रहता था तथा प्राचीन वैदिक विचार ही संस्कृति का आधार थे | बुद्ध के विचारों पर चलने वाले कम ही लोग थे , क्योंकि कठिन जीवन कम ही लोग जी पाते थे , इनकी जनसँख्या तब बढ़ना शुरू हुई जब मौर्या साम्राज्य के सम्राट अशोक ने युद्ध के बाद हिंसा से तंग आकर अंत में बौद्ध के सिद्धांतों को अपना लिया तथा सारे साम्राज्य के लोगों को भी उसी को अपनाने को बोल दिया | इसके बाद जिन लोगों पर जबरन इन सिद्धांतो को थोपा गया था तथा वह अलग तरह से जीवन जीना चाहते थे , वह सब शंकराचार्य के समय वापस अपनी मूल व्यवस्था में चले गए तथा इसके लिए भी समाज में कोई युद्ध या लड़ाई नहीं हुई बल्कि शास्त्रार्थ द्वारा शंकराचार्य ने मंडन मिश्र आदि को अपनी बात से सहमत करवाया | इसके बाद फिर कई सालों तक भारत में दोनों ही विचारों के लोग साथ में रहने लगे | देखने वाली बात यह है की बौद्ध विचार को कभी भी सनातन संस्कृति से अलग नहीं माना गया तथा कभी भी ऐसा कुछ नहीं था के बौद्ध अलग धर्म बन गया हो और सनातन अलग, बल्कि यह दोनों ही समाज में एक ही नीव के आधार पर बढ़ रहे थे | बौद्ध अलग तथा हिन्दू धर्म अलग ऐसा पहली बार तब कहा गया जब भीम राव अम्बेडकर ने बुद्ध विचारों को अपनाया | उस समय लोगों ने यह कहना शुरू किया के यह हिन्दू से बौद्ध बन गए , जबकि भीमराव ने भी स्वयं स्वीकार किया है के वो इस विचारधारा के साथ हैं क्योंकि वो उस समय की परिस्थितियों से परेशान हो गए थे और इस्लाम और ईसाइयत नहीं अपनाना चाहते थे |
आज कई लोग नव–बौद्ध आन्दोलन के नाम पर भारत में दलित वर्ग को बाकी वर्गों के खिलाफ भड़का रहे हैं तथा यह बोल रहे हैं के गौतम बुद्ध ने हिन्दू धर्म की कुरीतियों से परेशान होकर हिन्दू धर्म छोड़ा था | बौद्ध जातिप्रथा के खिलाफ थे और ब्राह्मणवाद से तंग आ गए थे आदि कई बाते नव-बौद्ध आन्दोलन वाले फैला रहे हैं | यह बुद्ध का नाम लेकर कई लोगों को हिन्दू धर्म से अलग करके बुद्ध बना रहे हैं तथा बुद्ध के सिद्धांतो को सिखाने की जगह उनके मन में स्वयं के देश, संस्कृति और साहित्य के खिलाफ नफरत का जहर भरा जा रहा है | इसलिए आज यह समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि – क्या बुद्ध ने कभी हिन्दू धर्म त्यागा था ? या क्या बुद्ध ने हिन्दू धर्म या सनातन या वैदिक धर्म से परेशान होकर बुद्ध धर्म बनाया था ? तथा यह भी समझना आवश्यक है की यदि ऐसा नहीं था तो नव बौद्ध्वाद आखिर क्या है तथा किसके द्वारा फैलाया जा रहा है ? इन सभी प्रश्नों का जवाब ढूंढने का प्रयास इस शोध-पत्र में किया गया है |

गौतम बुद्ध का इतिहास :

महात्मा बुद्ध का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पहले कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के घर में हुआ था । इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनकी माता का नाम महामाया था तथा पुत्र-जन्म के सात दिन बाद ही माता की मृत्यु हो गयी थी । इनकी मौसी गौतमी ने बालक का लालन-पालन किया । इस बालक के जन्म से महाराज शुद्धोदन की पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण हुई थी, इसलिए बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया । गौतम नाम इनके गोत्र के कारण पड़ा । ( गौतम महान सनातन ऋषि थे, जिनके नाम पर यह गोत्र है)
बचपन में बालक की जन्मपत्री देखकर राज ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि बालक बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा या सब कुछ छोड़ कर वन में तप करने चला जायेगा तथा तपस्या के उपरांत महान संत बनेगा । संत बनने की बात सुनकर पिता को बहुत चिंता हुई । उन्होंने महल में बालक के आमोद-प्रमोद के लिए सभी इंतजाम कर दिए तथा उसको किसी भी प्रकार के दुःख या ऐसी चीजों से हमेशा दूर रखा जिससे उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर होना पड़े  । सिद्धार्थ बचपन से ही करुणायुक्त और गंभीर स्वभाव के थे । बड़े होने पर भी उनकी प्रवृत्ति नहीं बदली । तब पिता ने यशोधरा नामक एक खूबसूरत कन्या के साथ उनका विवाह करा दिया । इन्होने एक पुत्र को भी जन्म दिया जिसका नाम राहुल रखा गया । परंतु सभी प्रयत्नों के बाद भी सिद्धार्थ का मन गृहस्थी में नहीं रमा । एक दिन वह भ्रमण के लिए निकले, रास्ते में रोगी वृद्ध और मृतक को देखा तो जीवन की सच्चाई का पता चला । क्या मनुष्य की यही गति है, यह सोचकर वे बेचैन हो उठे । उन्होंने सोचा कि एक न एक दिन सभी को रोग आना है, सभी को वृद्ध होना है तथा सभी को मृत्यु आना है तो फिर यह सब धन, दौलत किस काम की है | उन्होंने सोचा यदि जीवन दुःख है तो सुख की तलाश करनी चाहिए | फिर एक रात्रिकाल में जब महल में सभी सो रहे थे तब सिद्धार्थ चुपके से उठे और पत्नी एव बच्चों को सोता छोड़ वन की ओर चल दिए। वहां कठोर तप करते हुए उन्होंने बोधि अर्थात ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति की | बाद में अपने व्याख्यानों में उन्होंने कहा कि संसार दु:खों से भरा हुआ है । दु:ख का कारण इच्छा या तृष्णा है । इच्छाओं का त्याग कर देने से मनुष्य दु:खों से छूट जाता है । उन्होंने लोगों को बताया कि सम्यक-दृष्टि, सम्यक- भाव, सम्यक- भाषण, सम्यक-व्यवहार, सम्यक निर्वाह, सत्य-पालन, सत्य-विचार और सत्य ध्यान से मनुष्य की तृष्णा मिट जाती है और वह सुखी रहता है | अपने पूरे जीवनकाल में इन्होने इसी तर्ज पर कई उपदेश दिए तथा अंत में उनका महानिर्वाण कुशीनगर में हुआ |
इस पूरे घटनाक्रम में कहीं भी जाती प्रथा या वर्ण व्यवस्था का उल्लेख नहीं है | बल्कि यह जरुर सत्य है के सिद्धार्थ के पिता ने उनके सामने कोई भी बुराई या दुःख की बात आने ही नहीं दी, तथा बुद्ध ने भ्रमण के दौरान रोगी , वृद्ध एवं मृत व्यक्तियों को देख कर अध्यात्म का रास्ता चुना था | इससे यह बात सिद्ध होती है के बुद्ध ने हिन्दू धर्म या सनातन संस्कृति के कारण या  वर्ण व्यवस्था या जाती प्रथा के कारण अध्यात्म का रास्ता नहीं चुना था ना ही एक धर्म से दूसरा धर्म बदला था, यह गलत तथ्य हैं जो विदेशी लेखकों जैसे शेल्डन पोलक इत्यादि द्वारा फैलाये गए हैं | बल्कि इसके उलट बुद्ध ने तो स्वयं अपने आप को राम का अवतार कहा है (सन्दर्भ: जातक)[1] | तथा कई उपनिषदों के ज्ञान को उन्होंने अपने शिष्यों को दिया है | इसका सबूत है उनके द्वारा दिए गए व्याख्यान जिनमे से कई बाते उपनिषदों से सीधे मेल खाती हैं | गौतम बुद्ध खुद वैदिक शिक्षकों से पढ़े हुए थे[2] जिनमे “अरादा कलामा” तथा “उद्रका रामापुत्रा” मुख्य थे जिन्होंने गौतम बुद्ध को शून्यता तथा ब्रह्म के पाठ पढाये थे|[3] इन्ही सिद्धांतो को आगे समझने के लिए गौतम बुद्ध ने तप किया तथा अध्यात्म को और गहराई में जाना | अतः आज के युग में नव-बौद्ध लेखको तथा पश्चिमी लेखको द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम कि बुद्ध हिन्दू विरोधी तथा वर्ण व्यवस्था विरोधी थे यह पूरी तरह गलत तथा निराधार है | यह इन नव-बोद्ध तथा छदम अम्बेडकरवादी लेखको के मन की कोरी कल्पना है जिसे इन्होने स्वयं अपने अल्पज्ञान तथा शेल्डन पोलक जैसे पश्चिमी लेखको  के प्रभाव में गढ़ा है |

नव-बौद्ध तथा छदम अम्बेडकरवादी आन्दोलन :

आज भारत में तथा कई देशों में नव-बौद्ध नामक एक भ्रामक आन्दोलन चल रहा है | इसका प्रचार प्रसार करने वालों का निशाना पिछड़े तथा दलित वर्ग के लोग होते हैं | इन्हें पैसे तथा दूसरे लालच देकर बौद्ध बनाया जाता है तथा इसके लिए शर्त यह होती है कि हिन्दू धर्म ( प्राचीन सनातन या वैदिक धर्म ) तथा संस्कृति को पूर्ण रूप से त्यागना होगा | यही नहीं इनके मन में प्राचीन भारतीय वैदिक संस्कृति के प्रति नफरत का जहर भरा जाता है | इसके लिए हिन्दू धर्म (वैदिक) को बदनाम करने का पूरा साहित्य तैयार किया गया है जिसमे कभी शम्भूक की झूठी कथा सुनाई जाती है तो कभी महिषासुर की | इन सब कथाओं को सुनाने और बनाने का मकसद है वैदिक धर्म को शूद्र विरोधी बताना | यह लोग सभी राक्षसों को शूद्र बताकर तथा भगवानो को आर्य तथा ऊँची जाति का बताकर समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तथा इसी आधार पर फिर दलितों से हिन्दू धर्म को छुडवा देते हैं | आश्चर्य की बात यह है के दक्षिण भारत में यही कहानियां सुनाकर राक्षसों को द्रविड़ बताते हैं | इन्होने महिलाओं को भी अपनी ओर आकर्षित करने तथा वैदिक संस्कृति से अलग करने के लिए महाभारत में द्रोपदी तथा रामायण में सीता आदि की कथाओं को फेमिनिस्म का रूप देकर इस तरह से लिखा है जिससे यह लगे कि भारतीय संस्कृति तो महिला विरोधी थी तथा इसे त्यागकर ही मुक्ति पायी जा सकती है | इस तरह के कई झूठ तथा प्रपंच यह लोग फैला रहे हैं |[4] राजीव मल्होत्रा अपनी पुस्तक ब्रेकिंग इंडिया में लिखते हैं कि इस तरह के आन्दोलनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है जो नहीं चाहते कि भारत तरक्की करे तथा उनके स्तर पर आकर खड़ा हो जाए अतः वह एन.जी.ओ., शिक्षा तथा मीडिया के माध्यम से समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के आन्दोलनों को हवा दे रहे हैं | इसी तरह के कई अलगाववादी आन्दोलन सीरिया, लीबिया, मिस्त्र, इराक, आदि में भी चले थे जिनका नतीजा यह देश अब तक भुगत रहे हैं | महाशक्ति सोवियत रूस भी अलगाववादी आन्दोलनों से ही टुकड़े टुकड़े हो गया था | भारत में भी नव-बौद्ध के नाम से दलित वर्ग को अपने ही समाज के खिलाफ भ्रामक साहित्य बाँट कर भड़काया जा रहा है | इसकी कई वेबसाइट तथा फेसबुक पेज आदि इन्टरनेट पर भरे पढ़े हैं |

शेल्डन पोलक तथा भ्रामक साहित्य:

शेल्डन पोलक पश्चिम में इंडोलोजी के बहुत बड़े विद्वान माने जाते हैं | इन्होने कई किताबे और लेख भारतीय संस्कृति और ग्रंथों के विषय में लिखे हैं | यह भारत के विषय में कई जगह पर व्याख्यान इत्यादि भी करते हैं | इन्हें दुनिया भर मे भारतीय विषयों का बहुत बड़ा जानकार माना जाता है | पर अफसोस की बात यह है कि इन्होने ही वह भ्रामक साहित्य लिखा है , जिसे कई अलगाववादी आज भारत में प्रयोग करते हैं तथा इन्होने अपने पश्चिम के नजरिये से भारत को देखने के प्रयास में कई तरह के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया हैं |[5] पश्चिम में बड़े पद पर होने के कारण बहुत कम लोग इनके लेखन पर सवाल उठा पाते हैं, इसका इन्हें भरपूर फायदा मिला है | इन्होने कई ऐसी बाते भारतीय साहित्य के विषय में लिख दी हैं जिनसे समाज में विघटन की स्थिति पैदा होने लगी है तथा हीन भावना पैदा हो रही है | इन्ही में से कुछ तर्कों का विश्लेषण इस शोधपत्र में किया गया है | इसके कुछ तर्कों के  उदाहरण निम्नलिखित हैं | यह कहते हैं कि :
  1. बुद्ध ने वैदिक धर्म से परेशान होकर अलग धर्म बनाया था |
  2. जाती प्रथा से तंग आकर बुद्ध ने वैदिक धर्म छोड़ा था तथा उनकी पूरी लडाई वर्ण व्यवस्था के खिलाफ थी |
  3. संस्कृत भाषा पर सिर्फ ब्राह्मणों का कब्ज़ा था | अतः बुद्ध ने पाली में साहित्य लिखा | बाद में विदेशियों (हुण-कुषाण) के आने से और बौद्ध धर्म के आने के बाद लेखन की शुरुआत हुई |[6]
  4. संस्कृत तथा वैदिक धर्म में पहले सिर्फ कर्मकांड थे इसमें ज्ञान वर्धक चीजे जैसे काव्य, नाटक आदि बौद्धों के संस्कृत जानने के बाद में जुड़ी |
  5. रामायण बुद्ध के बाद “दशरथ जातक” से देख कर लिखी गयी |
  6. बुद्ध से पहले वैदिक धर्म सामाजिक बंधनो पर आधारित था | इसके साहित्य में सिर्फ यज्ञ करवाना आदि था |
पहले तर्क पर चूँकि ऊपर इसी शोधपत्र में काफी कुछ लिखा जा चूका है अतः मै कुछ और विद्वानों के उदाहरण देना चाहूँगा | आनंद कुमारस्वामी अपनी पुस्तक “हिंदूइस्म एंड बुद्धिज़्म” में लिखते हैं कि :
“जो ऊपरी तौर पर किताबी ज्ञान के आधार पर बौद्ध सिद्धांत को पढता है | वह यह बोल सकता है कि ब्राह्मणवाद और बौद्धवाद दो अलग अलग धर्म हैं मगर जिसने बुद्ध सिद्धांत तथा हिन्दू धर्म का गहन अध्ययन किया है वो कभी यह नहीं बोल सकता कि यह दोनों अलग अलग हैं | बुद्ध का अधिकतर ज्ञान तथा प्रवचन ब्राह्मणों तथा उनके छात्रों ने ही सुना था | मगर यह कभी भी “जाति” के विरुद्ध या सामाजिक सुधार के लिए या आन्दोलन के रूप में नहीं था | यह वैदिक धर्म के विरुद्ध नहीं था बल्कि असल में यह वैदिक धर्म के ही खो रहे मूल्यों को पुनःस्थापित करने का एक प्रयास था |”[7]
दूसरे तर्क पर राजीव मल्होत्रा अपनी पुस्तक “द बैटल फॉर संस्कृत” में लिखते हैं कि –
“बुद्ध धर्म वर्ण/ जाति के खिलाफ एक आन्दोलन था, ऐसा कुछ भी बुद्ध के असली पौराणिक साहित्य में नहीं मिलता बल्कि बुद्ध ने दुःख को दूर करने के लिए जो ४ आर्य सत्य तथा ८ आर्य अष्टांग मार्ग दिए हैं , उनमे कहीं भी जाती प्रथा या वर्ण व्यवस्था की चर्चा नहीं है | भारत के इतिहास में भी ऐसी कोई चर्चा नहीं है कि किसी जाति ने बुद्ध धर्म को अपनाकर अपना वर्ण या जाति छोड़ दी हो | ना ही ऐसा कुछ कही है के बुद्ध ने जाति/वर्ण छोड़ने का कहा है, ना ही ब्राह्मण जाति के त्याग की बात कहीं मिलती हैं | ऐसा कुछ भी ना तो भारत के प्राचीन साहित्य और इतिहास में है तथा ना ही किसी चीनी यात्री ने किसी सामाजिक/ जातिगत आधारित आन्दोलन के विषय में ऐंसा कुछ लिखा है |”[8]
तीसरे तर्क के विषय में राजीव मल्होत्रा अपनी पुस्तक “द बैटल फॉर संस्कृत” लिखते हैं के –
“बुद्ध से २००० साल पहले “इंडस सरस्वती सिविलाइज़ेशन” थी, जिनकी लिपि भी थी, तथा कई सारा साहित्य इनके समय में लिखा गया है | अतः यह बात बिलकुल निरर्थक है कि बौद्ध धर्म के आने के बाद भारत में लेखन की शुरुआत हुई |”[9]
इसमें एक तथ्यपूर्ण बाद यह भी है के यदि “पाली भाषा का इतिहास पढ़ा जाए तो पता चलता है यह बुद्ध के काफी बाद में विकसित हुई है | अतः बुद्ध के प्रवचन पाली में नहीं थे | बल्कि बाद में लोगों ने उन्हें पाली में लिखा है | कई लोगों का मत यह भी है के बुद्ध के काफी प्रवचन संस्कृत में ही थे |
चौथा तर्क जिसमे पोलक कहते हैं – “संस्कृत तथा वैदिक धर्म में पहले सिर्फ कर्मकांड थे इसमें अन्य ज्ञान वर्धक चीजे जैसे काव्य, नाटक आदि बौद्धों के संस्कृत को अपनाने और उदार बनाने के बाद में जुड़े”|[10] यह बात भी तथ्यहीन दिखाई पढ़ती है क्योंकि वेदों में प्राचीन समय से काव्य का जिक्र होता आया है | इसके कुछ उदाहरण हैं  –
अथर्व वेद में काव्य के विषय में लिखा गया है कि काव्य वो है जो कभी पुराना नही होता , जो कभी खत्म नही होता , उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं | कोई इसे कविता कह सकता है तो कोई बाहरी रहस्यों से जोड़ सकता है |”[11]
इसी तरह प्रसिद्द जर्मन शब्दकोष “वाटरबच(१८५५-१८७५)” में इक्यावन (51) बार सिर्फ वेदों के सन्दर्भ में “काव्य” शब्द का प्रयोग है | इसमें स्तुति, कला , प्रेरणा इत्यादि के काव्यों का वर्णन है |[12] राजशेखर ने भी नवी शताब्दी में “काव्यमीमांसा” में काव्य का वर्णन किया है | इसी तरह के. कृष्णामूर्ति ने “भंडारकर ओरिएण्टल शोध संस्थान” के वॉल्यूम ७२/७३, नं १/४ , अमृतमहोत्सव (१९१७-९२), पृष्ठ संख्या ७१-७७ में छपे उनके लेख “पोएटिक आर्टिस्ट्री इन वैदिक लिटरेचर” में यह जिक्र किया है कि किस तरह वेदों में अपार श्रद्धा होते हुए भारत में इन्हें काव्यों की तरह भी लिया गया है |
ऐसे ही यजुर्वेद (३०.६) में नायक, नृत्य तथा संगीत का वर्णन है और ऋग्वेद में ‘नृत्यु’ शब्द का प्रयोग किय गया है , जिसका अर्थ है महिला नर्तकी |[13] इस तरह के कई उदाहरण वैदिक साहित्य में भरे पढ़े हैं जिन्हें ना सिर्फ भारतीय बल्कि कई पश्चिमी विद्वानों ने भी कई जगह उल्लेखित किया है | अतः पोलक का चौथा तर्क जो यह कहता है के बुद्ध के आगमन के पूर्व संस्कृत तथा वैदिक संस्कृति में कर्मकांड के सिवा कुछ नहीं था यह उचित नहीं लगता |
पांचवा तर्क जिसमें पोलक एवं उनके अनुयायी यह कहते हैं के रामायण ब्राह्मणों द्वारा बुद्ध के बाद जातक की कथा को पढ़कर गढ़ी गयी है तथा जातक कथाएं भारत में पहला लिखित साहित्य है |[14] इस तर्क को कई जगह पर कई विद्वानों ने चुनौती दी है | उन्ही के कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं –
पश्चिमी विद्वान रोबर्ट गोल्डमेन जो खुद पोलक के साथी रहे हैं, वह मानते हैं के जातक कथाओं में वाल्मीकि रामायण से सन्दर्भ लिया गया है क्योंकि जातक वाल्मीकि रामायण के काफी बाद लिखी गयी है | गोल्डमेन यह भी कहते हैं के पोलक ने उनके तर्क – “रामायण जातक के बाद लिखी गयी है” को   “दशरथ जातक” का प्रयोग करके लिखा है , इसका सन्दर्भ उन्होंने वेबर के उन्नीसवी शताब्दी के “दशरथ जातक” पर किये गये विश्लेषण से उठाया है तथा वेबर का यह विश्लेषण तथा निष्कर्ष अब पश्चिम में नकारा जा चूका है तथा गलत सबित हो चूका है | अतः पोलक का भी यह कहना कि रामायण को ब्राह्मणों ने जातक से उठाया और वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए प्रयोग किया यह गलत प्रतीत होता है | [15]
छठे तर्क में पोलक कहता है कि वैदिक धर्म बुद्ध से पहले सिर्फ यज्ञ आदि पर आधारित था तथा इसके साहित्य में सामाजिक रूडीवादिता के सिवा कुछ नहीं था | यह तथ्य भी एकदम बचकाना सा मालूम पढता है , क्योंकि वैदिक धर्म के साहित्य में ना सिर्फ यज्ञ बल्कि इतिहास, नाट्य – शास्त्र, योग, तंत्र , कला , संगीत आदि बहुत कुछ प्रमाणिक रूप से है तथा ऐसी कई और चीजों के उदाहरण वैदिक साहित्य तथा वैदिक काल के समय के मिलते हैं जो यज्ञ के अलावा संस्कृति, सभ्यता, प्रकृति दर्शन, शास्त्र आदि पर आधारित हैं | वेदों को लिखने वालों में भी गार्गी जैसी विदुषी महिलाएं तथा अनेको भिन्न भिन्न कुल के व्यक्तियों का हाथ रहा है | अतः यह कहना के बुद्ध से पहले यहाँ सिर्फ यज्ञ होते थे एवं यह ब्राह्मणों के कब्जे में था | यह पुर्णतः गलत है , क्योंकि रामायण के  संदर्भ  में यह सिद्ध हो चूका है कि वह बुद्ध के काल से पहले लिखी हुई है , उसे वाल्मीकि ने लिखा था जो जन्म से शुद्र वर्ण के थे | इसी तरह के कई उदाहरण वैदिक संस्कृति में मिलते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि सामाजिक रूढिवादिता का इस सभ्यता में कोई स्थान नहीं था बल्कि सामाजिक समरसता और एकता प्रमुख रूप से इस काल में देखी गयी है |

उपसंहार :

इस शोधपत्र का मूल उद्देश्य किसी पश्चिमी लेखक का पूर्व पक्ष करना या किसी की कमी निकालना नहीं था बल्कि इस शोध का मूल उद्देश्य उस सोच को समझना था जिसके आधार पर भारतीय समाज आज विघटन की ओर बढ़ता जा रहा है | कुछ पश्चिमी लेखको की नासमझी, अल्पज्ञान, या पक्षपाती रवैये के कारण भारत के इतिहास तथा साहित्य को कई सालों से पश्चिम में तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में उपेक्षा का सामना करना पड़ा है तथा इसी कारण आज कई नव-बौद्ध जैसे आन्दोलन देश में खड़े हो गए हैं | कुछ आन्दोलनों के पीछे विदेशी फंडिंग भी एक कारण है |[16] मगर बहुत सारे जन आक्रोश तथा आन्दोलनों के पीछे भारतीयों का स्वयं का अपने विषय में ना जानना एक बहुत बड़ा कारण नजर आता है | भारत में अंग्रेजों के राज के बाद से एक प्रथा सी चल गयी है कि जो भी पश्चिम से आता है उसे ब्रह्म वाक्य लिया जाता है | यहाँ तक कि स्वयं के विषय में जानने के लिए भी कई पढ़े लिखे बुद्धिजीवी भारतीय, पश्चिमी साहित्य या पश्चिमी प्रमाणपत्र की ओर देखते हैं | जिसमे कई बार भ्रामक साहित्य या गलत इतिहास का शिकार होकर भारतीय हीन भावना के शिकार हो जाते हैं | अतः इस शोध पत्र में ऐसे ही एक विषय को लेकर चर्चा की गयी है तथा उसपर दिए गए पश्चिमी विद्वानों के तर्कों का विश्लेषण किया गया है | इस शोधपत्र में कई सारे तर्कों तथा विश्लेषणों के आधार पर यह बात प्रमाणिकता से कही जा सकती है कि बौद्ध मत कभी वैदिक धर्म से अलग नहीं रहा बल्कि यह दोनों एक ही हैं | कालांतर में कई विदेशी लेखकों ने इसे गलत रूप में समझने के कारण इन्हें अलग अलग पंथ समझ लिया था , जो अब धीरे धीरे गलत साबित हो रहा है | चूँकि भारत कई साल गुलाम रहा अतः भारत की ओर से इन तर्कों का खंडन पीछे कुछ सालों में नहीं हो सका , पर अब कई लोग मुखरता से सत्य को प्रमाणित कर रहे हैं तथा दुनिया भर में उनकी बात को सुना जा रहा है | इस शोध पत्र के अंत में यही कहा जा सकता है कि विचार बुद्ध के हों या वैदिक, यदि उन्हें सही तरह से समझा जाए तथा जिस देश और जिस जगह से यह विचार उपजे हैं वहाँ के लोगों तथा साहित्य से प्रमाण निकाले जाए तो यह दो विभिन्न धारा नहीं बल्कि एक ही प्रतीत होती हैं |

अन्य सन्दर्भ सूचि :

  • जातक
  • त्रिपिटक
  • बैटल फॉर संस्कृत (राजीव मल्होत्रा)
  • ब्लॉग कोएनार्ड एल्स्त
  • शेल्डन पोलक (एक्सियल सिविलाईसेशन एंड वर्ल्ड हिस्ट्री)
  • ब्रेकिंग इंडिया (राजीव मल्होत्रा)
  • पाली साहित्य का इतिहास
  • वाल्मीकि रामायण
References
[1] Jataka
[2] Alexander Wynne (2007). The Origin of Buddhist Meditation. Routledge. pp. 8–23. ISBN 978-1-134-09740-1.
[3] Hajime Nakamura (2000). Gotama Buddha: A Biography Based on the Most Reliable Texts. Kosei. pp. 127–129. ISBN 978-4-333-01893-2.
[5] – Page 400-411 – Axial Civilisations and World History
[6] Pollock 2006:52.
[7] Ananda Coomaraswamy. Hinduism and Buddhism
[8] Rajiv Malhotra.The Battle For Sanskrit.pp. 128-129.
[9] Rajiv Malhotra.The Battle For Sanskrit.pp. 387-388.
[10] Pollock 2006:75-76.
[11] Atharva Veda: 10.8.32
[12] Sanskrit Worterbuch (Sanskrit German Dictionary of 7 volumes) authored by Bohtlingk and Roth(1855-1875, published from St. Petersburg)
[13]  Rajiv Malhotra.The Battle For Sanskrit.pp. 416-417.
[14] Pollock 1986:37-38.
[15] Goldman 1984:32
[16] Rajiv Malhotra.Breaking India.
-Shubham Verma
[Also Published in India Facts]

Tuesday, November 13, 2018

Jaati, varna, dalit: Is Dalit politics brainchild of the British?

As against what I heard in my childhood, that it is the upper caste Hindus such as Brahmins and Kshatriyas that oppress the lower caste, poor Dalits, as an adult I saw certain contradictions that would question this argument. There are ample upper caste poor people and there are ample lower caste rich people. People, especially in villages, do not discriminate on the basis of caste but economic condition, more like rich versus poor. This is not to say that there is no discrimination on the basis of caste.


I decided to pursue my childhood interest of history and social sciences and referred to some books to find out exactly what is the problem here. I found out that the English word ‘caste’ derives from the Spanish and Portuguese casta, which the Oxford English Dictionary quotes John Minsheu’s Spanish dictionary (1599) to mean, “race, lineage or breed.” When the Spanish colonised the New World, they used the word to mean a “clan or lineage.”
But in India, it is not a race or the lineage. The Rig Veda, Purus Sukta or the Manu Smriti, wherein the varna system mentioned, say: “Every society needs four kind of people. First ‘Kshatriya’ which includes administrators, rulers, bureaucrats, army, police etc; second is ‘Brahman’ which includes teachers, saint, scientists, intellectuals, writers, artists etc.; third, ‘Vaishya’ which includes all business class people, farmers, shopkeepers etc. who run the complete economy of the society and the fourth one is ‘Shudra’, the working class people who do jobs under these three classes.”
It was not based on birth but it was purely based on ‘Karma’ i.e. anyone can become kshatriya or brahmin by his karma. Few examples were Valmiki, Surdas, Kabirdas etc. where their forefathers were from different ‘varna’ and yet they adopted new ‘karma’ of Brahmins so people started worshipping them like Brahmins. Similarly, Chandra Gupt Maurya was from a very poor family and Chanakya made him the king. Similarly, Parshuram, a Brahmin by Karma, fought like Kshatriya and beat several Kshatriyas. Several Kshatriyas such as Mahavir Swami, Gautam Buddha or even Ashoka later chose to work as Brahmins and people accepted them. In the whole era of Veda or even later in Ramayana, Mahabharata etc. one will never find the word Dalit.
So, if it was not in our ancient books than who created it? My investigation further brought me to more words such as ‘Jaati’. Now, when we understand the meaning of caste and varna, let us find out what is Jaati?
Britishers and all foolish social sciences writers with colonised mindset confuse people by saying that jaati is caste and varna is also caste. It is the most stupid argument which our new generation social sciences writers have propagated. I do not have any problem with these writers but definitely have a problem that none of them ever investigated these terms. Let me assert here that caste and varna are two different things. Jaati is a wrong pronunciation of the word ‘gyati’. It is similar to ‘gyana’ which is transliterated as “Jnana.” Just as Jnana is actually gyaan, so is Jaati actually gyaati, which means knowledge or mastery of a particular skill set. 
India, our Bharat, was known as a Golden Bird and the GDP of India till year 1600 was 24.3 % of the world economy. This was possible only because of our Jaati-s such as Sutar, Lohar, Badhai, Kumhar, Chamar, Bunkar etc. Every village had more than 16 Jaati-s that manufactured product according to their skill and when it was consumed in the village, they all exported it to the outside world. In that way, India got gold from the whole world and because of this India became a Golden Bird during that time.
So the question is: “What happened after that period?”
Important research from Professor Dharampal’s books and Dada Bhai Naoroji’s “Drain of Wealth” theory tells us that Mughal invaded India, converted people, killed people but they started living in India so India’s wealth did not go outside extensively during the Mughal period. But when the Britishers came, they looted Indian wealth from everywhere, from temples to the villages. One can understand the scale of this loot with a small example of Robert Clive, who alone sent 30 ships filled with gold and jewelry from Bengal to Britain. It is well documented in British documents.
Not only this, the Britishers started railways because they wanted to steal the wealth from every part of India. So, they started Indian railways so that they can fill these trains with Gold and send this gold to Britain through Ships. In that way, British looted India for more than 150 years. During this time frame, they destroyed our Gurukul system of education and started McCauley’s English education system; they destroyed our agriculture by imposing taxes on farmers. Similarly, they imposed several taxes on our small scale industries run across villages. Because of this our whole Jaati based economy was destroyed and the Britishers started their own companies and manufactured goods and products wherein these skilled people were employed as labour. This type of exploitation destroyed all business and industries of India and very few people survived this economic onslaught. The gap between the rich and the poor increased during that time.
After the 1857 revolution, the British understood that Indians were getting united and if they do not do something than British Empire cannot survive in India. So, they started working on their “Divide and Rule” policy. According to that policy, they decided to divide Indian citizens on the basis of:  
· Arya-Dravid (Demographic division) 
· Hindu-Muslim (Religious division) 
· Upper Caste - Lower Caste (Inter Hindu Division) etc. 
I need not name anyone but all the major leaders from different communities who raise this issue of caste or Pakistan etc. have studied abroad, either in Britain or the USA and one can easily find out how they were/are being trained as a rebellion. 

Coming back to our topic of caste, we know how Britishers increased poverty in India by destroying Jaati based industries. When people stated revolting against Britishers, they started arguing: “Those who are rich are upper caste and those who are poor are lower caste and lower caste is poor because of upper caste.”
It is one of the most stupid arguments which were not digestible even at that time. So, they did census and used these terms called SC, ST, General and divided the society on its basis. Britishers also hired people like Wilberforce, MaxMueller etc. to change the Sanskrit text books and religious books. These people had written worst things about SC people and some of the Brahmin people helped them in this because the Britishers praised them. But what the Brahmins did not realise was that the Britishers went to SC people and told them that “because of these Brahmins you are poor.” This is how this politics of caste started. 
Later Gandhiji tried to bring in the name ‘Harijan’ and someone further changed it to Dalit. According to Wikipedia, “The word ‘dalit’ is derived from the Sanskrit past participle adjective दलित (dalita), and it means divided or split.”
Post-Independence, communist and other politicians used it for their political gains. Unfortunately, the “Divide and Rule” policy of the British is still dividing the society with the same name. What a shame? 
One more fact about lower caste is that “No one is lower caste in India”. I have interviewed one Bhangi (manual scavenger) family and asked about their ancestors. They told me that we are also Kshatriyas. “At the time of Mughals, we lost the battle and at that time Mughals put this condition in front of us that ‘Either we follow Islam or do manual scavenging.’ We did not change our religion so they gave us this punishment of manual scavenging job. Our ancestors thought that we will win our kingdom one day but we did not win and meanwhile, our generations became untouchable for the whole society. We are actually Kshatriyas,” the family told me. 
Similarly, ‘Lohar’ (the ironsmith) told me, “We are Rajputs. We are from Mevad and at the time of Akbar, we promised to Maharana Pratap that we will enter in Mevad only when you wins the battle against Akbar. It never happened and we are still roaming all around India.”  One ‘Chamar’ family told me chamar in Sanskrit means ‘chamda’ worker, which means a person who makes things with/of leather. He also asked me a question: Can you call Rebook or Adidas CEO a shudra or lower caste? NO. Then why are you calling us lower caste? We are not lower caste, we all Jaatis are ‘Vaishya’, the third Varna i.e. the business class.” 
Similarly, I have stories from all SC and ST communities and the common thing that they tell is that they all are descendants of royal families or business class. It is the Britishers who taught us they are lower. They not only destroyed the self-respect of these ‘gyati-s’ but also started reservation system, which again increased hatred amongst two communities of Hindu religion. 
Now is the right time to understand this division of our society and high time we not just declared but considered everyone to be of general category. It will increase self-respect in all communities and motivate everyone to work for the nation. The reservation should be given to all poor people, irrespective of caste, creed, colour or religion.
Written by - Shubham Verma

(Also published in Bharat Niti Website - Link = https://www.bharatniti.in/article/jaati-varna-dalit-is-dalit-politics-brainchild-of-the-british/236 )

Monday, September 24, 2018

पढ़िए संघ से जुड़े २३ प्रश्नो के समाधान - मोहन भगवत जी द्वारा


प्रश्न 1- हिन्दुत्व के संबंध में।

क्या हिन्दुत्व को हिन्दुईज्म कहा जा सकता है?

देश में अन्य मत पंथों के साथ हिन्दुत्व का तालमेल कैसे संभव है?

क्या जनजातीय समाज भी हिन्दू है?

उत्तर - हिन्दुत्व, हिन्दूनेस, हिन्दुईज्म ये गलत शब्द हैं क्योंकि ईजम एक बंद चीज मानी जाती है। ये कोई ईजम नहीं है, यह एक प्रक्रिया है जो चलती रहती है। गांधी जी ने कहा कि सत्य की अनवरत खोज का नाम हिन्दुत्व है। राधाकृष्ण जी का एक बहुत सुंदर कोट है, मेरे पास नहीं है इसलिए मैं नहीं बताऊँगा। लेकिन एक उसका चरण है कि हिन्दुत्व एक प्रोसेस है। सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। मोस्ट डायनामिक है और उसमें सबका योगदान है जो भारत में हो गए विचारक। इसलिए हिन्दुत्व को हिन्दुईज्म नहीं कहना चाहिए। ऐसा मेरा मानना है और अन्य मत पंथों के साथ तालमेल कर सकने वाली एकमात्र विचारधारा, ये भारत की विचारधारा है, हिन्दुत्व की विचारधारा। क्योंकि तालमेल का आधार मूल एकत्व, प्रकार विविध है और विविध होना आवश्यम्भावी है। क्योंकि प्रकृति विविधता को लेकर चलती है, विविधता ये भेद नहीं है, विविधता ये साज-सज्जा है, प्रकृति का शृंगार है, ऐसा संदेश देने वाला और संदेश यानी थ्योराइजेशन के आधार पर नहीं अनुभूति के आधार पर देने वाला एकमात्र देश हमारा देश है। और इसलिए हिन्दुत्व ही है जो सबके तालमेल का आधार बन सकता है। जनजातीय समाज भी हिन्दू है। कल मैंने जिस राष्ट्रीयता का वर्णन किया। हमारी कल्पना का। उस अर्थ में जनजातीय समाज भी हिन्दू है। भारत में रहने वाले सब लोग हिन्दू ही हैं। पहचान की दृष्टि से, राष्ट्रीयता की दृष्टि से। ये कुछ लोग जानते हैं, गर्व से कहते हैं, कुछ लोग जानते हैं, गर्व नहीं अनुभवता है, इतना कहते हैं। कुछ लोग जानते हैं लेकिन अन्य किसी बात के कारण कहने में संकोच करते हैं और कुछ लोग नहीं जानते हैं इसलिए नहीं कहते हैं।

मैं तो कहता हूं कि भारत कि ये जो प्राचीन विचारधारा अब तक चली आ रही है और अन्यान्य रूपों में सर्वत्र प्रकट हो गई है। उन रूपों में इतनी विविधता है कि कई रूप एक-दूसरे के विरोधी भी लगते हैं। लेकिन वो एक समान मूल्यबोध लेकर चलने वाली विचारधारा है। उस मूल्यबोध का प्रारंभ हमारे जनजातियों के बंधुओं के जीवन से और कृषकों के जीवन से प्रारंभ हुआ है। इस अर्थ में तो ये हमारे पूर्वज हैं। ऐसे ही उनको देखना चाहिए और उनकी सारी स्थितियों का, समस्याओं का विचार करना चाहिए। ये सब अपने हैं। भारत में कोई पराया नहीं, परायापन हमने निर्माण किया है। हमारी परंपरा ने नहीं, वो तो एकता ही सिखाती है।


प्रश्न 2 - जातीय व्यवस्था में समरसता।

पूरे हिन्दू समाज में समरसता के लिए रोटी-बेटी का संबंध होना चाहिए। संघ इसके लिए क्या करेगा ?

अंतरजातीय विवाह तथा अंतरधार्मिक विवाह के संबंध में संघ क्या सोचता है ?

 क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हिन्दू समाज जातियों में नहीं बँटेगा ?

उत्तर - रोटी-बेटी व्यवहार का हम पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन जब इसको करने जाते हैं तो रोटी व्यवहार तो आसान है। हम आसानी से कर सकते हैं और मजबूरन बहुत लोग आजकल कर भी रहे हैं, वो मन से होना चाहिए। इसकी आवश्यकता है समझदारी ठीक करनी पड़ेगी। बेटी व्यवहार थोड़ा कठिन इसलिए है कि उसमें केवल सामाजिक समरसता का विचार नहीं, दो परिवारों के मिलन का भी विचार है। वर-वधू के भी मैचिंग का विचार है। ये सब देख कर हम उसका समर्थन करते हैं। महाराष्ट्र में पहला 1942 में अंतरजातीय विवाह हुआ। पहला ही था और अच्छे सुशिक्षित लोगों का था इसलिए उसकी प्रसिद्धी हुई। उस समय उसके लिए जो शुभ संदेश आए थे, उसमें पूजनीय डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर का भी संदेश था और पूजनीय श्री गुरुजी का भी संदेश था और गुरुजी ने उस संदेश में कहा था कि आपके विवाह का कारण केवल शारीरिक आकर्षण नहीं है, आप ये भी बताना चाह रहे हैं कि समाज में हम सब एक हैं, इसलिए आप विवाह कर रहे हैं। मैं आपका इस बात के लिए अभिनंदन करता हूं। और आपको दाम्पत्य जीवन की सब प्रकार की शुभकामनाएं देता हूं।

ये मानव, मानव में भेद नहीं करना, रुचि और अरुचि प्रत्येक की अपनी होती है। पूरा जीवन साथ में चलाना है। वो ठीक से चल सकता है कि नहीं इतना देखना चाहिए। तो बेटी व्यवहार के लिए भी हमारा समर्थन है। मैं तो कभी-कभी कहता हूं कि भारत में अंतरजातीय विवाहों की गणना करके अगर परसेंटेज निकाला जाए तो शायद आपको सबसे ज्यादा परसेंटेज संघ के स्वयंसेवकों का मिलेगा, ऐसा करने वाले। इस रोटी-बेटी व्यवहार का चलन बढ़ाने से, यानी केवल विवाह और केवल साथ बैठकर खाने की बात नहीं। जीवन के हर कृति में समाज को अभैद दृष्टि से देखना, मन से उसको निकालना। ये जब करते हैं तो हिन्दु समाज जातियों में नहीं बटेगा। इसको हम सुनिश्चित कर सकते हैं। वो बटेगा नहीं ये मैं जानता हूं इसलिए कि प्रत्येक हिन्दू की जो आत्मा है वो आत्मा एकता में ही विश्वास करती है और मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि आत्मा से अलग होकर ज्यादा चल नहीं सकता। तो वो आत्मा जरूर देश, काल, परिस्थिति के अनुसार आवश्यक नया शरीर धारण करेगी। इस पर मेरा पूर्ण विश्वास है और इसलिए हम लोग सारे हिन्दुओं को एकत्र करने का प्रयास कर ही रहे हैं। इस विश्वास के साथ ही कर रहे हैं। नहीं तो जिस जमाने में संघ शुरू हुआ, उस जमाने में किसी का विश्वास नहीं था ऐसे हो सकता है। बहुत लोगों ने डॉ. हेडगेवार को कहा कि कंधे पर पांचवा न हो तब तक जिस समाज के चार लोग एक दिशा में नहीं चल सकते। उस समाज को कैसे एकत्रित करेंगे आप ? लेकिन आज आप देखते हैं कि कर ही रहे हैं। तो इसलिए जरूर होगा। ये किया जा सकता है, हमने करके दिखाया गया है और ये किया जाना चाहिए और हम करेंगे।

प्रश्न 3 - संघ एवं जाति व्यवस्था ।

हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था को संघ कैसे देखता है ?

संघ में अनुसूचित, जनजातियों का कैसा प्रतिनिधित्व और स्थान है ?

घुमंतु और विमुक्त जातियों के लिए क्या संघ ने कोई पहल की है ?

उत्तर - जाति व्यवस्था कहते हैं, उसमें गलती होती है। आज व्यवस्था कहां है वो अव्यवस्था है। कभी ये जाति व्यवस्था रही होगी, वो उपयुक्त रही होगी, नहीं रही होगी। आज उसका विचार करने का कोई कारण नहीं है वो जाने वाली है। जाने के लिए प्रयास करेंगे तो पक्की होगी। उसको भगाने के लिए प्रयास करने के बजाय जो आना चाहिए उसके लिए हम प्रयास करें तो ज्यादा अच्छा होगा। अंधेरे को लाठी मार-मार कर भगाएंगे अंधेरा नहीं जाएगा। एक दीपक जलाओ वो भाग जाएगा। एक बड़ी लाईन खींचो तो सारे भेद विलुप्त हो जाएंगे। यही संघ कर रहा है और हम मानते हैं कि सामाजिक विषमता का पोषण करने वाली सभी बातें, ‘लॉक स्टॉक एंड बैरलबाहर जानी चाहिए। हम विषमता में विश्वास नहीं करते। ये प्रत्यक्ष आचरण में आने वाली अफरा-तफरी है लेकिन वो करनी ही पड़ेगी। और उस पर हमने कदम बढ़ाया। संघ का काम जैसे-जैसे बढ़ेगा और सर्वत्र पहुंचेगा, वैसे-वैसे संघ के कार्यकर्ताओं में अब ऊपर जाति का हमने निश्चित किया और अनुसूचित जाति के कितने लोग हैं हम पूछ रहे हैं, इसलिए उत्तर देना जरा कठिन हो रहा है। लेकिन आज की दृष्टि से देखें तो जिनको हम अनुसूचित जाति, जनजाति के मानते हैं उन बंधुओं का भी प्रमाण दिखने लगेगा। हम संघ में पूछते नहीं।
एक बार मैं सरकार्यवाह चुना गया, पहली बार। हमारे सहसरकार्यवाह सुरेश जी सोनी, उनकी नियुक्ति हो गई। तो मीडिया ने चलाया कि ये भागवत गुट की विजय हो गई लेकिन ओ.बी.सी. को रिप्रेजेंटेशन देना है इसलिए सोनी जी को रखा है। तो मैंने सोनी जी को पूछा कि सोनी जी आप ओ.बी.सी. में आते हैं क्या? तो उन्होंने थोड़ा-सा स्माइल कर दिया और उत्तर नहीं दिया। तो अभी-भी सोनी जी कहां आते हैं मैं नहीं जानता। ये संघ में वातावरण है। तो अगर हम इसी ढंग से बढ़ते हैं तो ये परिवर्तन होता है। नागपुर में, मैं पढ़ रहा था, विद्यार्थी था। उस समय नागपुर संघ के लगभग सब अधिकारी एक ही जाति के थे, ब्राम्हण जाति के थे। लेकिन मैं नागपुर का प्रचारक बनकर 80 के दशक में जब वापस आया तो जगह-जगह जितनी बस्तियां थीं उस प्रकार की कार्यकारिणी बनी थी। इसलिए बनी थी कि हमारी शाखाएं बढ़ीं, हम उस बस्ती में पहुंचे, हमने काम बढ़ाया, स्वाभाविक उसमें से कार्यकर्ता तैयार हुए, वो आ गए। कोटा सिस्टम करेंगे तो जाति का भान रहेगा। सहज प्रक्रिया से सबको लाएंगे तो फिर जात नहीं रहेगी। सहज प्रक्रिया लाते समय लाने वालों के मन में ये भान रहना चाहिए क्योंकि स्वाभाविक प्रवृत्ति मनुष्य की अपने जैसे को पकड़ने की होती है। हमको अपने जैसे को नहीं पकड़ना है, सबको पकड़ना है। ये ध्यान रखकर अगर काम चलता है तो ऐसा होता है। 50 के दशक में आपको ब्राम्हण ही नजर आते थे। क्योंकि आप पूछते हो तो थोड़ा बहुत ध्यान में आता है कि जोन स्तर पर, प्रांत और प्रांत के ऊपर जोन, जोन स्तर पर सभी जातियों के कार्यकर्ता आते हैं। अखिल भारतीय स्तर पर भी अभी एक ही जाति नहीं रही। वो बढ़ता जाएगा और सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन जिसमें काम करने वालों में सभी जाति वर्गों का समावेश है। ऐसी कार्यकारिणी आपको उस समय दिखने लगेगी। मैंने कहा यात्रा लम्बी है लेकिन हम उस ओर आगे बढ़ रहे हैं ये महत्व की बात है।

घुमंतु जातियों के लिए हमने काम किया है। मैं मानता हूं कि स्वतंत्रता के बाद उनकी दखल लेकर काम करने वाले हम पहले होंगे। महाराष्ट्र में ये काम शुरू हुआ। और उसके चलते बहुत सारी बातें हुईं। उनको स्थिर करना, उनके बच्चों को शिक्षा में भेजना, शिक्षा प्राप्त करके वो समाज में आगे बढ़ें इसको देखना। उनकी जो परम्परा से आने वाली रूढ़ियां कुरीतियां हैं उसको हटाने का भाव उनके ही मन में उत्पन्न करके उसको गृहस्थ करना आदि सारी बातें करते-करते कार्य का परिणाम ऐसा हो गया कि पहले महाराष्ट्र सरकार ने और केन्द्र सरकार ने भी उनके लिए यानी अलग कमीशन बनाया है और वो पायलट प्रोजेक्ट हमारा चला है। यमगरवाडी नाम का स्थान है। वहां उसकी केन्द्रीयभूत जानकारी और कार्य का प्राथमिक स्वरूप आपको देखने को मिलेगा। जिनको जाना है जरूर जाइए। ये जो विदेशों में यात्रा करते हैं आप मनोरंजन के लिए, एक बार वहां की भी यात्रा कीजिए। कितने पापड़ बेलकर कार्यकर्ताओं ने इस समाज को बराबरी में लाने का प्रयास चलाया है। ये आप जान सकेंगे। उसको देखिए उस कार्य को अब अखिल भारत में जितनी घुमंतु विमुक्त जातियां है, उनके लिए बढ़ाने का भी हमने उपक्रम पिछले वर्ष से प्रारंभ किया है और हम उनके लिए भी काम करेंगे।

प्रश्न 4 - शिक्षा में भारतीय मूल्य।

शिक्षा में परम्परा और आधुनिकता का समन्वय वेद, रामायण, महाभारत आदि का शिक्षा में समावेश सहशिक्षा आदि विषयों पर संघ की क्या राय है ?

उच्च शिक्षा का स्तर लगातार घर रहा है। भविष्य के भारत का निर्माण कैसे होगा ?

उत्तर- देखिए धर्मपाल जी का ग्रन्थ आप पढ़ेंगे तो आपको ध्यान में आयेगा कि अंग्रेजों के आने के बाद उन्होंने जब सर्वे किया तो उनको ध्यान में आया कि परम्परा से हमारी शिक्षा पद्धति ज्यादा प्रभावी अधिक लोगों को साक्षर बनाने वाली, मनुष्य बनाने वाली और अपना जीवन चलाने के लिए योग्य बनाने वाली थी। वो अपने देश में ले गए और ऐसा सब कुछ एक साथ न कर सकने वाली उनकी पद्धतियां उन्होंने लाईं। ये इतिहास है। और इसलिए आज की दुनियां में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जो लेने लायक है वो लेते हुए अपनी परम्परा से जो लेना है वो लेकर हमको एक नई शिक्षा नीति बनानी चाहिए। आशा करता हूं कि नई शिक्षा नीति आने को हुई है। उसमें ये सब बातें होंगी।

अपने देश का विचारधन उसमें से मिलना चाहिए। चतुर्वेदाः पुराणानि सर्वोपनिषदस्तथा रामायणं भारतं च गीता सद्दर्शानी च जैनागमस्त्रिपिटका गुरुग्रन्थः सतां गिरा (यानी संत वाणी) ऐषद ज्ञाननिधि श्रेष्ठ। ये शिक्षा भारत के लोगों को मिलना ही चाहिए। सबको मिलना चाहिए। और भी सम्प्रदाय हैं जो बाहर से आये हैं लेकिन उसकी अच्छी खासी संख्या है उसमें भी जो मूल्यबोध है वह सिखाना चाहिए। रिलीजन की शिक्षा भले हम न दें लेकिन दृष्टि मूल्यबोध इस दृष्टि से और उसमें से निकलने वाले संस्कारों की दृष्टि से इन सबका अध्ययन पठन पाठन हमारी शिक्षा पद्धति में देश की शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा, स्नातक तक अनिवार्य है। ऐसा संघ का मत है। शिक्षा का स्तर घट रहा है ऐसा हम कहते हैं शिक्षा नहीं शिक्षा का स्तर नहीं घटता। शिक्षा देने वालों का स्तर घटता है। लेने वालों का घटता है। छात्र शिक्षा के लिए आता है कि अपने जीवन की कमाई पर दृष्टि रखकर उसके लिए आवश्यक डिग्री के लिए आता है। उसको हम घर में कैसा तैयार करते हैं। मुझे एक सज्जन पूना में मिले। सज्जन यानी कृतित्व सम्पन्न व्यक्ति है। पढ़ेगा लिखेगा नहीं इसलिये शिक्षा छोड़कर उनके पिताजी ने उनको पूना भेज दिया सातारा से। और वहां वो प्रिंटिंग प्रेस का काम उसमें करने लगे। करते करते उनके ध्यान में आया तो उन्होंने अपने एडवरटाइज एजेंसी चलाई और साथ-साथ शिक्षा भी, तो ग्रेजुएशन तक पूरी कर ली। और आज उनकी स्थिति यह है कि एक अव्वल एडवरटायजिंग फर्म उनकी है। और महाराष्ट्र सरकार को भी किसी गांव का सत्य डाटा चाहिए तो उनके पास जाते हैं। प्रदीप लोखंडे उनका नाम है। उन्होंने मुझे कहा कि भागवत् जी आप लोगों में भाषण देते हो, एक संदेश हमारा पहुंचाओ। तो मैंने कहा क्या संदेश है। उन्होंने कहा हर व्यक्ति को लगता है कि अपना बेटा आर्किटेक्ट, इंजीनियर, डॉक्टर ऐसे ही बने। अरे हर लड़का ऐसा नहीं बन सकता। हर एक की अपनी क्षमता भी होती है रुचि भी होती है। उसको जो अच्छा लगता है उसको करने को मिले और जो वह करे वो उत्कृष्ट करे। तिलक जी के लड़के ने कहा कि मुझे यह यह पढ़ने की इच्छा है तो तिलक जी ने उसको पत्र लिखा। कि जीवन में क्या पढ़ना है यह तुम विचार करो। तुम अगर कहते हो कि मैं जूते सिलाने का व्यवसाय करता हूं तो मुझे चलेगा। लेकिन ध्यान रखो कि तुम्हारा सिलाया हुआ जूता इतना उत्कृष्ट होना चाहिए कि पूना शहर का हर आदमी कहे कि जूता खरीदना है तो तिलकजी के बेटे से खरीदना है। अब जो मैं सीख रहा हूं वो मैं उत्कृष्ट करूंगा उत्तम करूंगा। उसकी उत्कृष्टता में मेरी प्रतिष्ठा है। ये भावना भरकर हम छात्रों को भेजते हैं क्या स्कूल में अपने घर के लड़कों को। हम तो उनको ज्यादा कमाओ, कैसा भी कमाओ लेकिन कमाओ। ये मंत्र देकर भेजेंगे तो शिक्षा कितनी भी अच्छी होगी वो लेंगे नहीं उसको। तो उनके पिताजी ने कहा कि दूसरा कुछ लेना है। शिक्षक को ये भान है क्या कि मैं अपने देश के बच्चों का भविष्य गढ़ रहा हूं क्या। एक एक व्यक्ति को मैं गढ़ रहा हूं। अनेक महापुरुष अपने प्राथमिक विद्यालय के, माध्यमिक विद्यालय के, कॉलेज के शिक्षकों को याद करते हैं। क्यों करते हैं। उनके जीवन में कुछ कॉन्ट्रिब्यूशन है। ऐसा उनके जीवन में हमको कांट्रीब्यूट करना है ये देने वाला शिक्षक है क्या और शिक्षक को अपने विषय का ध्यान ठीक है क्या? शिक्षकों के स्तर का एक प्रश्न है। और कोर्स कंटेंट में भी ये प्रश्न है। कई बार ऐसा होता है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों से लोग डिग्री लेकर तो निकलते हैं। लेकिन एम्प्लायबल नहीं रहते हैं। डिग्रियां बहुत मिल रहीं, उच्च शिक्षा के संस्थान चल रहे हैं। लेकिन रिसर्च कम हो रहा है हमारे यहां। विषय को पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स, शिक्षक कम हो रहे हैं। तो इस दृष्टि से एक सर्वांगिण विचार करके सभी स्तरों की शिक्षा का एक अच्छा मॉडल हमको खड़ा करना पड़ेगा। इसलिए शिक्षा नीति का आमूलचूल विचार हो और आवश्यक परिवर्तन इसमें किया जाए, ये संघ बहुत सालों से कह रहा है। और इसके लिए जो कमीशन नियुक्त किए गए हैं, उन सब कमीशनों के रिपोर्ट भी ऐसी है। अब आशा करते हैं कि नई शिक्षा नीति पर इस सारी बातों का अंर्तभाव होगा। लेकिन एक और बात है अपने देश की। अधिक शिक्षा, निजी हाथों में है, सरकार के पास नहीं है। और उस निजि क्षेत्र में बहुत अच्छे-अच्छे प्रयोग भी चल रहे हैं। यहां दिल्ली में ही एक साल पहले एक सम्मेलन हुआ था। ऐसे प्रयोग करने वालों का। साढ़े तीन सौ के ऊपर भारत के विभिन्न स्थानों से, अलग-अलग प्रांतों से लोग आए थे और दे हैव डन मिरेकल्स। नीति जब आयेगी, आयेगी लागू होगी तब होगी उसकी राह देखने की आवश्यकता नहीं। शिक्षा संस्थानों में काम करने वाले लोग अपनी अधिकार मर्यादा में प्रयोग करके शिक्षा का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं। ऐसा हुआ तो फिर सरकारी नीति भी उसका अनुकरण करेगी। ऐसी स्थितियां आ जाएंगी। इसलिए हमको सारा कुछ सरकार के सर पर न डालते हुए हमको भी अपने-अपने क्षेत्र में इसका प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 5- भाषा को लेकर भी कुछ जिज्ञासाएं प्राप्त हुई हैं।

नीति नियामक संस्थाओं में अंग्रेजी का प्रभुत्व दिखाई देता है। संघ का भारतीय भाषाओं और हिन्दी के प्रति क्या विचार है?

संस्कृत के विद्यालय भी घट रहे हैं। और इसे महत्व भी नहीं दिया जाता। संघ इस स्थिति को कैसे देखता है? ,

हिन्दी पूरे देश की भाषा कब बनेगी। क्या संस्कृत को हिन्दी से अधिक वरीयता नहीं दी जानी चाहिए।
उत्तर - अब ये जो अंग्रेजी के प्रभुत्व की बात है वो नीति में यानी संस्था में कहा वो तो हमारे मन में है। आज ये सामान्य अनुभव है कि भारत का उच्चभ्रू वर्ग भारतीय भाषाओं में जो बोल सकता है, हिन्दी भी जानते हैं दोनों, लेकिन मिलते हैं तो अंग्रेजी में बात करते हैं। तो हम अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देना शुरू करें। भाषा भाव की वाहक होती है, संस्कृति की वाहक होती है। और इसलिए भाषाओं का रहना ये अनिवार्य बात है मनुष्य जाति के विकास के लिए। अपनी भाषा का पूरा ज्ञान हो, किसी भाषा से शत्रुता करने की जरूरत नहीं। अंग्रेजी हटाओ नहीं, अंग्रेजी रखों, यथास्थान रखो। अंग्रेजी का एक हौआ जो हमारे मन पर है उसको निकालना चाहिए। इंटरनेशनल लैंग्वेज हमेंशा कहते हैं लेकिन वास्तव में ऐसा है कि लोगों में अगर हम बात करते हैं तो यूरोप के देशों में दो भारतीय मिलने के बाद अंग्रेजी में बात करेंगे तो सबको समझ में नहीं आएगी, उनको भारतीय भाषाओं का प्रयोग करना पड़ता है क्योंकि जहां-जहां अंग्रेजों का प्रभुत्व रहा ऐसे देशों में अंग्रेजी का एक स्थान है। अमेरिका भी अंग्रेजी बोलती है लेकिन वो कहती है ब्रिटिश अंग्रेजी से हमारी अंग्रेजी अलग है। स्पैलिंग तक सब अलग-अलग हैं। फ्रांस में जाएंगे फ्रेंच चलेगी। इसराइल में आपको पढ़ने जाना है तो हिब्रू पढ़कर जाना पड़ेगा। राशिया में जाना है तो रशियन सीख कर जाना पड़ेगा। चीन, जापान सब अपनी-अपनी भाषा का प्रयोग सब अपनी-अपनी बातों में करते हैं। उन्होंने प्रयासपूर्वक इसको किया है। हमको ये प्रयास करने पड़ेंगे। जितना हम स्वभाषा में काम चलाएंगे और सबसे समृद्ध भाषाएं हमारे पास हैं। हम ये कर सकते हैं, हम करने को हो जाएं तो ये हो जाएगा। अंग्रेजी से हमारी कोई शत्रुता नहीं है। उत्तम अंग्रेजी बोलने वाले चाहिए। और दुनियां में भी अपने अंग्रेजी व्यक्तित्व की छाप बना सकते हैं ऐसे अंग्रेजी बोलने वाले लोग हमारे देश के भी होने चाहिए। भाषा के नाते किसी भाषा से शत्रुता हम नहीं करते, लेकिन देश की उन्नति के नाते हमारी मातृभाषा में शिक्षा हो इसकी आवश्यकता है। फिर आता है कि हमारी तो अनेक भाषाएं है। एक भाषा हमारी क्यों नहीं है? तो किसी एक भारतीय भाषा को हम सीखे। इसका मानस हमको बनाना पड़ेगा। हिन्दी की बात स्वाभाविक रूप से चली है, पुराने समय से चली है। अधिक लोग हिन्दी बोलते हैं इसलिए चली है। लेकिन ये मन बनाना पड़ेगा। कानून बनाने से नहीं होगा, थोपने से नहीं होगा। आखिर एक भाषा की बात हम क्यों कर रहे हैं इसलिए हमको देश को जोड़ना है। एक भाषा बनाने से अगर देश में यूरोप खड़ा होता है आपस में कटुता बढ़ती है तो हमको तो यह सोचना चाहिए कि मन हम कैसा बनाएं। मेरा अनुभव ऐसा कहता है, हिन्दी ठीक है कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन हिन्दी में काम करना पड़ता देश में अधिकांश भाग में इसलिए अन्य प्रांतों के लिए बहुत से लोग हिन्दी सीख रहे हैं, हिन्दी सीखते हैं। हिन्दी प्रांतों के लोगों का हिन्दी में चल जाता है, इसलिए दूसरी भाषा नहीं सीखते। क्यों न हिन्दी बोलने वाले लोगों ने भी दूसरे किसी प्रांत की एक भाषा को सीखना चाहिए। तो ये मन मिलाप जल्दी होगा, हमारी एक राष्ट्र भाषा और उसमें सारा कारोबार, ये काम जल्द ही हो जायेगी। ये करने की आवश्यकता है।

संस्कृत के विद्यालय घट रहे हैं और महत्व नहीं दिया जा रहा है, कौन नहीं देता? हम महत्व नहीं देते इसलिए सरकार भी नहीं देती। अगर हमारा आग्रह रहे कि अपनी परम्परा का सारा साहित्य लगभग संस्कृत में है। तो हम संस्कृत सीखें, हमारे बच्चे सीखें। कम से कम बोलचाल कर सकें इतना सीखें। इस दिशा में लगे हैं संघ के स्वयंसेवक। संस्कृत के प्रचार-प्रसार के दो-तीन काम चलते हैं। अच्छे पले-बढ़ रहे हैं। लेकिन ये अगर हमारा मानस बने तो अपनी विरासत का अध्ययन भी ठीक से हो सकेगा और अपनी भी कोई भाषा है और वो इतनी श्रेष्ठ भाषा है कि संगणक के सर्वाधिक उपयोग वही भाषा, ये सारी बातें पता चलेंगी। ये गौरव बनता है, तो समाज में उसका चलन बढ़ता है। चलन बढ़ता है तो विद्यालय भी फिर से खुल जाते हैं। पढ़ाने वाले भी मिल जाते हैं नीतियों को भी समाज का मानस प्रभावित करता है। ये काम करने की बहुत जरूरत है तो हम करते नहीं हैं और कोई करे ऐसा टिकाने का विचार करते हैं, फिर कभी होने वाला नहीं है। तो और फिर वरीयता का प्रश्न है, ये वरीयता प्रश्न गलत है। भारत की सारी भाषाएं मेरी भाषा है। और जहां मैं रहता हूं वहां की भाषा बोलता हूं। ये होना चाहिए। अपनी मातृभाषा पूरी आनी चाहिए। जहां में रहता हूं वहां की भाषा आत्मसात करनी चाहिए और पूरे भारत की एक भाषा तो हम बनाएंगे। वो श्रेष्ठ है इसलिए नहीं, वो सर्वाधिक उपयुक्त है आज के समय में इसलिए बनाएंगे। उसको भी सीखना चाहिए और फिर आपकी रुचि है। आवश्यकता है। तो कोई भी विदेश की भाषा सीखिए उसमें विदेशी लोगों से ज्यादा प्रवीण बनिये। उसमें भारत का गौरव है।

प्रश्न 6- महिला और संघ का दृष्टिकोण।

लड़कियों व महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संघ की क्या दृष्टि है। संघ ने इस दिशा में क्या-कुछ किया है? आखिर अपराधियों में कानून का डर क्यों नहीं है?

उत्तर - लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा। ये सुनिश्चित करने के लिए दो-तीन बातें करनी पड़ेंगी। पुराने जमाने में जब घर के अंदर महिलाओं का बंद रहना निश्चित रहता था तब उसकी जिम्मेदारी परिवार पर रहती थी। लेकिन अब महिलाएं भी पुरूषों की बराबरी से बाहर आकर कर्तृत्व दिखा रही हैं और दिखाना चाहिए उन्होंने। तो उनको अपनी सुरक्षा के लिए भी सजग और सक्षम बनाना पड़ेगा। इसलिए किशोर आयु के लड़के और लड़कीयां दोनों का प्रशिक्षण करना पड़ेगा। किशोरी विकास, किशोर विकास। ये काम संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं क्योंकि महिला असुरक्षित कब हो जाती है, जब पुरूष उसकी ओर देखने की अपनी दृष्टि को बदलता है। इस पर बड़ी चर्चाएं चली हैं तो एक मीडिया की पत्रकार महिला बोल रही थी। मैं सुन रहा था। जब सजा हो गई थी, बलात्कारियों को कड़ी सजा हो गई थी सुप्रीम कोर्ट से। उसकी चर्चा चल रही थी। मैं बैठा था तो वो महिला कह रही थी कि केवल अपराधियों को सजा होने से काम नहीं चलता। मूल समस्या यह है महिलाओं को देखने की पुरुष की दृष्टि बदलनी पड़ेगी। और ये दृष्टि हमारी परम्परा में है। मातृवत परदारेषु। अपनी ब्याहता पत्नी छोड़कर बाकी सबको माता के रूप में देखना। ये अपना आदर्श है। उन संस्कारों को पुरुषों में भी जगाना पड़ेगा। इसलिए किशोर और किशोरी विकास का क्रम चले और महिलाओं आत्मसंरक्षण की कला सिखाने वाले क्रम भी बढ़ें। इसमें भी स्वयंसेवकों ने काम प्रारंभ किया है। तो बड़ी मात्रा में और स्कूल, कॉलेज की छात्राओं को इसका प्रशिक्षण देना और फिर प्रशिक्षण की स्पर्धाएं भी आयोजित करना पिछले वर्ष से ये उपक्रम शुरू हुआ है। देश के सब राज्यों में ये शुरू होगा आगे चलकर। संघ के स्वयंसेवक इसको करते हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल शाखा चलाता है, कुछ नहीं करता। लेकिन संघ के स्वयंसेवक ये करते हैं तो विद्यार्थी परिषद के द्वारा यह उपक्रम शुरू किया गया है। और उसके बड़े-बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं और यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। देशव्यापी ये कार्यक्रम वो चलाएंगे। अब कानून का डर अपराधियों में कम रहता है क्योंकि कानून एक हद तक चल सकता है। समाज के धाक संस्कारों का चलन इसका परिणाम ज्यादा होता है। कानून की यशस्विता समाज के मानस पर निर्भर करती है। लाल बत्ती है, लेकिन लाल बत्ती न तोड़ने वाला सामर्थ्य आ जाए तो लाल बत्ती का चलता है। इसलिए कानून तो कड़े से कड़े बनने चाहिए और उनका अमल ठीक से हो कर अपराधी को उचित सजा मिलनी चहिए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन उसके साथ-साथ समाज भी इसकी नजर रखे। आंखों की शर्म हो लोगों में। समाज का वातावरण ऐसा हो जो अपराधों को बढ़ावा नहीं देता। ये हमारी जिम्मेदारी है। उस दृष्टि से ये संस्कार जागरण का पक्ष भी इन मामलों में उतना ही महत्व का है। हम देखते हैं कि कहीं-कहीं पांच, साढ़े पांच बजे के बाद महिलाएं बाहर जाती नहीं और कहीं-कहीं अपने देश में ऐसे इलाके हैं, ऐसे राज्य हैं जहां पर रात को भी सब अलंकार पहनकर महिला कहीं जाती है अकेली भी जाती है तो भी उसके मन में कोई भय नहीं है। ये परिणाम कानून का नहीं है, ये परिणाम वहां के वातावरण का है। उस वातावरण को हमको बनाना पड़ेगा, प्रयासपूर्वक। हम सबको उसके लिए काम करना पड़ेगा, वो करना चाहिए।

प्रश्न 7 - यदि हिन्दुत्व की व्याख्या इतनी ही श्रेष्ठ और सुंदर है जैसे कि बताई गई तो आज विश्व और भारत के भीतर भी हिन्दुत्व को लेकर आक्रोश और हिंसा क्यों दिखाई देती है? संघ इसके लिए क्या करेगा?

उत्तर- विश्व में हिन्दुत्व को लेकर आक्रोश और हिंसा नहीं है। उल्टा है। विश्व में हिन्दुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। भारत में है, आक्रोश और भारत में जो आक्रोश है वो हिन्दुत्व विचार के कारण नहीं है, विचार को छोड़कर गत 1500, 2000 हजार वर्षों में हमने जो आचरण से एक विकृत उदाहरण प्रस्तुत किया, उसको लेकर। हमारे मूल्यबोध के अनुसार जो आचरण करना चाहिए वो न करते हुए हम पोथीनिष्ठ बन गए, रूढ़ीनिष्ठ बन गए, हमने बहुत सारा अधर्म, धर्म के नाम पर किया। तो आज की देशकाल परिस्थिति के अनुसार धर्म का आचार, धर्म का रूप बदलकर हमको उस आचरण को करना पड़ेगा तो सारा आक्रोश विलुप्त हो जाएगा। क्योंकि विचार के नाते हिन्दुत्व का विचार श्रेष्ठ, उदात्त, शुद्ध है। हमको विचार के अनुसार चलने का अभ्यास करना पड़ेगा। और संघ यही करता है। डॉ. हेडगेवार के प्रारंभ दिनों के बौद्धिक वर्ग बहुत कम उपलब्ध है, लेकिन जो एक उपलब्ध है उसमें एक तत्व और व्यवहार। उसमें डॉ. हेडगेवार ने कहा कि श्रेष्ठ तत्व केवल बोलने से क्या होता है, वैसा ही व्यवहार करके बताओ। जो तत्व व्यवहार में आप उतार नहीं सकते, वो तत्व किस काम का। और तत्व आपका श्रेष्ठ है लेकिन व्यवहार गलत है तो भी वो तत्व किस काम का। और इसलिए हिन्दुत्व के मूल्यबोध के आधार पर पहले हिन्दू अच्छा, पक्का, सच्चा हिन्दू बनें। इसके लिए संघ चलता है। हम इन्हीं संस्कारों को प्रत्येक व्यक्ति में भरने का प्रयास लगातार 92 साल से कर रहे हैं।

प्रश्न 8 - गौरक्षा से जुड़े प्रश्न

गाय के प्रश्न पर मॉब लींचिंग क्या उचित है? गौरक्षा कैसे होगी? गौरक्षा कानून लागू नहीं होते हैं। गौ तस्करों के हौंसले बहुत बढ़े हुए हैं। गौरक्षा करने वालों पर हमले होते हैं। इन सबका क्या समाधान है।

उत्तर- गाय का क्यों, किसी भी प्रश्न पर कानून में हाथ में लेना, हिंसा करना, तोड़-फोड़ करना ये अत्यंत अनुचित अपराध है। और उस पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। अपराधियों को सजा होनी चाहिए। परंतु गाय ये परम्परागत श्रद्धा का विषय तो है ही। मानव बिन्दु माना जाता है। गाय, मैं जानवारों का डॉक्टर हूं, मैं जानता हूं शास्त्र को। उसके हवाले से कह रहा हूं। अपने देश के छोटे किसान जो बहु संख्या में हैं। उनके अर्थायाम का आधार गाय बन सकता है, दूसरा कुछ नहीं बन सकता। अनेक ढंग से वो गाय उपकारी है। अब सारी बातें बाहर आ रही हैं। ई टू मिल्क की बात होती है। पहले नहीं थी, अब मालूम हो गया है विज्ञान। तो गौरक्षा तो होनी चाहिए। संविधान का भी मार्गदर्शक तत्व है। तो उसका पालन करना चाहिए। लेकिन गौरक्षा केवल कानून से नहीं होती। गौरक्षा करने वाली देश के नागरिक गाय को पहले रखें। गाय को रखेंगे नहीं और खुला छोड़ देंगे तो उपद्रव होगा। वो गौरक्षा के बारे में आस्था पर प्रश्न उठता है। इसलिए गौसंवर्धन इसका विचार होना चाहिए। गाय के जितने सारे उपयोग हैं, सामान्य राजमर्रा के जीवन में वो कैसे आज लागू किए जाएं, कैसे तकनीकी का उपयोग करके उसको घर तक पहुंचाया जाए, इस पर बहुत लोग काम कर रहे हैं। वो गौरक्षा की बात करते हैं, वो लींचिंग करने वालों में नहीं हैं। वो समाज की भलाई के लिए काम कर रहे हैं, सात्विक प्रवृत्ति के लोग हैं। पूरा का पूरा जैन समाज इस पर तुला है और भी अनेक लोग हैं। अच्छी गौशालाएं चलाने वाले, भक्ति से चलाने वाले, मुसलमान भी अपने देश में बहुत जगह हैं। इन सब लोगों को लींचिग के साथ कभी जोड़ना नहीं चाहिए। इनके कार्य को प्रोत्साहन मिलना चाहिए क्योंकि वो अपने देश के सामान्य व्यक्ति के हित का काम है, अपने देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा आधार साबित हो सकता है। और इसलिए गौ तस्कर हमला करते हैं तो उसको भी अब लींचिंग पर आवाज करते हैं। और गौ तस्कर हमला करते हैं, हिंसा करते हैं उस पर आवाज नहीं होती है। ये दोगली प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए। इन सबका समाधान यही है। गाय के बारे में लोगों में जागृति लाना। उसके क्या-क्या उपयोग हैं, हो रही है, बन रही है। और सारी बातें आजकल कागजों में मौजूद है, वैज्ञानिकों में शोध हुआ उसके डॉक्युमेंट्स उपलब्ध हैं और गौरक्षा का काम करने वाले लोग, सात्विक प्रवृत्ति से इस एक काम को बढ़ा रहे हैं, वो बढ़ेगा। जो उपद्रवी तत्व हैं, उनके साथ जोड़कर उनको देखना नहीं इतना कर लें हम और समाज को जागृत करें तो गौरक्षा का काम होगा, देश का लाभ होगा और गाय के सानिध्य का ये प्रत्यक्ष अनुभव है, हाथों से गौ सेवा करने वाले की आपराधिक प्रवृत्ति कम हो जाती है, जेल की गौशालाओं में ये प्रयोग हो चुके हैं। देश का ये अपराध वगैरह भी कम हो जाएगा। ऐसा मुझे लगता है।

प्रश्न 9- कन्वर्जन को लेकर प्रश्न।

क्या कन्वर्जन छल, बल, धन से हो रहा है? क्या इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनना चाहिए। अगर सभी मत पंथ समान है तो संघ कन्वर्जन का विरोध क्यों करता है।

उत्तर- एक गुलाबराव महाराज हो गए। उनको भी यही आखिरी वाला प्रश्न पूछा गया था। उन्होंने जो उत्तर दिया वो ही मैं आपको देता हूं। अगर सभी मतपंथ समान है तो कन्वर्जन की आवश्यकता क्यों है? क्यों आप इधर से उधर ले जाने का प्रयास कर रहे हो। सभी मतपंथ समान है न, तो जिसमें है वो उसमें पूर्णतः प्राप्त करेगा। तपस्या करेगा तो। आप उसको फिर भी इधर ला रहे हो तो आपका उद्देश्य उसका अध्यात्म सिखाना नहीं है। भगवान मार्केट में बेचा नहीं जाता, भगवान जबरदस्ती स्वीकार नहीं किया जाता। लेकिन छल, बल और दल से होता है। तो वो होना ही नहीं चाहिए क्योंकि उसका उद्देश्य मनुष्य की आध्यात्मि उन्नति नहीं है, दूसरे कुछ उद्देश्य छिपे हैं, आप विद्वान लोग हैं मैं उसका वर्णन क्यों करूं। आप देश-विदेश के इतिहास पढ़ लीजिए उसमें कन्वर्जन करने वालों के क्या रोल रहे हैं। इसका डाटा निकालिए, सत्य डाटा। संघ वालों ने न लिखा हुआ डाटा। संघ के विरोधी विचार रखने वालों ने भी इसके बारे में लिख है। वो देख लीजिए तो आपको पता चलेगा कि इसका विरोध क्यों करना चाहिए। संघ वाले क्यों करे, पूरे समाज में ऐसे कन्वर्जन का विरोध करना चाहिए। ये मेरा मामला है मैं किसकी पूजा करूं। मेरे मन में आता है। एक नारायण वामन तिलक थे, ब्राम्हण थे। अच्छा परिवार था, उनके मन में आ गया कि ये यीशू का रास्ता ठीक है। और उन्होंने अपने आपको इसाई बना, वो पास्टर बने। उनकी पत्नी ने अपना धर्म नहीं छोड़ा। वो बने रहे। और संघ वालों सहित सब लोग महाराष्ट्र में उनको बड़े आदर की दृष्टि से देखते हैं। उन्होंने कन्वर्सन किया इसकी बात कोई नहीं करता। उन्होंने देशभक्ति की उत्तम-उत्तम कविताएं हमको दीं। और सात्विक जीवन का अर्थ अपने जीवन में, समाज में रखा। क्योंकि वो छल-बल से कन्वर्ट नहीं हुए थे, उनके मन में परिवर्तन आया। इसको तो मान्यता है हिन्दुओं में। लेकिन ऐसा नहीं होता है। चर्च में आने के लिए इतने रुपये देंगे, ऐसा नहीं होता है, उसका विरोध करना ही चाहिए। अध्यात्म, ये बेचने की चीज नहीं है।

प्रश्न 10- जनसंख्या संबंधी प्रश्न

देश के कई हिस्सों में बदलता जनसांख्यकीय स्वरूप और हिन्दू जनसंख्या के घटते वृद्धि दर को संघ कैसे देखता है? क्या जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। 50 साल बाद भारत में हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी? जनसंख्या से क्या विकास प्रभावित हो रहा है? संघ इसे कैसे देखता है?

उत्तर- संघ का इसके बारे में प्रस्ताव है उसी का वर्णन मैं करता हूं। जनसंख्या का विचार जैसे एक बोझ के रूप में होता है। मुंह बढ़ेंगे तो खाने को तो देना ही पड़ेगा। रहने को जगह देनी पड़ेगी, पर्यावरण का उपयोग ज्यादा होगा तो है लेकिन जनसंख्या काम करने वाले हाथ भी देती है। अभी भारत तरुणों का देश है। 56 प्रतिशत तरुण है और हमको बड़ा गर्व है दुनिया में सर्वाधिक तरुण भारत में है। 30 साल बाद यही तरुण जब बूढ़े हो जायेंगे तब इनसे ज्यादा तरुणों की संख्या नहीं होगी नहीं तो भारत बूढ़ों का देश हो जायेगा जैसे आज चीन है। इसलिये जनसंख्या का विचार दोनों दृष्टि से करना चाहिए। तात्कालिक नहीं एक पचास साल का प्रोजेक्शन मन में लाकर यह सोचना चाहिए कि कितने लोगों को खिलाने की हमारी क्षमता होगी, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य यह जो गृहस्थ की आवश्यकताएं छह रहती हैं वह देने की क्षमता हमारी क्या होगी। उस समय भार हमारा पर्यावरण कितना सहन कर सकेगा। कैसे उसकी क्षमता हम बढ़ा सकते हैं। उस समय ये सारा काम करने वाले हाथ हमको कितने चाहिए और जनसंख्या चर्चा तो हम सब करते हैं जन्म देने का काम माताओं को करना पड़ता है। तो वो हमारी कितनी सक्षम है, कितनी प्रबुद्ध है, भरण पोषण की व्यवस्था उसके हाथ में कितनी है ये सारा विचार करते हुए और एक महत्व की बात दूसरे प्रश्न में जो पहले प्रश्न में ही आयी है डेमोग्रैफिक बैलेंस, अब हम इसको माने या न माने यह महत्व की चीज तो सब जगह मानी जाती है। इसकी बात न करने वाले भी लोग हैं लेकिन वह इसका महत्व भी समझते हैं। तो डेमोग्रैफिक बैलेंस भी रहना चाहिए। इसको ध्यान में रखकर एक जनसंख्या के बारे में नीति हो, अभी नीति है फिर यह देखा जाए कि यह सारा उसमें विचारित है कि नहीं, सुविचारित है कि नहीं ये पचास साल की स्थिति की कल्पना हुई क्यों, और उस नीति में जो तय होता है वह सब पर समान रूप से लागू किया जाए किसी को उसमें से छुट्टी न हो। जहां समस्या है वहां पहले उपाय हों यानी जहां बच्चों को पालन करने की क्षमता नहीं है लेकिन बहुत बच्चे हो रहे हैं, परवरिश ठीक नहीं होगी तो अच्छे नागरिक नहीं बनेंगे जहाँ नहीं है वहां लागू तो करना है सब पर लेकिन थोड़ा बाद में भी किया तो चलेगा। लेकिन ये कानून बनाकर लागू करने से स्वीकार करेंगे लोग ऐसा नहीं है। मैं स्वयं एक साल सरकारी नौकरी में था और फैमिली प्लानिंग कैम्पेन का वह पीक था। हम सब किसी भी डिपार्टमेंट के हों हमें काम करना पड़ता था। गांव गांव में जाकर मैंने इसका प्रचार किया है और देहातियों के प्रश्न सब मैंने सुने हैं। मन बनाना पड़ेगा। सबका मन बनाना पड़ेगा। धैर्य से सोचना, ठीक से सोचना, जो तय किया है उसके बारे में मन बनाना और इसको समान रूप से सब पर लागू करना ये उसके उपकार ही होंगे फायदे होंगे। और इसमें एक बात और ध्यान में रखना चाहिए कि जन्मदर एक बात है, अब हिन्दुओं का जन्मदर घट रहा है या बढ़ रहा है जो भी आप कहेंगे इसके लिए नीति जिम्मेवार केवल नहीं रहती। वह सोच भी रहती है। उचित सोच क्या हो, परिवार में संतान यदि कितनी है यह केवल देश का ही प्रश्न नहीं है। यह एक-एक परिवार का भी प्रश्न है। तो उसका संतुलित विचार कैसे करना है इसका भी प्रशिक्षण समाज को मिलना चाहिए। लेकिन दूसरी दो बाते हैं। डेमोक्रेटिक इमबेलेन्स मतांतरण के कारण भी होता है। घुसपैठ के कारण भी होता है। मतांतरण के बारे में मैं बोल चुका हूँ। घुसपैठ सीधा सीधा अपने देश की संप्रभुता को आह्वान देने वाला विषय है उसका कड़ाई से बंदोबस्त होना चाहिए।

आरक्षण का मुद्दा

प्रश्न 11- आरक्षण पर संघ का क्या मत है और आरक्षण कब तक जारी रहेगा। क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण को संघ मान्यता देता है। आरक्षण के कार्य में जो समाज में अनेक संघर्ष हो रहे हैं उनका हल क्या है क्या क्रीमीलेयर को आरक्षण मिलना चाहिए क्या अल्पसंख्यकों को आरक्षण मिलना चाहिए।

उत्तर- सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में सबके लिए अवसरों की बराबरी प्राप्त हो इसलिये सामाजिक आरक्षण का प्रावधान आरक्षण में किया है। संविधान सम्मत सभी आरक्षणों को संघ का पूरा समर्थन है। बीच बीच में वक्तव्य होते हैं उन में से अर्थ निकाले जाते हैं। यह बात ध्यान में रखिये सामाजिक विषमता दूर के लिए संविधान में जितना आरक्षण दिया गया है उसको संघ का पूरा समर्थन है और रहेगा। आरक्षण कब तक चलेगा इस निर्णय जिनके लिए आरक्षण दिया गया है वही करेंगे। उनको जब लगेगा कि अब आवश्यकता नहीं है इसकी तब वो देखेंगे। लेकिन तब तक इसको जारी रहना चाहिए ऐसा संघ का बहुत सुविचारित और जब से ये प्रश्न आया है तब से मत है। उसमें बदल नहीं हुआ है। अब क्रीमीलेयर को क्या करना। और लोग मानते हैं। सामाजिक आधार पर आरक्षण संविधान में है। सम्प्रदायों के आधार पर नहीं है। क्योंकि सभी समाज कभी न कभी अग्रणी वर्गों में रहे हैं अपने यहां। तो उनके आरक्षण का क्या करना। अब और भी जातियां आरक्षण मांग रही है उनका क्या करना। इसका विचार करने के लिए संविधान ने पीठ बनाए हैं। फोरम बनाये हैं वह उनका विचार करे और उचित निर्णय दे। आरक्षण समस्या नहीं है। आरक्षण की राजनीति ये समस्या है। भई अपने समाज का एक अंग पीछे है ऐतिहासिक सामाजिक कारणों से। शरीर पूरा स्वस्थ तब कहा जाता है उसके सब अंग जब आगे जाना है तो आगे जाते हैं। मैं आगे जाने को होता हूं हाथ हिलने लगते हैं लेकिन पैर पीछे रह जाते हैं तो मुझे पैरालिटिक कहा जाता है। इसलिये उसको बराबरी में लाने की आवश्यकता है। तो समाज मे ये बराबरी कब आएगी। तो जो उपर है वो नीचे झुकेंगे और जो नीचे हैं वो उपर उठेंगे, हाथ से हाथ मिलाकर गड्डे में जो गिरे हैं उनको ऊपर लाया जाएगा। समाज को आरक्षण् का विचार इस मानसिकता से करना चाहिए। आज हमको मिल रहा है या नहीं मिल रहा है यह नहीं सोचना चाहिए। सबको मिलना चाहिए। सामाजिक कारणों से हजारों वर्षों से लगभग स्थिति है कि हमारे समाज का एक अंग पूर्णतः निर्बल हमने बना दिया है उसको ठीक करना आवश्यक है। हजारों वर्षों की बीमारी को ठीक करने में अगर हमको 100-150 साल नीचे झुककर रहना पड़ता है तो ये कोई महंगा सौदा बिल्कुल नहीं है। यह तो कर्तव्य है हमारा। ऐसा सोचकर इसका विचार करना चाहिए तो इन सारे प्रश्नों के हल मिलेंगे और इस प्रश्न को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिये। ये समाज की स्वस्थता का प्रश्न है। इसमें सबको एकमत से चलना चाहिए। ऐसा संघ को लगता है।
एससीएसटी एक्ट

प्रश्न 12- अत्याचार निरोध कानून पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से जो इन वर्गों की प्रतिक्रिया और आक्रोश निर्मित हुआ है क्या वह उचित था। क्या सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संसद को बदलना चाहिए था। सवर्ण और अनुसूचित जाति में जो खाई तैयार हो गई है क्या वह ठीक है और यह कैसे दूर होगी।

उत्तर- स्वाभाविक अपने सामाजिक पिछड़ेपन के कारण और अपनी जातिगत अहंकार के कारण एक अत्याचार की परिस्थिति तो है। उस परिस्थिति से निपटने के लिए अत्याचार निरोधक कानून बना। वो ठीक से लागू होना चाहिए। उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। ये दोनों बाते हैं। ये ठीक से लागू नहीं होता, दुरुपयोग भी होता है। ये भी है। और इसलिये संघ मानता है कि उस कानून को ठीक से लागू करना चाहिए और उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन ये होगा कैसे। ये केवल कानून से नहीं होगा। समाज की सद्भाव समाज की समरसता की भावना इसमें काम करती है। क्यों आज के युग में शिक्षा का इतना प्रसार होने के बाद भी आपको देखने के बाद मेरे मन में प्रश्न आता है कि आप कौन हैं। यानी नाम वाम मालूम है लेकिन आप कहां से आते हैं यह क्यों आता है मेरे मन में। और अत्याचार अत्याचार है। वो इस पर हुआ इसलिए जायज है उस पर हुआ तो नाजायज है ऐसा नहीं है। तो ये सद्भावना जागृत करने की बहुत आवश्यकता है। बाकी सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? और सरकार ने क्या किया इसके बारे में मैं नहीं बोलूंगा। संघ की इच्छा यह है कि कानून का संरक्षण रहे। उसका दुरुपयोग न हो और इस समस्या को समाज में आपसी सद्भाव बढ़ाकर ठीक करना चाहिए। कानून कुछ करे न करे। कोई अस्पृश्यता कानून से नहीं आई समाज के। वह समाज के रूढ़ि के कारण आई है। शास्त्रों से भी नहीं आई है। यह हमारी दुर्भावना के कारण आई है। तो हमारी सद्भावना ही उसका प्रतिकार करने का काम कर सकेगी। उस सद्भावना को बढ़ाने का काम स्वयंसेवक ही चलायें हैं। समरसता मंच के रूप में स्वयंसेवक जो काम करते हैं सद्भावना बैठकें चलाकर इन सारी बातों को ठीक करने का उनका प्रयास रहता है।

समलैंगिकता

प्रश्न 13- हाल में आये फैसले के बाद धारा 377 और समलैंगिकता का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। संघ का इस पर क्या मत है। इसके साथ ही किन्नरों की भी सामाजिक स्थिति यह एक प्रश्न है। इस पर आपका क्या विचार है।

उत्तर- समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा मानते हैं तो जाति अपने सम्प्रदाय के साथ समाज का एक अंग है। तो ये जो विशिष्टता है उसके साथ ऐसी कुछ बातें भी समाज में कुछ लोगों में है, लेकिन वो है तो समाज के अंग। उनकी व्यवस्था करने का काम ये फिर से मैं कहता हूं समाज में करना चाहिए और अपनी परम्परा में अपने समाज में ये काम हुआ है। अब समय बदला है तो अलग प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ेगी। करनी चाहिए। उसको बड़ा चर्चा जैसे वही समस्या है प्रमुख देश की इतना बनाकर हो हल्ला से काम नहीं होगा। ये सहृदयता से देखने की बाते हैं। जितना उपाय हो सकता है वैसा करना नहीं तो जैसा है वैसा करना उनकी कोई न कोई व्यवस्था बने ताकि सारा समाज स्वस्थ मन से चल सके और किसी कारण ऐसी अस्वस्थता किसी के मन में है या अलगपन है तो उसके समाज से अलग-थलग पड़ जाने का और अपने जीवन में आगे न बढ़ पाने का कारण न बने। ये इस सारे समाज को देखना पड़ेगा। समय बहुत बदला है। इसलिये इसकी सामाजिक टेकलिंग के बारे में विचार हमको करना पड़ेगा। बाकी कानून अपनी जगह शब्दों के क्या क्या अर्थ निकालकर करता है वह करता है। उसका इलाज नहीं। उसमें हम चर्चा करने जाएँगे तो बहुत सारी बातें निकलेंगी। समस्या वहीं की वहीं रहेगी। इसलिये सहृदयता से इन सब लोगों को देखते हुए और समाज स्वस्थ रहे इस तरह से उनकी व्यवस्था कैसे की जाए ताकि वो भी केवल अपने अलगपन के कारण आइसोलेट होकर किसी गर्त में न गिर जायें ये करने की आवश्यकता मुझे लगती है।

संघ के अल्पसंख्यक के प्रति

प्रश्न 14- अल्पसंख्यकों को जोड़ने के विषय में संघ क्या सोचता है? क्या संघ में मुस्लिम समाज को शत्रु के रूप में सम्बोधित किया गया है। क्या संघ इन विचारों से सहमत है। संघ को लेकर मुस्लिम समाज में जो भय है वह उसे कैसे दूर करेगा।

उत्तर - अल्पसंख्यक इस शब्द की परिभाषा अभी स्पष्ट नहीं है अपने यहां। जहां तक रिलीजन लैंग्वेज का सवाल है अपने देश में वह पहले से ही अनेक प्रकार हैं। लेकिन हमने कभी स्वतंत्रता के या अंग्रेजों के आने के पहले अल्पसंख्यक शब्द का उपयोग नहीं किया। हम सब एक समाज के थे। एक मान्यता लेकर चलते थे। हां ये बात जरूर है कि दूरियां बढ़ी हैं। तो मैं विचार करता हूं कि अल्पसंख्यकों को जोड़ना ऐसा नहीं है। अपने यहां समाज के बंधुओं को जो बिखर गये हैं उनको जोड़ने की बात ठीक है। भाषा भी परिणाम करती है। अल्पसंख्यक हैं आप अलग हैं हमको जुड़ना है तो जुड़ना है जुड़ने से कल्याण होगा। तो क्या कल्याण नहीं होगा तो एक दूसरे को छोड़ देंगे क्या? अरे भाई हम एक देश की संतान हैं । भाई भाई जैसा रहें। तो इसलिये अल्पसंख्यक के बारे में ही संघ के रिजर्वेशन्स है। संघ इसको नहीं मानता। सब अपने हैं। और जुड़ गये तो जोड़ना है। इस भावना से हम बोलते हैं। और मुस्लिम समाजमें इसके बारे में भय है तो कल मैंने बात की है। उस बात पर मत जाइये। आप आइये संघ को अंदर से देखिये। जहां जहां संघ की अच्छी शाखा है वहां पर यदि पास में मुसलमान बस्ती है तो मैं आपको दावे के साथ बताता हूं कि उनको यहां ज्यादा सुरक्षिता महसूस होती है। और इसलिये आप देखिये कि हमारा आह्वान राष्ट्रीयता का है। जो भारत के मुसलमानों की, ईसाइयों की सबकी परम्परा का है उसका है। उसके प्रति गौरव का है। मातृभूमि के प्रति गौरव का है वही हिन्दुत्व है। बिना कारण भय बनाकर रखना, एक बार आकर देखिये। बात करके देखिये। संघ के कार्यक्रमों में आकर देखिये, क्या क्या होता है। क्या क्या बात होती है। मेरा तो अनुभव है जो जो आते हैं उनके विचार बदल जाते हैं। आप आइये देखिये और हमारी कोई बात गलत है या आपके विरोध से प्रेरित है तो फिर हमको पूछिये। सही बात है। सही बात आपको पसंद नहीं आएगी तो भी हम बोलेंगे। परम्परा से राष्ट्रीयता से मातृभूमि से, पूर्वजों से हम सब लोग हिन्दू हैं। यह हमारा कहना है और यह हम कहते रहेंगे उस शब्द को हम क्यों नहीं छोड़ते कल मैंने बताया है। लेकिन इसका मतलब हम आपको अपना नहीं मानते ऐसा नहीं है। हम आपको अपना मानने के लिए ऐसा कह रहे हैं। किस आधार पर हम आपको अपना नहीं माने वह पंथ सम्प्रदाय नहीं है भाषा नहीं है जाति नहीं है कुछ नहीं है। मातृभूमि, संस्कृति, पूर्वज ये है। उन पर हम जोर देते हैं। उसको हम अपनी राष्ट्रीयता के घटक मानते हैं। इसलिये आकर देखिये। तो बातें जो बोली जाती हैं वह परिस्थिति विशेष प्रसंग विशेष के सम्बन्ध में बोली जाती हैं। वो शाश्वत नहीं रहती है। एक बात तो ये है कि गुरुजी के जो शाश्वत विचार हैं उनका एक संकलन प्रसिद्ध हुआ है। श्री गुरुजी विजन एंड मिशन। उसमें तात्कालिक संदर्भ से आने वाली सारी बातें हमने हटाकर उनके जो सदा काल के उपयुक्त विचार हैं वह रखे हैं। उसको आप पढ़िये। उसमें आपको मिलेंगे। दूसरी बात है कि संघ बंद संगठन है यह नहीं। डॉक्टर हेडगेवार ने कुछ बोल दिये अब उन्हीं वाक्यों को लेकर हम चलने वाले हैं। समय बदलता है संगठन की स्थिति बदलती है। हमारा सोचना भी बदलता है और बदलने की परमिशन हमको डॉ. हेडगेवार से मिलती रही है। नहीं तो डॉ. हेडगेवार पहले ही दिन बता देते कि हमको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चलाना है। शाखा शुरू करो। उन्होंने एक भी चीज नहीं बतायी। कार्य बताये। तरुण कार्यकर्ताओं ने प्रयोग किये जो उचित लगा रखा जो नहीं लगा वह नहीं रखा। और संघ ऐसे ही बढ़ते चले जा रहा है। तो आप संघ को एक बंद संगठन मानकर विचार करते हैं तो आपको मन में शंका उत्पन्न होती है। मैं कहता हूं कि आज आप संघ के कार्यकर्ता क्या क्या कर रहे हैं उसका प्रत्यक्ष अनुभव लीजिये। वो क्या सोचते हैं कैसे सोचते हैं उसका अनुभव लीजिये। आपकी सारी शंकायें दूर हो जायेंगी।

धारा 370 के सम्बन्ध में।

प्रश्न 15- धारा 370 तथा अनुच्छेद 35 ए के सम्बन्ध में संघ का क्या मत है। क्या जम्मू कश्मीर राज्य का तीन भागों में विभाजन होना चाहिए। घाटी के भटके हुए युवाओं को राष्ट्र भाव जगाने के लिए संघ ने क्या प्रयास किये हैं?

उत्तर- धारा 370 और 35 ए के सम्बन्ध में हमारे विचार सर्वपरिचित हैं। हम उनको नहीं मानते। नहीं रहना चाहिए। ऐसा हमारा मत है। कारण में जाउंगा तो लंबा मत है। एक वाक्य में बता देता हूं कि कई बार इसको भाषणों में हमने कहा है उसकी पुस्तिकायें भी उपलब्ध हैं। आप कभी सुरुचि प्रकाशन में जाकर उसको देख सकते हैं। वो नहीं रहना चाहिए हमारा मत है। राज्य के निर्माण, विभाजन आदि की जो बात है उसके पीछे विचार कौन सा रहता है। देश की अखण्डता, एकात्मता, सुरक्षा और प्रशासन की सुलभता। अब इसको देखकर जब लगेगा कि तीन राज्य होने चाहिए तो उस समय का शासन निर्णय करे। अगर लगता है कोई जरूरत नहीं तो रहे। लेकिन जम्मू, लद्दाख, कश्मीर घाटी अभी जो भारत के पास है कश्मीर का वो जो ग्राम कश्मीर है वह तो उधर ही है लेकिन कम से कम इन तीन में भेदभाव मुक्त सबके लिए विकासोन्मुख प्रशासन चल रहा है क्या इसका विचार करना चाहिए। वहां की जो परिस्थिति है उसमें इन राज्यों को भारत के साथ और भारत की कुल मिलाकर एकात्मता, अखण्डता, सुरक्षा के लिए क्या करना चाहिए इसका विचार करना चाहिए। वो विचार शासन प्रशासन करेगा। जैसा तय करेंगे तय करेंगे। मूल बात है प्रशासन को ऐसा होना चाहिए। सुरक्षा रहनी चहिए और सुरक्षा तब रहती है, सुरक्षा बल रहते हैं कानून रहते हैं। घटना रहती है, संविधान रहता है सब रहते हैं। लेकिन मुख्य समाज रहता है। वो समाज चाहता है। तो आपने बिल्कुल सही पूछा कि भटके युवाओं में कुछ करना चाहिये और हम कर रहे हैं। हमारे स्वयंसेवक फिर से मैं बताता हूं हम जब कहते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल शाखा चला रहा है वह कुछ नहीं कर रहा है और कुछ करना भी नहीं है हमको। ये जो हमारे में से निकले स्वयंसेवक समाज के लिए जो जो आवश्यक है वह करने के लिए दौड़ते रहते हैं। ऐसे युवकों ने वहां पर कार्य चलाये हैं। एकल विद्यालय चलाये हैं विद्यालय चलाये हैं। उसमें राष्ट्रीयता की बात होती है उसमें वंदेमातरम् होता है उसमें जनगणमन भी होता है। उसमे 26 जनवरी, 15 अगस्त भी होता है और वहां के अभिभावक और वहां के विद्यालयों में आने वाले छात्र दोनों का बहुत अच्छा सहयोग और समर्थन हमको मिलता है। धीरे धीरे ये बात बढ़ेगी क्योंकि ये प्रयास कभी हुआ नहीं इसके पहले तो अब शुरू किया है। तो उसके फल आने में समय लगेगा। लेकिन हमने इसमंे कुछ किया नहीं है ऐसा नहीं है। मैं विजयादशमी के भाषण में उसमें मैं कहता हंू कि बाकी बातें जैसे हैं उसका उपाय होना चाहिए। वैसे काश्मीर के सामान्य समाज का शेष भारत के साथ सात्मीकरण उनको मिलना मिलाना ये भी होना चाहिए। जब मैं कहता हूं तो उसके पहले काम शुरू हो चुका होता है वह मैं कहता हूं। जो शुरू नहीं हुआ उसको हम बोलते नहीं हैं। वो हो रहा है आगे बढ़ रहा है ये आप व्याप्त और पर्याप्त मजबूत होने के बाद उसको हम बोलते भी रहेंगे।

आंतरिक सुरक्षा की परिस्थिति

प्रश्न 16- संघ की नीति में प्रमुख आंतरिक सुरक्षा क्या है और उसका समाधान क्या है? आतंकवाद आज सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसका समाधान क्या है? देशद्रोह का कोई धर्म नहीं है। क्या कोई सख्त कानून नहीं होना चाहिए क्या आतंकवाद से जुड़े मुद्दों के लिए फास्ट ट्रैक नहीं होने चाहिए।

उत्तर- आंतरिक सुरक्षा में आंतरिक फसाद खड़ा करने वालों में समाज आकर्षित न हो। इसलिये समाज में विकास की धारा सर्वत्र पहुंचाना, शासन प्रशासन अपना है, जवाबदेह है, ऐसा लगना, और इस देश में अपन जीवन चल सकता है, उन्नत हो सकता है ये विश्वास उसके मन में रहना। ये काम शासन प्रशासन को भी करना होता है समाज को भी करना होता है। क्योंकि इसमें कमियों का लाभ लेकर सुरक्षा के लिए आव्हान उत्पन्न करने वाले लोग सर्वत्र हैं। यहां भी हैं। उनकी न चले इच्छा तो ये करना पड़ता है। और देश के संविधान कानून को लागू करने के वहां मामले में उसके विरोध में खुला चलने वालों का बन्दोबस्त कड़ाई से होना चाहिए। तो अपने समाज की स्थिति ये भी एक चुनौती आंतरिक सुरक्षा का विचार करते हैं तब सामने आती है। और शासन की कार्यवाही पर्याप्त सत्य हो, पर्याप्त सीधी हो, गोली से बात नहीं होगी बोली से हो सकती है और बोली इस तरफ जानी चाहिए कि भारत देश एक तरफ रहे। भारत देश अखंड रहे। इस रवैये से सबको चलना चाहिए। इसमें जो कभी कभी आगे पीछे होता है उसके परिणाम घातक होते हैं। और इसलिये सरकार की दृढ़ नीति समाज और सरकार का सब लोगों तक पहुंचना, सब तक विकास का पहुंचाना और अपनत्व का एक भरोसा सबमें उत्पन्न करना ये बात है और उसको लेकर जो कानून बने हैं और सख्त कानून आवश्यकता है ये सब मैं बात करता हूं लेकिन कानूनों के अमल में सुरक्षा को खतरा उत्पन्न करने वाले, कानून तोड़ने वाले, देशद्रोह की भाषा करने वालों की तरफ से अपने ही समाज से उनका समर्थन करने वाले खड़े न हों, यह भी आवश्यकता है। तो समाज का मन ऐसा बने कि ऐसी बात करने वाले आइसोलेट हो जायें। यह भी साथ साथ होना चाहिए। यह दोनों बात जब होती है तो फिर आन्तरिक सुरक्षा मजबूत रहती है।

समान नागरिक संहिता

प्रश्न 17- समान नागरिक संहिता के सम्बन्ध में संघ का क्या मत है।

उत्तर- संविधान का मार्गदर्शक तत्व तो है और इस दृष्टि से इसको कहा जाता है कि एक देश के लोग एक कानून के अंतर्गत रहें। एक कानून के अंदर रहने का मन बने समाज का। समान नागरिक संहिता की चर्चा निकालते हैं जब लोग तो उनका रूप रहता है हिंदु और मुसलमान। लेकिन केवल इतना नहीं है। सबकी परम्पराओं में कुछ न कुछ परिवर्तन आयेगा। हिन्दुओं की भी। फिर आज डायलॉग भी चलता है और मीताक्षरा भी चलता है। अपने जनजातीय बंधुओं के परम्परागत कानून भी चलते हैं। वे सब विविधता को ध्यान में रखते हुए संविधान में अनुमति है। ये सारा ध्यान में रखकर किसी एक के लिए समाज का मन बने ये प्रयास होना चाहिए और वास्तव में देश की एकात्मता को समान नागरिक संहिता की बात पुष्ट करती है लेकिन वह एकता के लिए वह उसके लागू करने से समाज में और गुट तैयार नहीं होने चाहिए इसकी चिंता करते हुए धीरे धीरे उसको लाना चाहिए, यह बात मैं भी कर रहा हूं लेकिन ऐसी ही बात अपने संविधान के मार्गदर्शक तत्वों ने संविधान में बतायी है कि सरकार इस तरफ ले जाये मामले को तो ले जाने की ये पद्धति है। सबका साकल्य से विचार करते हुए ऐसी संहिता हो उसका विचार करना समाज में उसके लिए मन बनाना और उसको लागू करना।

संघ की संविधान के प्रति आस्था

प्रश्न 18- नोटा के प्रावधान को संघ किस तरह देखता है। क्या अमेरिका व रूस की तरह राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली भारत में भी होनी चाहिए तथा संविधान की नीति से यदि सभी समान है तो अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान क्यों हैं।

उत्तर- संविधान सभा में चर्चा चली तो कुछ, आज जिनको हम अल्पसंख्यक कहते हैं उनके प्रतिनिधियों में भी ये बात चली थी कि अल्पसंख्यक शब्द निकाल दो आप। क्योंकि इसी बात को लेकर देश का विभाजन हुआ था और आगे और बंटना कोई नहीं चाहता। लेकिन मुझे लगता है कि ये बात संविधान निर्माताओं के मन में आती होगी कि जिनकी संख्या ऐसी कम है, उनको जरा विशेष अवसर दिये जायें। इसलिये ऐसा प्रावधान किया गया। लेकिन जैसा मैं कह रहा हूं कि अल्पसंख्यक ये शब्द बहुत संदिग्ध है तो कश्मीर में अल्पसंख्यक कौन है। देश में हर जगह अलग अलग बात है न। अब कानून में जो होगा, सो होगा तो ये न करें। ऐसी बातें निकालते हैं तो फिर से मनमुटाव शुरू हो जाता है। समाज में ये प्रयोग चलना चाहिए कि कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक नहीं है। हम सब एक देश में एक-दूसरे के भाई-भाई हैं और अलग-अलग प्रकार रहना ये हमारी विशेषता है उसको साथ लेकर चलें। भाई जैसे चलें। एक मार्ग में मिलकर चलें ये होना चाहिए। बहुत करना पड़ेगा उसके लिए। अमेरिका और रूस की तरह प्रणाली की बात हम करते हैं। तो भारत की प्रणाली भारत जैसे हो, अमेरिका जैसे क्यों हो? तो भारत के सब लोग मिलकर जो तय करते हैं वैसा हो। क्यों कि कैसी प्रशासन की पद्धति लागू करने से मैं उसका लाभ लेकर अपने जीवन को बना सकता हूं ये भारत का सामान्य व्यक्ति जानता है उससे बात करनी चाहिए और जो कान्सेंसेस निकलता है वैसा ही चलना चाहिये। अभी तक तो ठीक ही चला है। सारी दुनिया यह कहती है कि अपेक्षा नहीं थी लेकिन सर्वाधिक यशस्वी प्रजातंत्र दुनिया का भारत है। अब जानने वाले, सोचने वाले लोग विचार करते हैं और कुछ रिफार्मस की बात करते हैं जरूर उस पर विचार होना चाहिए और जो स्वीकृत होता है वह करना चाहिए। इसमें हमारी भी इच्छा है, सभी की इच्छा है, हिस्सा है। तो उसके लिए सुझाव आये हैं बहुत प्रकार के। लेकिन पद्धति में ही बदलाव करो ऐसा सुझाव कहीं से नहीं आया है। चुनाव की पद्धति में सुधार करो ऐसा सुधार करो वैसा सुधार करो ऐसा आया है। ये होना चाहिये और ये यूनिफार्म होने चाहिए ऐसा मुझे लगता है। इसमें एक बात नोटा की है कि खड़े हुए पांच लोग और एक भी मेरा पसंद नहीं है। तो इसमें से कोई भी मुझे पसंद नहीं है ऐसा कहना अब एक तो बात है कि प्रजातांत्रिक राजनीतिमें हमेशा अवेलेबल बेस्ट को ही चुनना पड़ता है हंडरेड पर्सेंट बेस्ट ये बहुत कठिन बात है। आकाश पुष्प जैसी बात है। मैं आज की बात नहीं कर रहा हूं यह महाभारत के समय से है। कौरव पांडवों का युद्ध हो गया तो यादवों की सभा में चला कि किसका समर्थन करना। कुछ लोग कौरवों के पक्ष में थे और कुछ लोग पांडवों के पक्ष में थे और कौरवों के अधर्म की चर्चा चल रही थी तो लोग कह रहे थे कि पांडव कौन से धुले चावल के हैं। कोई अपनी पत्नी को दांव पर लगाता है क्या इन्होंने बहुत गलतियां की हैं। इनको कैसे धार्मिक कहा जाए। बलराम जी ने कहा कि कैसे आप चर्चा कर रहे हो और आप सबको मालूम है कि कृष्ण जो कहेगा वही करेंगे। और वो तो चुप है उसको पूछो। तो फिर कृष्ण को पूछा गया। उसके बाद कृष्ण ने फिर भाषण दिया राज्यसभा में। उसमें यहां से शुरू किया उन्होंने कि राजनीति ऐसी चीज है कि यहां तो आपको सौं प्रतिशत अच्छे लोग मिलना ये बड़ी कठिन बात है। मिल जाए तो दीनदयाल जी जैसा कोई, (यह उन्होंने नहीं कहा यह मैं कह रहा हूं) तो अच्छी बात है। लेकिन इसलिये लोगों के सामने एक ही चारा रहता है कि अवेलेवल बेस्ट को चुनो। फिर उन्होंने पाण्डवों के पक्ष में अपना मत दिया। अब जब हम नोटा करते हैं तो हम अवेलेवल बेस्ट को भी किनारे कर देते हैं और इसका लाभ जो अवेलेवल वर्स्ट हैं उनको ही मिलता है। इसलिये यद्यपि नोटा का प्रावधान है। मेरा प्रावधान है कि नोटा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए। अवेलेबल बेस्ट के पक्ष में जाना चाहिए।

संघ में उसके भाजपा के रिश्ते

प्रश्न 19- यदि संघ और राजनीति का सम्बन्ध नहीं है तो भाजपा में संगठन मंत्री हमेशा संघ ही क्यों देता है? क्या संघ ने दूसरे दलों को या अन्य संगठनों को आज तक कभी समर्थन किया है। क्या संघ का उपयोग राजनीति में आगे बढ़ने के लिए करते हैं। धर्म जाति के आधार पर जो राजनीति चल रही है उसको लेकर संघ की क्या राय है?

राजनीति शमशान, कब्रिस्तान, भगवा आतंकवाद से कब निकलेगी।

उत्तर- संघ संगठन मंत्री जो मांगते है। उनको देता है। अभी तक और किसी ने मांगा नहीं है। मांगेगे तो विचार करेंगे। काम अच्छा है तो जरूर देंगे। क्यों कि किसी दल का समर्थन हमने किया नहीं है 93 सालों में हमने एक नीति का समर्थन जरूर किया है और हमारी नीति का समर्थन करने का लाभ जैसे हमारी शक्ति बढ़ती है वैसे राजनीतिक दलों को मिलता है, जिसको इसका लाभ मिलता है जो ले जाते हैं, जो नहीं ले जाते वे रह जाते हैं। इमरजेंसी के समय हमारा इमरजेंसी को विरोध था हमने इमरजेंसी के विरोध की नीति को किया। जो इमरजेंसी के खिलाफ लड़ा अनेक लोग थे हमने ऐसा विचार नहीं किया कि जनसंघ को लाभ मिले। उसमें बाबू जगजीवन राम भी थे। उसमें एस एम जोशी साहब, ना ग गोरे साहब भी थे। उसमें गोपालन भी मार्क्सवादी पार्टी के थे सबको लाभ मिला है। सबके लिये काम किया है स्वयंसेवकों ने। केवल एक चुनाव ऐसा हुआ था राममंदिर की नीति का हम समर्थन कर रहे थे और केवल भाजपा ही उसके पक्ष में थी तब केवल भाजपा को ही उसका लाभ मिला। वो प्रश्न होते हुए भी जब उनका अलायंस वगैरह था तो अलायंस में सबको लाभ मिला। तब नीति का पुरस्कार करते हैं। दलों का न किया है न करेंगे। अब हमारे पुरस्कार के कारण लाभ होता है तो कैसे ले जाना है यह सोचना उनका काम है। राजनीति वो करते हैं हम नहीं करते। संघ का इस्तेमाल आपने किया है यह बड़ा कठिन कर्म है यह हो नहीं सकता। संघ के द्वारा कभी नहीं होगा और आजकल है। फोटो खिंचवाते हैं। और कभी कभी अपने एप्लीकेशन में जोड़ते भी है। अब आपने यह कहा कि जहां के संगठन मंत्री आपके हैं वहां बैठे व्यक्ति स्वयंसेवक है वो जानते हैं इस फोटो का मतलब क्या होता है। लाभ नही होता उल्टा नुकसान होता है। हमने एक ऐसी कार्यपद्धति बनाई है जिसमें जो आता है वो कैसा भी हो, जैसा हमको चाहिए वैसा बनकर निकलेगा नहीं तो स्वार्थ वगैरह मन में है तो किनारे हट जाएगा लेकिन संघ के कार्य में जीवन भर रहने के बाद भी एक थैंक्यू भी कोई नहीं कहता। मिलने की बात तो दूर ही रही सब देना ही देना है। हमारे प्रांत संघचालक थे महाराष्ट्र के बाबाराव भिड़े वो स्वयंसेवकों को बताते हैं कि संघ में याद्याकरते हैं। यादी यानी सूची लिस्ट । लेकिन याऔर द्याइसको अलग किया तो इसका मतलब होता है आओ और दो। तो संघ में याद्याका काम है लेने देने का काम नहीं है। ऐसा संघ है फिर भी बहुत विशेष चतुर बुद्धि रखने वाले एकाद दूसरे निकले तो निकले हम क्या करें। लेकिन संघ में अगर आप आओगे और ज्यादा संघ के साथ रहोगे तो यह खतरा है कि आप संघवाले बन जाओगे यह मैं आपको बताना चाहता हूं। और राजनीति लोक कल्याण के लिए चलना चाहिए। लोक कल्याण का माध्यम सत्ता है। उतनी ही सत्ता की राजनीति चलनी चाहिए। उससे ज्यादा नहीं चलनी चाहिए। यह अगर हो गया जो जयप्रकाश जी की आशा थी जो गांधीजी की आशा थी उसके अनुसार अपने देश के अनुसार राजनीतिक वर्ग के लोग चलने लगे तो ये पांचवा प्रश्न जो है ये आएगा ही नहीं। श्मशान, कब्रिस्तान, भगवा आतंकवाद ये सारी बातें होंगी नहीं। ये सारी बातें तब होती हैं जब राजनीति केवल सत्ता के लिए चलती है। सत्ता के माध्यम से लोक कल्याण के लिए नहीं चलती है। तो उस प्रकार का प्रशिक्षण वहां होने की आवश्यकता है जो लोग राजनीति में हैं वह उसका विचार करें।

आर्थिक परिस्थिति बेरोजगारी के सम्बन्ध में

प्रश्न 20- ग्राम विकास, स्वदेशी आधारित अर्थनीति और बेरोजगारी पर संघ की क्या राय है तथा क्या 2014 के बाद हुए विकास को संघ अपने विचारों के अनुरूप पाता है।

उत्तर - ग्राम विकास का काम तो हम करते ही हैं। गांव का विकास होना ही चाहिए। गांवों का गांवपन कायम रखकरके गांवपन यानी मनोवृत्ति का, बातों का नहीं, स्कूल नहीं हैं गांवों में ये गांव नहीं है। विकास वहां पूरा होना चाहिए। लेकिन वहां की जो वृत्ति है वहां प्रकृति के प्रति मित्रता है उसमें परस्पर सहयोग है सद्भाव है ये सारी बातें कायम रखकर गांव का विकास होना चाहिए। गांव के विकास में भारत का विकास है ऐसा हम मानते हैं और ग्राम विकास के लिए अपने स्वयंसेवक काम भी करते हैं। दिखाने लायक काम आज हमारे देश में जो संघ के प्रयासों से हुए उनकी संख्या 500 के आसपास पहुंची होगी और हम बढ़ा रहे हैं। स्वदेश आधारित अर्थनीति सबकी ही होनी चाहिए। क्योंकि अर्थनीति में अर्थसुरक्षा स्वावलंबन के आधार पर होती है तो जब तक हम स्वेदशी का अनुगमन नहीं करेंगे तब तक वास्तविक विकास होगा ही नहीं। लेकिन स्वदेशी क्या है, स्वदेशी यानी दुनिया को देश से बन्द कर लेना नहीं है। आ नो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः तो जो मेरे घर में बन सकता है वह मैं बाजार से नहीं लाउंगा। मेरे गांव के बाजार में जो मिलता है उससे मेरे गांव का रोजगार बनता है मैं बाहर से नहीं लाउंगा। ऐसे क्रमशः जाते हैं तो जो अपने देश में बनता है वह बाहर से नहीं लाना। लेकिन अपने देश में बनता ही नहीं है और जीवन के लिए आवश्यक है तो बाहर से भी लाउंगा। ज्ञान की बात है, तकनीकी की बात है, पूरी दुनिया से लेंगे हम लेकिन लेने के बाद हमारे देश की प्रकृति और हमारे देश के आकांक्षा के अनुरूप उसको बदल कर लेंगे और हम प्रयास करेंगे कि उसका हमारे देश में कुछ बने। ये स्वदेशी वृत्ति है इस स्वदेशी पद्धति के बिना कोई अर्थ तंत्र अपने देश को सबल नहीं बना सकता। दुनिया पास में आई है और पास में नहीं थी तब से अंतरराष्ट्रीय व्यापार चलता है और वह लेन देन के तत्वों पर ही चलता है और वह तो चलेगा ही चलेगा। लेकिन लेन देन में केवल देन देन ही हमारे तरफ आए और लेन लेन न आए ऐसा नहीं है। तो हां लेन देन भी चलेगी लेकिन हमारी शर्तें हम मनवायेंगे। इस वृत्ति से उसको करना चाहिए। तो बिल्कुल व्यावहारिक यह बात है सब जगह चलेगी तभी देश बलवान होगा। अब 2014 के बाद ऐसा हुआ है क्या तो आप यह विचार कीजिये कि किसी भी, आप 2014 की बात कीजिये, 1947 में ऐसा हुआ है क्या आप ऐसा भी पूछो। मेरा उत्तर एक ही है कि ये जो आदर्श की बात है जमीन पर उतारने की बात है। एक परिस्थिति जो विरासत में मिली है उसको लेकर उनको काम करना पड़ेगा। मान लीजिये सरकार आ गई आओ चलो अब स्वदेशी लागू करनी है और तिजोरी खोलकर देखते हैं तो उसमें एक पैसा नहीं है। तो कहीं से तो पैसा लाना पड़ेगा पहले उसका प्रावधान करना होगा तब स्वदेशी में आगे बढ़ सकते हैं। और इसलिये 1947 हो, 1952 हो, 1957 हो कोई भी साल लीजिये 100 प्रतिशत उसमें कोई आगे गया क्या? शासन-प्रशासन की चौखट में आज की तारीख में एकदम यह संभव नहीं होता है परन्तु उस दिशा में हुआ है क्या? हां उस दिशा में हुआ है ऐसा मुझे लगता है क्योंकि समाज में हवा बदली है। आज हमारे देश के ज्यादातर लोग समझ रहे हैं कि हम अपने देश में बनाएंगे। आज हमारे देश की कंपनियां स्पर्द्धा करने के लिए आगे जा रही हैं। रामदेव बाबा जैसे संत भी आगे जा रहे हैं। उद्यमिता बढ़ी है स्किल ट्रेनिंग बढ़ा है। विदेशों में जाकर शिक्षा लेकर वापस आकर काम कर रहे हैं। खेती में काम कर रहे हैं। स्किल ट्रेनिंग में काम कर रहे हैं तो कुछ आशा बनी है। देश अपने पैरों पर खड़ा करना है इसलिये तो हुआ है और आशा बनी है। वह हमारे भाषणों से थोड़े ही बनी है। उसको जो अनुभव आ रहे हैं उसके कारण बनी है। तो हम ऐसा कह सकते हैं कि सौ प्रतिशत ऐसा हो नहीं सकता। जब होगा तो सुवर्ण दिन होगा। लेकिन आज की तारीख में यह तो कह सकते हैं कि हां इस दिशा में अपने देश ने कदम तो बढ़ाये हैं।

राम मंदिर के सम्बन्ध में

प्रश्न 21 - आस्था का प्रश्न राममंदिर का है। क्या इस विषय पर शाह प्रकरण की भांति अध्यादेश लाया जा सकता है। और या फिर संघ के इस व्याख्यान माला के आयोजन की भांति किसी बड़े सामाजिक संवाद का आयोजन किया जा सकता है।

उत्तर- अब अध्यादेश का मामला सरकार के पास है और आयोजन का मामला रामजन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति के पास है। दोनों में मैं नहीं हूं। तो आन्दोलन में क्या करना है वह उच्चाधिकार समिति है वह तय करती है। वह पूछेगी सलाह तो मैं बताउंगा। हा जरूर संवाद करना चाहिए ऐसा मेरा मत है। करते भी हैं नहीं करते हैं ऐसा नहीं है। अध्यादेश लाना है कि नहीं लाना, कानून ला सकते हैं क्या? अध्यादेश लाने के बाद उसको चुनौती नहीं मिलेगी यह पक्का है क्या? चुनौती मिलने के बाद यह कहा जाएगा कि चुनाव के चलते यह काम किया गया है? ये सब उनके सोचने की बाते हैं। मैं नहीं, मैं चाहता हूं संघ के स्वयंसेवक के नाते, संघ के सरसंघचालक के नाते और रामजन्मभूमि आन्दोलन के हिस्से के नाते कि रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर जल्दी बनना चाहिए। राम भगवान राम अपने देश के बहुसंख्य लोगों के लिए भगवान हैं, लेकिन वह केवल भगवान नहीं हैं। अपने देश में अन्य लोग भी ऐसे हैं जो भगवान को नहीं मानते लेकिन उनको आचरण की भारतीय मर्यादा के जनक मानते हैं। उनको इमामे हिन्द मानते हैं। और इसलिये समाज के सभी वर्गों में एक आस्था जुड़ी है और जहाँ राम की जन्मभूमि थी, बहुत राम के मंदिर हैं और बहुत टूटे भी हैं लेकिन सबकी बात नहीं उठाते। जहां उनका जन्म हुआ वहां मंदिर होना चाहिए। वहां मंदिर पहले था यह लेजर किरणों से देखा गया है। और अगर ये हो गया तो हिन्दू और मुसलमानों के बीच झगड़े का एक बड़ा कारण समाप्त हो जायेगा। और ये सदभावना से हो गया तो मुसलमानों के उपर बार-बार उंगली उठती है उसमें बहुत कमी आ जाएगी। देश के एकता को और देश के आदर्शों को पुष्ट करने वाली बात है और करोड़ों लोगों के आस्था का ये सवाल है। तो इसको इतना लटकना ही नहीं चाहिए था। देश हित की बुद्धि से विचार होता राजनीति इसमें नहीं आती तो इसको पहले ही बन जाना था। खैर देर आए दुरुस्त आये रामजन्मभूमि में भव्य राममंदिर का निर्माण जिस किसी उपाय से हो सकता है शीघ्र होना चाहिये। यह मेरा मानना है।

हिन्दू त्यौहारों में परंपराओं का विरोध

प्रश्न 22- पर्यावरण के नाम पर हिंदू त्यौहारों में परंपराओं का विरोध करने का जो प्रचलन चल पड़ा है इस पर संघ का क्या मत है?

उत्तर- ऐसे किसी नाम पर किसी बात को करना यह तो गलत ही है न। जो करना है वह सीधा सीधा करना चाहिए। पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों का विरोध तो सही है बहुत से लोगों के बहुत से त्यौहार ऐसे हैं हां लेकिन वास्तव में कोई पर्यावरण का प्रश्न है चर्चा होनी चाहिए। त्यौंहारों के कर्मकाण्ड ये कोई हिन्दुत्व के लिए कम्पलसरी बात नहीं है वह बदलते रहे हैं। अब वटसावित्री के दिन महिलायें गांव गांव में शहरों में भी जाकर वट को सूत बांधती थी। अब बम्बई जैसे, कलकत्ता जैसे शहर में वट ही नहीं है। तो अब क्या हुआ उसकी डालियां तोड़कर लाते हैं और उसको बेचते हैं और अब यह डालियां लाते हैं। उसको पूजते हैं। अब यह धर्म सम्मत है क्या? अरे धर्मसम्मत नहीं है, वह प्रतीक है संस्कार का तो कुछ तो करना पड़ता है समाधान हां हमने वट वृक्ष की पूजा की, होना पड़ता है तो हमने डाली की पूजा की। यह बदलता है देश काल और परिस्थिति के अनुसार। तो उस बदलने के लिए भी संकोच नहीं करना चाहिए। पटाखों की बात है। आपको पता है कि पहले पटाखे बनते थे वह मिलावट के नहीं बनते थे वह शुद्ध बारूद के बनते थे। और खेती का सारा काम होने के बाद, वर्षा के बाद जो कीड़े बनते थे, तकलीफ देते थे सबको, इन पटाखों के धुएं के कारण सबको नियंत्रण हो जाता था। ये उसका उपयोग था। आज भी है क्या उसका उपयोग यह देखने की बात है। आज नहीं है उसका उपयोग। उपद्रव है बदलो। लेकिन सीधा कौन है? और फिर केवल हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही क्यों, सबका परीक्षण ऐसा करो, देश काल परिस्थिति के अनुसार बदलो। कर्मकाण्ड कोई ध्रुव रेखा नहीं है वह बदलती रहती है। इसमें हिन्दुओं में मनाही नहीं है। और आप घर में विचार करो, योग्य विचार करो और जाकर लोगों को बताओ कि मैं विद्वान हूं मैं कहता हूं बदल दो, ऐस मत करो। समाज मन को बदलना पड़ता है। समझाओ अनुनय करो, बात करते समय हिन्दू समाज की आस्था ऐसा क्यों कहते हो आप यह कहो कि पर्यावरण के लिए खतरा है और हिन्दुओं में सुधार की परम्परा है तो फिर मिलकर विचार करना चाहिए तो लोग मानेंगे न। जिस ढंग से यह किया जाता है वह ढंग मन में शंकायें पैदा करता है। और वास्तव में अगर यह उद्देश्य है तो वह नहीं करना चाहिए और कुछ सदुद्देश्य है तो अपना सदुद्देश्य लोगों के ध्यान में आए इस तरह से करना है तो हमारे धर्माचार्य भी इसका विचार करेंगे क्यों नहीं करेंगे।

संघ की कार्यपद्धति व रीति नीति

प्रश्न 23- संघ में कहा जाता है कि सूचना मिली तो सोचना बंद। क्या यह तानाशाही नहीं है। संघ में सरसंघचालक का चुनाव क्यों नहीं होता है। क्या संघ का पंजीकरण है। क्या संघ के हिसाब किताब का आडिट होता है। हिन्दू धर्म की रक्षा में सिक्खों का बड़ा योगदान रहा है। संघ केवल महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज का ही गुणगान करता है ऐसा क्यों है तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युवाओं को दिशा देने के लिए क्या कर रहा है?

उत्तर- अभी मैंने कहा चतुर्वेदा पूराणानी उसमें गुरुग्रन्थ का भी नाम लिया है न। जहां से कहा मैंने वह सुबह हम कहते हैं। उसमें गुरुनानक साहब और गुरु महाराज का नाम सुबह लेते हैं। प्रातः स्मरण में एकात्मता से। राजा भाउ पातुरकर पंजाब प्रांत के प्रचारक रहे वहां से आने के बाद और ये जो सारा सिक्खों का बलिदानी इतिहास है गौरवपूर्ण उसकी चित्र प्रदर्शनी लगाकर उन्होंने सारे देश में प्रांतों में घुमाई तो वो सबके गुरु हैं। वो किसी सिक्ख पंथ के गुरु नही हैं। सिक्ख पंथ में हो गये लेकिन देश दुनिया के लिए हमारे सब गुरु ऐसे हैं और हम सबका सम्मान करते हैं। अभी दिल्ली में ही मैंने इस पर भाषण दिया है इस पर वह आपके पास आया होगा। तो हम उसको अलग नहीं मानते यह हम सबका इतिहास है। सिक्ख बंधुओं का गौरवमयी इतिहास के कारण आदर करते हैं और विशेष संत मानकर उनके गुरुओं को देखते हैं यह हमारा मन है। अब संघ पंजीकृत क्यों नहीं है क्योंकि जब संघ शुरू हुआ था तो स्वतंत्र भारत की सरकार नहीं थी। 1925 की बात है। तो चला और चल पड़ा स्वतंत्रता के बाद भी चलता पड़ा और स्वतंत्रता के बाद के कानूनों में हर एक संस्था ने रजिस्ट्रेशन करना चाहिये था ऐसा कानून है और संघ का एक स्टेटस है उसके तहत हम चल रहे हैं। उस स्टेटस के आधार पर कानूनन हमको टैक्स नहीं है। इसलिये हिसाब किताब हमारा मांगती नहीं है सरकार। लेकिन हमको हमारी शाखा को जतन करना है, एक-एक पाई का हिसाब हम रखते हैं। प्रतिवर्ष हम ऑडिट करते हैं, ऑडिट के नियमों के अनुसार हमारा प्रत्येक इकॉनॉमिक यूनिट का ऑडिट प्रतिवर्ष नियमित होता है। इसमें कोई नर्मी हम बरतते नहीं है। और अगर सरकार कभी मांग लेगी, लाओ हिसाब तो हमारा हिसाब तैयार है। हम कानून को मानकर चलने वाले लोग हैं। जो कुछ है वो कानूनन है। और हिसाब-किताब का ऑडिट होता है। इंटरर्नल ऑडिट होता है, इंटरर्नल ऑडिट करने के लिए हम चार्टर्ड एकाउंटेंट बाहर के उनको हम नियुक्त करते हैं। और बाकायदा वो जो फोर्मेट है उसके अनुसार हमारा हिसाब-किबात रखा जाता है। बैंक खाता के द्वारा सब व्यवहार चलता है। कोई ऐसा पैसा हम इधर से उधर हम कभी करते नहीं।
अब सरसंघचालक का चुनाव क्यों नहीं होता, क्योंकि सरसंघचालक डॉ. हेगडेवार रहे हैं, उसके बाद गुरुजी रहे, ऐसे लोग रहे हैं। इसलिए वो श्रद्धा का स्थान है। उसकी नियुक्ति, मेरे बाद सरसंघचालक कौन होगा, ये मेरे मर्जी पर है और मैं सरसंघचालक कब तक रहूंगा, ये भी मेरे मर्जी पर है। लेकिन मैं ऐसा हूं तो संघ ने एक होशियारी बरती कि मेरा अधिकार संघ में क्या है, कुछ नहीं है। मैं केवल फ्रेंड, गाइड एंड फिलॉसफर हूं। सरसंघचालक को और कुछ करने का अधिकार नहीं है। संघ का चीफ एग्जीक्युटिव अधिकारी सरकार्यवाह है। उसके हाथ में सब अधिकार है, वो अगर मुझे कहेगा कि ये बंद करो और तुरंत नागपुर चलो तो अभी मुझे उठकर जाना पड़ेगा। और वो जो है उसका चुनाव विधिवत प्रति 3 साल होता है। संघ ने सरकार को अपना लिखित संविधान दिया तब से आज तक हमारा एक भी चुनाव, एक दिन भी पोस्टपोंड नहीं हुआ है। नीचे शाखाएं प्रांतों को प्रतिनिधि बनाती हैं और अन्य स्तर के संघ चालकों का चुनाव जिला और क्षेत्र के प्रांत के होता है। और अखिल भारतीय प्रतिनिधि चुने जाते हैं वो हर तीन साल में सरकार्यवाह को चुनते हैं। ये प्रक्रिया हमारे यहां विधिवत उसके भाव को पूर्व ध्यान में रखकर एकदम ठीक से होती है। सबसे नियमित चुनाव वाला संगठन, शायद दुनियां में भी संघ है। केवल जब संघ पर प्रतिबंध था, उस समय चुनाव का वर्ष एमरजेंसी में आया था। उस साल चुनाव नहीं हुए, लेकिन काम प्रति सभा बंदी उठने के बाद जो पहली हुई उसमें हमने चुनाव करवाया। हम इस मामले में बहुत नियमित हैं और सूचना मिली तो सूचनाबंध ये बात सही है। लेकिन सूचना मिलने के पहले का मामला इसमें नहीं है। सूचना बहुत चर्चा के बाद ही मिलती है। अब मैं ये दो दिन का भाषण दे रहा हूं। मैं अपना एक्सटेम्पोर दे रहा हूं। आपको लगता है कि मेरे मन से मैं बोल रहा हूं, मैंने इसके पहले सब प्रमुख अधिकारियों से, इसमें क्या रखना, क्या नहीं रखना, इसकी चर्चा की है। मैंने कहा कि ये रखूंगा तो वो उनका नहीं-नहीं इसकी जरूरत नहीं है। और मैं जो बोल रहा हूं वो संघ की सहमति बोल रही है। अब मेरे इस बोलने का संघ में कोई प्रतिपाद नहीं करेगा। सूचना मिली, सोचना बंद, लेकिन सूचना के पहले बहुत सोचना हो गया। और मेरा अपना विचार कुछ भी रहे, मैं उस सोचने के अनुसार बोल रहा हूं। ये संघ की पद्धति है। आपको लगता है आप में सिरफुटव्वल होना, ये डेमोक्रेसी है। अरे डेमोक्रेसी का ऐसेंस है सर्वसहमति। जैसे अपना संविधान बना, संघ में हर बात ऐसे ही सर्वसहमति बनाकर होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि सूचना हो गई, सोचना बंद। किसी आदमी को कहो आप वो करेगा क्या, नहीं करेगा। ये हो नहीं सकता, सोचना बंद नहीं कर सकते आप। कब कर सकते हैं, जब सबका विचार लेकर एक समन्वित सर्वसहमति बनी रहे। हम करते हैं इसलिए हम ऐसा कह सकते हैं ऐसा कहने पर उसका पालन भी होता है, वो मन से होता है तानाशाह के कारण नहीं होता है।